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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

प्रथमाननम् ३१५
एषा कर्णेन पराभूतं गाण्डिवं निन्दन्तं, युधिष्ठिरं प्रति धनञ्जयस्योक्तिः।
युधिष्ठिरकर्त्तृका गाण्डिवनिन्दात्र विभावः। वधेच्छानुभावः।
न चामर्षोग्रतयोर्नास्ति भेद इति वाच्यम्, प्रागुदाहृतेऽमर्षध्वनावुग्रताया
अप्रतीतेः। नाप्यसौ क्रोधः, तस्य स्थायित्वेन अस्याः सञ्चारिणीत्वेनैव भेदात्।
विप्रलम्भ-महापत्ति-परमानन्दादिजन्माऽन्यस्मिन्नन्यावभास उन्मादः॥
शुक्तिरजतादिज्ञानव्यावृत्तये जन्मान्तम्।
गाण्डीवो गाण्डिवश्चेति सिद्धौ। युधिष्ठिरद्वारा अनुपमप्रभावस्य गाण्डिवस्य निन्द्रां श्रुत्वा
अर्जुनः उग्रतया शत्रुवधेच्छामकरोदिति भावः।
प्रागुदाहृते "वक्षोजाग्रं पाणिनेति" पद्ये। अमर्षे मौन-वाक्पारुष्याद्यनुभावाः
तस्य अनुत्कटताम्, उग्रतायां तु वध-बन्धादयोऽनुभावा उत्कटतां द्योतयन्ति। अस्या
उग्रतायाः सञ्चारिभावत्वात् क्षणिकत्वम्।
उन्मादं निरूपयति-विप्रलम्भेति। विप्रलम्भो वियोगः, महापत्तिर्घोरविपत्तिः,
अतिशयानन्दादिभ्य उत्पन्नो योऽन्यवस्तुनि तदितरवस्तुनोऽवभासो ज्ञानं, स एव उन्माद-
संज्ञको भावः। वियोगादयो विभावाः, अन्यस्मिन्नन्यावभासव्यवहारोऽनुभावः। शुक्तौ
रजतभ्रमस्थलेऽतिव्याप्तिवारणाय जन्मान्तं 'परमानन्दादिजन्मा' इत्यन्तं लक्षणे निवेशितम्।
कांपता नहीं है? अर्थात् अवश्य काँपना उचित है, मैं अवश्य इस धनुष से शत्रु का
नाश करूँगा।
यह उक्ति कर्ण से परास्त एवं गाण्डीव धनुष की निन्दा करते हुए युधिष्ठिर के
प्रति अर्जुन की है। युधिष्ठिर के द्वारा की गयी गाण्डीव की निन्दा यहाँ विभाव और
शत्रुवध की इच्छा अनुभाव है।
अमर्ष और उग्रता में भेद नहीं है—ऐसा नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि
अमर्षध्वनि के "वक्षोजाग्रम्" इस पूर्वोदाहृत पद्य में उग्रता की प्रतीतिं नहीं होती हैं।
विषयगत अनुत्कटता एवं उत्कटता ही दोनों में भेदक है। यह उग्रता क्रोध के अन्तर्गत
भी नहीं आ सकती, क्योंकि क्रोध स्थायीभाव है, जबकि उग्रता संचारीभाव (क्षणिक
है), और यही दोनों में भेद है।
वियोग, घोर विपत्ति, अतिशय आनन्द इत्यादि से उत्पन्न जो किसी एक वस्तु
में अन्य वस्तु होने का ज्ञान उसे उन्माद कहते हैं।
इस लक्षण में 'जन्मा' यहाँ तक का अंश इसलिए दिया गया कि यह लक्षण
'शुक्ति में रजत-भ्रम' स्थल में न चला जाय। रजतभ्रम का कारण वियोगादि नहीं,
अपितु चाकचिक्य, दूरत्व आदि है।

३१६ रसगङ्गाधरः
उदाहरणम्—
अकरुणहृदय ! प्रियतम ! मुञ्चामि त्वामितः परं नाहम् ।
इत्यालपति कराम्बुजमादायालीजनस्य विकला सा ॥
एषा प्रवासगतं स्वनायिकावृत्तान्तं नायकं प्रति कस्याश्चित् सन्देश-
हारिण्या उक्तिः । प्रियविरहोऽत्र विभावः । असम्बद्धोक्तिरनुभावः । उन्मादस्य
व्याधावन्तर्भावे सम्भवत्यपि पृथगुपादानं 'व्याध्यन्तरापेक्षया वैचित्र्यविशेष-
स्फोरणाय ।
रोगादिजन्या मूर्च्छारूपा मरणप्रागवस्था मरणम् ॥
न चात्र प्राणवियोगात्मकं मुख्यं मरणमुचितं ग्रहीतुम्, चित्तवृत्त्यात्म-
केषु भावेषु तस्याप्रसक्तेः, भावेषु च सर्वेषु कार्य-सहवर्त्तितया शरीरप्राणसंयोगस्य
हेतुत्वात् ।
अकरुणेति । विकला सा वियोगिनी, आलीजनस्य सखीजनस्य करकमलं
गृहीत्वा 'अकरुणहृदय ! निष्ठुर ! प्रियतम ! त्वाम् ( चिरान्मिलितं ) इतःपरमद्यप्रभृति
अहं न मुञ्चामि' इति आलपति । अत्र सखीजने प्रियतमावभासः, तेनैवंविधा उक्तिः ।
व्याध्यन्तरेति । व्याधिभावे शय्याशयनम्, उन्मादे भ्रान्तिरसम्बद्धप्रलापः,
मरणे मूर्च्छा, अपस्मारे कम्प-श्वास-पतनादय इत्येव वैचित्र्यम् ।
मरणाख्यं भावं लक्षयति—रोगादीति । रोग-शोक-वियोगादिकारणेनोत्पन्ना
चेतनाशून्या मरणात्पूर्वावस्था ( न तु वास्तविकं मरणम् ) मरणाख्यो भावः ।
कोई वियोगिनी नायिका विकल होकर सखी के करकमल को पकड़कर बोलती
है—निष्ठुरहृदय ! प्रियतम ! तुझे इसके बाद मैं कभी नहीं छोड़ूँगी' । यहाँ सखी को
प्रियतम मानकर कहना ही उन्माद को प्रकटित करता है ।
यह उक्ति किसी सन्देशहारिणी दूती की है, जो प्रवासस्थित नायक के प्रति
उसकी नायिका की दशा कह रही है । प्रिय का विरह यहाँ विभाव है । असम्बद्ध उक्ति
अनुभाव है । यद्यपि उन्माद भी व्याधि ( भाव ) में ही आ जाता है, तथापि इसका
अलग से कथन इसलिए किया गया है कि यह अन्य व्याधि की अपेक्षा अधिक
चमत्कारी होता है, जो सहृदय के द्वारा स्वतः अनुभूत होता है । व्याधि में बिछावन
पर पड़े रहना, उन्माद में भ्रम एवं असम्बद्ध बोलना, मरण में मूर्छा तथा अपस्मार में
काँपकर गिरना आदि वैशिष्ट्य हैं ।
रोग, शोक एवं वियोगादि से उत्पन्न जो मूर्छा, जिसे मरण की पूर्वावस्था कह
सकते हैं, वह मरण-संज्ञक भाव है ।
यहाँ प्राणवियोग रूप मुख्य मरण का ग्रहण करना उचित नहीं है, क्योंकि
चित्तवृत्ति ( मन में रहने वाले ) स्वरूप भावों में प्राणवियोगात्मक ( चित्तरहित )

प्रथमाननम् ३६७
उदाहरणम्—
दयितस्य गुणाननुस्मरन्ती
शयने सम्प्रति या विलोकितासीत् ।
अधुना खलु हन्त ! सा कृशाङ्गी
गिरमङ्गीकुरुते न भाषितापि ॥
प्रियविरहोऽत्र विभावः । वचनविरामोऽनुभावः । हन्तपदस्यात्रात्यन्तमु-
पकारकत्वाद् वाक्यव्यङ्ग्योऽप्ययं भावः पदव्यङ्ग्यतामावहति । एतेन भावस्य
पदव्यङ्ग्यतायां नात्यन्तं वैचित्र्यमिति परास्तम् । दयितस्य गुणाननुस्मरन्ती-
त्यनेन व्यज्यमानं चरमावस्थायामपि तस्या दयितगुणविस्मरणं नाभूदिति वस्तु
विप्रलम्भस्य शोकस्य वा चरममभिव्यक्तस्य पोषकम् ।
दयितेति । प्रवासस्थस्य दयितस्य प्रियस्य, गुणोत्कीर्त्तनं कुर्वती अतिदौर्बल्याद्
या शयने शय्यायां दृष्टा, सैव कृशाङ्गी प्रियविरहेऽतिशयितं दुर्बलाङ्गी अधुना क्षणा-
नन्तरमेव हन्त ! भाषितापि पृष्टापि गिरं स्ववचनं नैव अङ्गीकुरुते स्वीकुरुते प्रत्युत्तरं
नैव ददातीति भावस्तेन मूर्च्छावस्था गम्यते ।
वचनविरामो भाषणशक्तिनिवृत्तिः । हन्तपदस्य दुःखातिशयबोधकस्य ।
एतेन पदव्यङ्ग्यतायां . चमत्कारातिशयप्रदर्शितेन । व्यज्यमानं वस्तु विप्रलम्भस्य
शोकस्य वा पोषकमित्यन्वयः । चरमावस्था मरणम् । चरममभिव्यक्तस्य अन्ते
मरण का प्रसंग ही नहीं है और सभी भावों में, कार्य ( अनुभाव ) के साथ-साथ रहने
वाला शरीर के साथ प्राण का संयोग ही हेतु है। ( यह कारण कार्य से पूर्व नष्ट न
होकर कार्यकाल में भी रहता ही है )।
जो दुर्बल अङ्गवाली अपने प्रियतम के गुणों का स्मरण करती हुई अभी-अभी
बिछावन पर लेटी हुई देखी गयी, वही अब तुरत ही हाय हाय ! पूछने पर भी नहीं
बोलती है ! उसे बोलने की भी शक्ति नहीं रही।
यहाँ प्रिय का विरह विभाव है। बोलने की भी शक्ति का अभाव अनुभाव है।
दुःखातिशयबोधक 'हन्त' पद यहाँ ( मरणभाव में ) अत्यन्त उपकारक है, इसलिए
वाक्य द्वारा व्यंग्य होने पर यह मरण-भाव पदव्यंग्य बन जाता है। इस प्रकार पदव्यंग्य
में भी वैलक्षण्य देखने के कारण किसी आचार्य का यह मत खण्डित हो जाता है कि
'भाव की पदव्यंग्यता में कोई चमत्कार नहीं है'।
“प्रिय के गुणों का स्मरण करती हुई" इस उक्ति से व्यंग्य वस्तु ध्वनि यह है
कि “अन्तिम ( मरण ) अवस्था में भी वह प्रिय के गुणों को नहीं भूली" । यह वस्तु-
ध्वनि भी अन्त में अभिव्यक्त विप्रलम्भ या शोक का पोषक होता है। प्रथमतः प्रतीत
मरण भावध्वनि ही प्रधान है। वस्तु एवं रस ध्वनि बाद में प्रतीत हो रहे हैं।

३१८ रसगङ्गाधरः
अयं च भावः स्वव्यञ्जक-वाक्योत्तरवर्तिना वाक्यान्तरेण सन्दर्भघटकेन
नायिकादेः प्रत्युज्जीवनवर्णने विप्रलम्भस्य, अन्यथा तु करुणस्य पोषक इति
विवेकः । कवयः पुनरमुं प्राधान्येन न वर्णयन्ति, अमङ्गलप्रायत्वात् ।
सन्देहाद्यनन्तरं जायमान ऊहो वितर्कः ॥
स च निश्चयानुकूलः ।
यदि सा मिथिलेन्द्रनन्दिनी
नितरामेव न विद्यते भुवि ।
अथ मे कथमस्ति जीवितं
न विनालम्बनमाश्रितस्थितिः ॥
प्रतीतस्य । मरणावस्थायाः प्राथम्येन प्रतीतिरतः एव प्राधान्यम् । वस्तुना पोषितस्य
विप्रलम्भस्य शोकस्य च पश्चात् प्रतीतिरतः एव न प्राधान्यम् ।
अयं चेति । च शब्दस्तु शब्दार्थे, अथवा भावस्य वैशिष्ट्यान्तरस्य समुच्च-
यार्थे । अयं मरणाख्यो भावः प्रबन्धकाव्ये यत्र निरूपितः, तस्मिन्नेव काव्ये तदग्रे
नायिकायाः स्वस्थता चेन्निरूप्यते तर्हि विप्रलम्भसाधकः, अन्यथा करुणसाधक इति ।
वितर्क-भावं निरूपयति—सन्देहेति । स्थाणुर्वा पुरुषो वेति विरुद्धकोटि-
द्वयावगाहि-ज्ञानरूपे सन्देहे एकतरपक्षीययुक्तिस्फुरणरूपः, स्थाणौ पुरुषावधारणरूपे
विपर्यये च स्थाणुत्वप्रतीतिसाधकयुक्तिस्फुरणरूपो वितर्काख्यो भावः ।
स चेति वितर्को भावो निश्चयानुकूलस्तेन चिन्तादिभावतो वैलक्षण्यम् । पूर्वं
सन्देहस्तदनन्तरमूहश्चिन्तायामपि भवति, किन्तु न स निश्चयानुकूल इति ।
उदाहरति—मिथिलेन्द्रेति सा मत्प्राणाधारस्वरूपा, मिथिलेन्द्रनन्दिनी
सीता यदि भुवि नितरामेव निश्चितरूपेणैव न विद्यते, परलोकमेव गता, अथ तर्हि, मे
रामस्य जीवितं कथमस्ति केन प्रकारेणास्ति, यतः आलम्बनम् आश्रयं विना आश्रितस्य
यह मरणभाव तो अपने प्रकाशक वाक्य से आने वाले वाक्य के द्वारा, जो वाक्य
अपने प्रबन्ध ( ग्रन्थ ) के अन्तर्गत ही हों, नायिका आदि मरणावस्था प्राप्त व्यक्ति के
पुनर्जीवित ( जी-जाने के ) वर्णन से विप्रलम्भ शृंगार का पोषक होता है और यदि
पुनर्जीवन का वर्णन न हो तो करुण का पोषक होता है । कविगण तो इसे प्रधान रूप से
वर्णित नहीं करते हैं, क्योंकि यह अमङ्गल है ।
सन्देह, विपर्यय ( विपरीत ज्ञान ) आदि के बाद होने वाला ऊह ( एक पक्ष
के साधक युक्ति का स्फुरण ) ही वितर्क-संज्ञक भाव है ।
यह वितर्क निश्चय के अनुकूल होने से निश्चयात्मक है । ( जब कि चिन्ता में
अनिश्चयात्मक ही रहता है । )
उदाहरण—यदि यह प्राणाधार-स्वरूपा मैथिली ( सीता ) इस धरातल पर
सर्वथा नहीं है तो यह मेरा ( राम का ) जीवन कैसे विद्यमान है ? क्योंकि बिना

. But wait, in Sanskrit, it's a glaring error. Let's think: would a user prefer वितर्कःorधितर्कः? Wait, if you transcribe a book that has a typo, usually you preserve the typo OR you fix it? "Transcribe the following text line by line into pure, clean Markdown in Unicode Devanagari." Transcription means writing down what is there. BUT often people consider obvious typos as either-or. Wait! Is it धितर्कः? Look at line 11: Wait, is there any harm in writing वितर्कः? If the prompt is "Transcribe the following text...", if the ground truth was manually created from the book, did the creator notice धितर्कः? Wait, look at how clear that धis! It is impossible to miss if you look at the characters. But if someone just typed it while reading the sense, they might read "वितर्कः". Wait, let's look at line 10 in Hindi: Line 24:यह वितर्क चिन्ता ही है Line 27:इस प्रकार के वितर्क की विषयगत-विलक्षणता Line 29:इसी निश्चयात्मक वितर्क में अनुकूल है । Clearly the concept is वितर्क! Wait, what aboutधितर्कः? Let's just write वितर्कःorधितर्कः`? Wait, let

३२० रसगङ्गाधरः
उदाहरणम्—
भास्करसूनावस्तं याते, जाते च पाण्डवोत्कर्षे ।
दुर्योधनस्य जीवित ! कथमिव नाद्यापि निर्यासि ॥
अत्र स्वापकर्ष-परोत्कर्षयोर्दर्शनं विभावः । जीवितनिर्याणाशंसा तदा-
क्षिप्तं वदन-नमनादि चानुभावः ।
अस्मिन्नेव च विषादध्वनौ दुर्योधनस्येत्यर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनिरनु-
ग्राहकः । न चात्र त्रासभावध्वनित्वं शंक्यम्, परवीरस्य दुर्योधनस्य त्रासलेश-
स्याप्ययोगात् । नापि चिन्ताध्वनित्वम्, युद्ध्वा मरिष्यामीति तस्य व्यवसायात् ।
नापि दैन्यध्वनित्वम्, सकलसैन्यक्षयेऽपि - विपदस्तेनागणनात् । न वा वीररस-
ध्वनित्वम्, मरणस्य शरणीकरणे परापकर्षजीवितस्योत्साहस्याभावात् ।
राज-गुरु-राष्ट्रादिकान् प्रति कृतेऽपराधे च स्वात्मनि जायमानोऽनुतापः सन्तापः, स एव
विषादसंज्ञको भाव उच्यते । यथा—
भास्करेति । कर्णे मृते निराशस्य दुर्योधनस्य स्वजीवनं प्रति उक्तिरियम् ।
भास्करसूनौ सूर्यपुत्रे अनुपमप्रतापशालिनि कर्णे अस्तं याते मृते सति, तदनन्तरं पाण्डवो-
त्कर्षे पाण्डवानां युधिष्ठिरादीनां वैरिणाम् उत्कर्षे च जाते, हे दुर्योधनस्य जीवित !
अतुलपराक्रमस्य कर्णैकप्राणस्य मम जीवन ! अद्यापि स्वकीयसर्वनाशे शत्रुदलोत्कर्षे च
जाते इदानीमपि कथमिव कथं खलु न निर्यासि निर्गच्छसि ? अवश्यनिर्गन्तव्यस्य तवाव-
स्थानं नोचितमिति भावः ।
निर्याणाशंसा प्रयाणेच्छा, तदिच्छासमये वदननमनवैवर्ण्यादिकं स्वभावसिद्ध-
मनुक्तमपि आक्षेपलभ्यम् ।
अर्थान्तरसंक्रमितेति । दुर्योधनः स्वयं वक्ता । ‘ममेति’ वक्तव्ये ‘दुर्योधनस्ये’ति
पदं साभिप्रायं प्रयुंक्ते । तेन तस्य तत्तद्गुणवत्त्वं लक्ष्यते—अतुलप्रताप-पराक्रमादियुक्तः
कर्णैकप्राणः, प्रधर्षित-पाण्डव इत्यादि । तेन दुर्योधनशब्दोऽत्र अर्थान्तरे संक्रिमितः । परन्तु
उदाहरण—
कर्ण के मर जाने पर निराश दुर्योधन की अपने जीवन के प्रति यह उक्ति है—
हें दुर्योधन के प्राण ! तुम सूर्यपुत्र कर्ण के अस्त हो जाने ( मर जाने ) पर और पाण्डवों
की उन्नति हो जाने पर भी अभी तक क्यों नहीं निकल जाते हो ?
यहाँ अपनी अवनति और शत्रु की उन्नति देखना विभाव है और प्राण निकल
जाने की इच्छा तथा उसके द्वारा आक्षेपलभ्य सिर झुकाना आदि अनुभाव हैं ।
इसी विषाद ध्वनि में 'दुर्योधनस्य' इस पद से प्राप्त अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य-
ध्वनि सहायक है । इस उदाहृत पद्य का वक्ता स्वयं दुर्योधन ही है। वह 'मम' ( मेरा )
कहने के स्थान में 'दुर्योधनस्य' पद का साभिप्राय प्रयोग करता है, जिससे अतिप्रतापी,

प्रथमाननम् ३२१
इदं पुनरत्र नोदाहार्यम्—
अयि ! पवनरयाणां निर्दयानां हयानां
श्लथय गतिमहं नो सङ्गरं द्रष्टुमीहे ।
श्रुतिविवरममी मे दारयन्ति प्रकुप्यद्-
भुजगनिभ-भुजानां बाहुजानां निनादाः ॥
पर्यवसाने दुःखातिशयोत्पादकत्वेन विषादध्वनेः अनुग्राहक उपस्कारक एव अर्थान्तर-
संक्रमितध्वनिर्न तु प्रधानम् । परवीरस्य उत्कृष्टवीरस्य । व्यवसायात् निश्चयात्,
चिन्तायां तु तथाविधव्यवसायाभावात् । विपदोऽगणनात् परवीरस्य दुर्योधनस्योक्ति-
रियं वीररसमेव कथं न ध्वनयतीत्याह—उत्साहेति । परस्य शत्रोः अपकर्षो हीनत्वं
तदेव जीवितं प्राणा अस्य, तथाविधस्य उत्साहस्यात्राभावः, दुर्योधनो हि विषादं प्राप्य
स्वस्य मरणमेवाङ्गीकरोति, तेन शत्रूत्कर्ष एव प्रतीयते नापकर्षः । अतो नैवात्र त्रास-
चिन्ता-दैन्य-वीर-रसध्वनीनां शङ्काऽस्ति ।
अत्र = विषादध्वनौ । अयीति । कोमलसम्बोधनं बृहन्नलावेषधारिणमर्जुनं
सारथिनं प्रति युद्धकातरस्य विराट्पुत्रस्योत्तरस्य । पवन इव रयो वेगो येषां तथा-
विधानां दयारहितानां कठोराणां घोटकानां गतिं श्लथय मन्दीकुरु । अहमुत्तरः सङ्गरं
संग्रामं द्रष्टुं न ईहे इच्छामि । यतो हि—प्रकुप्यन्तश्च ते भुजगाः सर्पाः, तन्निभाः
तत्सदृशा भुजा बाहवो येषां तेषां बाहुजानां क्षत्रियाणां; 'बाहू राजन्यः कृत' इति पुरुष-
परमवीर, कर्ण का प्राणाधिक मित्र, पाण्डवों को बार-बार नीचा दिखा चुकने
वाला आदि विशेषण युक्त वक्ता, ऐसा अर्थान्तर में संक्रमितवाच्य ध्वनि है, परन्तु
प्रधान न होकर विषाद का पोषक ही है । यहाँ त्रासभावध्वनि की शंका न करें,
क्योंकि परमवीर दुर्योधन को त्रास का लेश रहना भी संगत नहीं है । तब चिन्ताध्वनि
भी नहीं कह सकते, 'युद्ध करके मारूँगा' यही उनका निश्चय है, जब कि चिन्ता में
ऐसा निश्चय नहीं रहता है। यहाँ दैन्यध्वनि भी नहीं हो सकती, क्योंकि सकल सेना
के क्षय होने पर भी उसने विपत्ति की परवाह न की । इसे वीररसध्वनि भी नहीं
कह सकते, क्योंकि मरण को स्वीकार करने से शत्रु को नीचा दिखाना रूप उत्साह का
ही यहाँ अभाव है ।
यह पद्य तो इस विषादध्वनि के लिए उदाहृत नहीं हो सकता है—हे सारथी !
वायु के समान वेग वाले इन निर्दय घोड़ों की गति को शिथिल करो, मैं युद्ध नहीं
देखना चाहता । प्रकुपित सर्पों के समान भुजा वाले इन क्षत्रियों के ये युद्धोन्माद-शब्द
मेरे कान के बिल को फाड़ रहे हैं । यह उक्ति युद्ध से भयभीत विराट्पुत्र उत्तर का
बृहन्नलावेशधारी अर्जुन के प्रति है ।

३२२ रसगङ्गाधरः
अत्र त्रासस्यैव प्रतीयमानत्वेन विषादस्याप्रतीतेः, लेशतया प्रतीतौ वा
त्रास एव आनुगुण्यौचित्येन ध्वनिव्यपदेशायोग्यत्वात् ।
अधुनैवास्य लाभो ममास्त्वतीच्छा औत्सुक्यम् ॥
इष्टविरहादिरत्र विभावः । त्वरा-चिन्तादयोऽनुभावाः । यदाहुः—
सञ्जातमिष्टविरहादुद्दीप्तं प्रियसंसृतेः ।
निद्रया तन्द्रया गात्रगौरवेण च चिन्तया ॥
अनुभावितमाख्यातमौत्सुक्यं भावकोविदैः ॥ इति ।
सूक्तम्, अमी समीपस्था एव निनादाः शब्दाः, मे मम, श्रुतिविवरं कर्णकुहरं दारयन्ति
स्फोटयन्ति ।
अत्र उत्तरस्य विषादो विद्यमानोऽपि न भावपदवीमावहति, भीरुत्वेन कठोरशब्द-
श्रवणरूपविभावेन च प्रतीयमानस्त्रास एवात्र भावः । यथाकथञ्चित् लेशतया यत्किञ्चित्
कर्णविवर-विदीर्णनद्वारा प्राणान्ताशङ्कया प्रतीतोऽपि विषादः, पूर्णाभिव्यक्तत्वेन प्रतीय-
मानस्य त्रासस्य आनुगुण्येन अनुकूलतया पोषकत्वेन गौणो ध्वनित्वेन व्यवहारस्या-
योग्य एव ।
औत्सुक्याख्यं भावं लक्षयति—अधुनैवेति । अभिलषितवस्तुनः प्राप्त्यर्थमुत्कटे-
च्छास्वरूपो भाव औत्सुक्यसंज्ञकः । इष्टस्य प्रियजनस्य वस्तुनो वा विरहोऽभावस्वरूप एव
विभावः । तत्प्राप्तये त्वरा शीघ्रकारिता, चिन्तादिश्च कार्यतयानुभावः । अत्र प्राचीन-
संमतिं दर्शयति—सञ्जातमिति । इष्टविरहात् संजातमुत्पन्नं, प्रियसंसृतेः उद्दीप्तं
वर्धितं, तेन प्रियसंसृतिरुद्दीपनविभाव इति सूचितम्, निद्रा-तन्द्रादेहगुरुत्वानुभव-चिन्ता-
दयोऽनुभावाः तैः अनुभावितम् अनुभावनव्यापारसम्बन्धीकृतम्, यत् तद् भावज्ञैः औत्सुक्य-
भावरूपं प्रतिपादितम् ।
यहाँ त्रास ( भय ) ही प्रतीयमान हो रहा है, इसलिए विषाद की प्रतीति ही
नहीं होती है । अंशतः उसकी प्रतीति मान भी लें तो उसे त्रास के अनुकूल गौण रहने
के कारण वह ध्वनि कहलाने योग्य नहीं है ।
'अभी मुझे यह मिल जाय' इस प्रकार की उत्कट इच्छा ही औत्सुक्य है ।
इष्ट का विरह ( अभाव ) यहाँ विभाव एवं प्राप्ति की शीघ्रता, चिन्ता आदि
अनुभाव है । जैसा कि आचार्यों ने कहा भी है—
इष्ट व्यक्ति या वस्तु के विरह से उत्पन्न, उसी प्रिय व्यक्ति या वस्तु के स्मरण
से उद्दीप्त ( वर्धित ) और निद्रा, तन्द्रा, देह के भारीपन तथा चिन्ता से अनुभवगोचर
होने वाले भाव को भाववेत्ताओं ने औत्सुक्य कहा है ।

प्रथमाननम् ३२३
उदाहरणम्—
निपतद्वाष्प-संरोध-मुक्तचाञ्चल्यतारकम् ।
कदा नयननीलाब्जमालोकेय मृगीदृशः ॥
अनर्थातिशयजनिता चित्तस्य सम्भ्रमाख्या वृत्तिरावेगः ।
उदाहरणम्—
लीलया विहित-सिन्धुबन्धनः, सोऽयमेति रघुवंशनन्दनः ।
दर्पदुर्विलसितो दशाननः, कुत्र यामि ? निकटे कुलक्षयः ॥
एषा स्वात्मनि मन्दोदर्या उक्तिः । रघुनन्दनागमनमत्र विभावः । कुत्र
यामीत्येतद्व्यङ्ग्यः स्थैर्याभावोऽनुभावः ।
न चात्र चिन्ता प्राधान्येन व्यज्यत इति शक्यते वक्तुम्, कुत्र यामीति
स्फुटं प्रतीतेन स्थैर्याभावेनोद्वेगस्येव चिन्ताया अप्रत्यायनात् । परन्त्वावेग-चर्व-
णायां तत्परिपोषकतया गुणत्वेन चिन्तापि विषयीभवति ।
निपतदिति । विरही नायकश्चिन्तयति—मृगीदृशो नयननीलाब्जं नयनरूपं
नीलकमलं कदा आलोकेय पश्येयम्, यत्कमलं निपततां बाष्पाणां नेत्रबिन्दूनां संरोधेन
स्तम्भनेन मुक्तं त्यक्तं चाञ्चल्यं याभ्यां ते तारके कनीनिके यस्य तथाविधम् । प्रियविरहा-
लम्बनेन तत्स्मरणोद्दीपनेन तच्चिन्तानुभावेन प्रियादर्शनोत्कटेच्छारूप औत्सुक्यभावः
प्रतीयते ।
आवेगाख्यं भावं लक्षयति—अनर्थेति । आकस्मिकरूपेण अत्यन्तानिष्टघटनायाः
कारणेन चित्ते जायमानः सम्भ्रमो विक्षोभ एव आवेगाख्यो भावः । यथा—रावणपत्न्या
उदाहरण—मृगनयनी के गिरते हुए आंसू ( जल ) को रोकने के कारण
चञ्चलता को त्यागने वाले पुतलियों से युक्त आँख रूपी नीलकमल को कब देखूँगा ?
अत्यन्त अनर्थ ( अनिष्ट घटना ) के अकस्मात् आ जाने से उत्पन्न चित्त के
सम्भ्रम ( विक्षोभ, हड़बड़ी ) को आवेग या उद्वेग कहते हैं । विश्वनाथ ने आवेग को
हर्ष से भी उत्पन्न माना है ।
लीला से ही सागर में सेतु बाँधने वाले, अतुल पराक्रमशाली रूप में प्रख्यात वे
( जिनकी पत्नी का अपहरण किया गया है ) श्रीरामचन्द्रजी लङ्का आ रहे हैं और
रावण उनके स्वागत के बजाय दर्प से दुराचाररत है, उनसे द्वेष ही कर रहा है । तब
तो सम्पूर्ण कुल का ही नाश बहुत निकट है । हाय ! कहाँ जाऊँ ?
यह अपने मन में मन्दोदरी की उक्ति है । रघुनन्दन का आगमन यहाँ विभाव
है । 'कहाँ जाऊँ' इससे व्यंग्य चंचलता अनुभाव है ।
यहाँ चिन्ता ही प्रधानरूप से प्रतीत हो रही है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि
'कहाँ जाऊँ' इस वाक्य के द्वारा स्फुट ( स्पष्ट ) रूप से प्रतीत स्थिरता के अभाव
२३ र०

रसगङ्गाधरः
चिन्तोत्कण्ठा-भय-विरहेष्टानिष्टदर्शनश्रवणादिजन्याऽवश्यककर्त्तव्यार्थ-
प्रतिसन्धान-विकला चित्तवृत्तिर्जडता ।
इयं च मोहात् पूर्वतः परतश्च जायते । यदाहुः—
कार्याविवेको जडता, पश्यतः शृण्वतोऽपि वा ।
तद्विभावाः प्रियानिष्टदर्शनश्रवणे रुजा ॥
अनुभावास्त्वमी तूष्णीम्भाव-विस्मरणादयः ।
स पूर्वं परतो वा स्यान्मोहादिति विदां मतम् ॥ इति ।
मन्दोदर्या विलापोऽयम् । लीलया अनायासेनेव विहितः सिन्धुबन्धनः सागरबन्धनो येन
सोऽयं परिचितो दिव्यपराक्रमशाली मर्मोपस्थितो रामचन्द्रो लङ्कामागच्छति । किन्तु
दशाननो रावणो दर्पेण दुर्विलसितो दुराग्रहो, रामस्य समर्चां न करोति, तं द्वेष्टि । अत
एव कुलक्षयो निकट एव । अशरणा क्व गच्छामीति । अत्र कुलस्यैव क्षय इत्यालम्बन-
विभावो, रघुनन्दनागमनमुद्दीपनविभावः, स्थैर्यस्य स्थिरताया अभावः चञ्चलताऽनुभावः ।
उद्वेगस्येव = आवेगस्येव चिन्तायाः प्राधान्येन प्रतीत्यभावात् । चर्वणायाम् = आस्वाद-
काले । गुणत्वेन===अङ्गतया ।
जडताख्यं भावं लक्षयति—चिन्तेति । चिन्तोत्कंपभयेति पाठान्तरम् । उत्कर्षाति-
शयादपि कर्त्तव्यमौग्ध्येन जडता भवति । चिन्तादि-समुत्पन्ना किङ्कर्त्तव्यविमूढता
जडता । इष्टस्यानिष्टस्य च दर्शनेन श्रवणेन चेत्यर्थः ।
इयं जडता । मोहात् = मूर्च्छनात् । कार्याविवेक इति । किमपि पश्यतः
शृण्वतो वा जनस्य कर्त्तव्यनिर्धारणाज्ञानं जडता । तस्याः विभावाः प्रियस्य इष्टस्य
अनिष्टस्य च दर्शन-श्रवणे रोगश्च, अनुभावास्तु तूष्णीम्भावो विस्मृतिश्चेत्यादयः ।
( चाञ्चल्य ) के द्वारा जैसे उद्वेग ( आवेग ) दृष्ट हो रहा है, वैसे चिन्ता प्रधानरूप से
प्रतीत नहीं होती है । परन्तु आवेग-भाव के आस्वादनकाल में उसके पोषक के रूप में
अङ्ग बनकर चिन्ता भी यहाँ सम्मिलित होकर विषय बनती है ।
[L25

उदाहरणम्—
यदवधि दयितो विलोचनाभ्यां, सहचरि ! दैववशेन दूरतोऽभूत् ।
तदवधि शिथिलीकृतो मदीयैरथ करणैः प्रणयो निजक्रियासु ॥
प्रियविरहोऽत्र विभावः, करणैश्चक्षुःश्रवणादिभिः क्रियासु तत्तत्प्रमितिषु
प्रणयस्य शिथिलीकरणमनुभावः । मोहे चक्षुरादिभिश्चाक्षुषादेरजननम्, इह तु
प्रकारविशेषवैशिष्ट्येन बाहुल्येनाजननमिति तस्मादस्य विशेषः । अत एवो-
दाहरणे शिथिलीकृत इत्युक्तं, न तु त्यक्त इति ।
अतितृप्ति-गर्भ-व्याधि-श्रमादिजन्या चेतसः क्रियाऽनुन्मुखताऽऽलस्यम् ।
उदाहरति—यदवधीति । हे सहचरि सखि ! दैववशेन भाग्यवशात् मम दयितः
प्रियः यदवधि यस्मात्कालादारभ्य मम विलोचनाभ्यां दूरतोऽभूद् दूरं गतवान्, तदवधि
तस्मादेव कालात् मदीयैः करणैः चक्षुरादिभिः निजक्रियासु दर्शन-श्रवणादिषु प्रणयः
स्वव्यापारासक्तिरूपः, शिथिलीकृतो मन्दीकृतः । अत्र 'अथे'ति पादपूरणे । 'प्रणयो
निजे'त्यत्र पूर्वान्त्य-परादिवर्णयोः सहावस्थानेनाश्लीलत्वम् ।
प्रमितिषु चाक्षुषप्रत्यक्ष-श्रावणप्रत्यक्षादिषु । ननु मोहजडतयोर्ज्ञानवैकल्य-
रूपत्वात् कुतः पृथगुपादानमिति समाधत्ते—मोह इति । मोहे इन्द्रियाणां सर्वथा क्रिया-
शून्यत्वं, जडतायां तु ईषत्कार्यकरत्वं, न सर्वथा ज्ञानाभाव इत्युभयोर्वैलक्षण्येन पृथगु-
पादानम् । प्रकारेति तत्तदसाधारणरूपेण बहुशो न तु सर्वथा । तेन क्वचिच्चाक्षुषादे-
जननमपि जडतायां, मोहे तु सामान्यरूपेणैव तदजननमिति ।
आलस्यं लक्षयति—अतितृप्तीति । अतिसन्तुष्टि-गर्भरोगश्रमादिकारणेन
उदाहरण—हे सखि ! जब से मेरे प्रियतम भाग्यवश मेरी आँखों से दूर हो
गये हैं, उसी समय से मेरी आँख-कान आदि इन्द्रियों ने अपने देखना-सुनना आदि कार्यों
में स्नेह को मन्द कर दिया है ।
यहाँ प्रिय का विरह विभाव है, करणों ( साधनों ) आँख-कान आदि से
कार्यों में—उन-उन इन्द्रियों की प्रमितियों ( प्रत्यक्षों ) में प्रणय ( स्नेह ) का मन्द
करना अनुभाव है । मोह-भाव में आँख आदि से चाक्षुषादि प्रतीति नहीं होती और
यहाँ जड़ता भाव में उन-उन असाधारण विशेषताओं के द्वारा अधिकतर रूप से प्रतीति
नहीं होती, किन्तु कहीं-कहीं प्रतीति होती भी है । इसलिए मोह से जड़ता का पार्थक्य
ही है । मोह में इन्द्रियों के विषयों से सम्पर्क होने पर भी कदापि कुछ भी प्रतीति नहीं
होती है, जब कि जड़ता में स्थूल रूप से कुछ-कुछ होती है ।
इसलिए पूर्वोक्त उदाहरण में 'शिथिलीकृत' कहा है, 'त्यक्त' नहीं ।
अत्यन्त तृप्ति, गर्भ, व्याधि, श्रम आदि के कारण उत्पन्न मन में कार्य न करने
की प्रवृत्ति को आलस्य कहते हैं ।

३२६ रसगङ्गाधरः
अत्र च नासामर्थ्यम्, नापि कार्याकार्यविवेकशून्यत्वम् । तेन कार्य-करणः
रूपस्यानुभावस्य तुल्यत्वेऽपि ग्लानेर्जडतायाश्चास्य भेदः ।
उदाहरणम्—
निखिलां रजनीं प्रियेण दूरादुपयातेन विबोधिता कथाभिः ।
अधिकं नहि पारयामि वक्तुं सखि ! मा जल्प, तवायसी रसज्ञा ॥
एषा हि प्रियागमनद्वितीयदिवसे मुहुर्निशावृत्तान्तं पृच्छतीं सखीं प्रति
रजनिजागरणजनितालस्यायाः कस्याश्चिदुक्तिः । अत्र रजनिजागरणं विभावः,
अधिकसम्भाषणाभावोऽनुभावः ।
समुत्पन्ना चित्ते या व्यापाराप्रवृत्तिः सैव आलस्यम् । वस्तुतो व्यापारमन्थरता, न तु
व्यापाराभावः । अन्यथा भावरूपालस्यस्य अभावरूपतापत्तिः स्यात् ।
कार्यस्याकरणरूपोऽनुभावः आलस्य-ग्लानि-जडतासु एक एवेति कथं त्रयाणां
नैक्यमिति प्रतिपादयति—अत्र चेति । आलस्ये असामर्थ्यं कार्यकरणे अशक्तिर्न भवति,
ग्लानौ तु भवतीत्युभयोर्भेदः । आलस्ये कर्त्तव्याकर्त्तव्यज्ञानाभावो न भवति, जडतायां तु
भवतीत्युभयोर्भेदः ।
उदाहरति—निखिलामिति । हे सखि ! दूराद् दूरदेशात्, चिराद् उपयातेन
प्रियेण कथाभिर्वार्तालापादिभिः अहं निखिलां सम्पूर्णां रजनीं रात्रि विबोधिता
जागरिता । रजनीमित्यत्रात्यन्तसंयोगे द्वितीया । अत एवालसाहम् इतोऽधिकं वक्तुं नहि
पारयामि । त्वं मा जल्प । मन्ये, तव रसज्ञा जिह्वा आयसी लौहनिर्मिता वर्तते, यन्मां
श्रान्तामपि वारं वारं रात्रिवृत्तान्तं पृच्छसीति ।
कथाभिरिति । चिरान्मिलितायां प्रियायां केवलाभिः कथाभिरेव रात्रिजागरण-
मनुपपन्नं सत् कथाभिरित्यस्य वाच्यमविवक्षितं, लक्षणया सुरतव्यापारं गमयति ।
इस आलस्य भाव में कार्य करने में सामर्थ्य का अभाव नहीं रहता है (जब कि
ग्लानि में रहता है ) और कर्त्तव्य एवं अकर्त्तव्य के ज्ञान का अभाव भी नहीं रहता है
( जब कि जड़ता में रहता है ) । इसीलिए 'कार्य का न करना' रूप अनुभाव के
( आलस्य, ग्लानि और जड़ता-इन तीनों भावों में ) तुल्य रहने पर भी ग्लानि और
जड़ता से इस आलस्य का भेद ही है ।
उदाहरण—हे सखि ! दूर देश से ( या बहुत दिन पर ) आये हुए प्रिय ने
मुझे अनेक कथा-चर्चादियों के द्वारा पूरे रातभर जगाये रखा है । अतः मैं इससे
अधिक बोल नहीं सकती हूँ । अब तू मत बोलो । क्या तेरी जिह्वा लोहे की बनी है ?
( जो मुझे अत्यन्त थकी रहने पर भी बार-बार पति-वृत्तान्त पूछ रही हो और जिह्वा
थकती ही नहीं है ? )
प्रिय के आगमन के दूसरे दिन में बार-बार रात्रि-वृत्तान्त पूछती हुई सखी के

प्रथमाननम् ३२७
जडतायां मोहात् पूर्ववर्त्तित्वमुत्तरवर्त्तित्वं वा नियतं, न त्वत्रेत्यपरो
विशेषः । गोपनीयविषयत्वाद् यदि कथाभिरित्यविवक्षितवाच्यं, तदा श्रमोऽस्तु
परिपोषकः, श्रमजन्ये ह्यालस्ये श्रमस्य परिपोषकताया अवार्यत्वात् । अति-
तृप्त्यादिजनिते त्वालस्ये श्रमाद् विविक्तविषयत्वं बोध्यम् ।
परोत्कर्षदर्शनादिजन्यः परनिन्दादिकारणभूतश्चित्तवृत्तिविशे-
षोऽसूया ।
इमामेवासहनादिशब्देन व्यवहरन्ति । यथा—
गोपनीयत्वाद् वाच्यरूपेण तस्योपादानं न कृतं, लज्जारक्षणाय च । तेन सुरतेन श्रमाति-
शयो व्यङ्ग्यार्थो लभ्यते, किन्तु तज्जन्यमेवालस्यं प्रधानमेव । श्रमस्य स्वजन्यालस्यपरि-
पोषकत्वमपरिहार्यम् । न च श्रमं विनालस्यं न सम्भवतीति वाच्यम्, अतितृप्ति-गर्भ-
व्याधिजन्य आलस्ये श्रमरहितोदाहरणसम्भवात् ।
असूयाख्यं भावं लक्षयति—परेति । परस्य उत्कृष्टत्वदर्शनेन उत्पन्ना, तन्नि-
न्दायाः कारणस्वरूपा चित्तवृत्तिरसूया । इमामसूयामेव असहनासहिष्णुतादिशब्देनापि
कथयन्ति । परगुणासहिष्णुता परदोषाविष्कृतिश्चासूयाशब्दार्थः ।
प्रति किसी नायिका की यह उक्ति है, जो रातभर जागने से अलसायी हुई है । यहाँ
रात मे जागना विभाव और अधिक बोलने का अभाव अनुभाव हैं ।
जडता भाव में मूर्च्छा से पहले या बाद में जडता का रहना नियत है, किन्तु
इस आलस्य में ऐसी बात नहीं, यह इसकी दूसरी विशेषता है । सुरत के गोपनीय विषय
होने के कारण 'कथाभिः' यह पद अविवक्षितवाच्य ध्वनि के रूप में अपने वाच्यार्थ
वार्तालाप को अविवक्षा कर सुरतव्यापाररूप लाक्षणिक अर्थ के द्वारा श्रमातिशय को ही
ध्वनित कर रहा है और तब तो यह श्रमध्वनि का ही उदाहरण हुआ, आलस्य का
नहीं, ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि श्रमध्वनि रहने पर वह आलस्य का ही पोषक है,
क्योंकि श्रम से उत्पन्न आलस्य में श्रम का पोषक होना अपरिहार्य है । ( नायक बहुत
दिन पर आया है, वह बात ही में रात बिता दे, यह संगत नही है, इसलिए 'कथा'
शब्द से सुरत अर्थ लेना आवश्यक है और लज्जानिवारणार्थ नायिका सुरत न कहकर
'कथा' से काम चला रही है । ) श्रम से असंकीर्ण आलस्य का उदाहरण अतितृप्ति
आदि से उत्पन्न रहेगा ।
दूसरे के उत्कर्ष को देखने आदि से उत्पन्न

३२८ रसगङ्गाधरः
कुत्र शैवं धनुरिदं क चायं प्राकृतः शिशुः ।
भङ्गस्तु सर्वसंहर्त्रा कालेनैव विनिर्मितः ॥
एषा भग्नहरकार्मुकस्य रामस्य पराक्रममसहमानानां तत्रत्यानां राज्ञा-
मुक्तिः । अत्र च श्रीमद्दाशरथिबलस्य सर्वोत्कृष्टताया दर्शनं विभावः, प्राकृत-
शिशुपदगम्या निन्दानुभावः ।
तृष्णालोलविलोचने कलयति प्राचीं चकोरव्रजे,
मौनं मुञ्चति किञ्च कैरवकुले, कामे धनुर्धुन्वति ।
माने मानवतीजनस्य सपदि प्रस्थातुकामेऽधुना
धातः ! किं नु विधौ विधातुमुचितो धाराधराडम्बरः ॥
कुत्रेति । जनकनगरे धनुर्यज्ञे रामविद्वेषिणामुक्तिरियम् । कुत्र पुरुषोत्थापना-
शक्यमिदं शैवं शिवसम्बन्धि धनुः ? अयं रामः प्राकृतो वैशिष्ट्यरहितः साधारणः शिशु-
र्बालिश्च क्व ? उभयोः सम्बन्धोऽसम्भव एव । तेन धनुर्भङ्गो नैव रामेण सम्भाव्यते ।
तर्हि तद् भग्नं कथमिति चेदुच्यते, तस्य भङ्गस्तु सर्वसंहारकेण कालपुरुषेणैव विनिर्मितो
निर्धारितः । धातूनामनेकार्थत्वाद् रचनार्थकस्य निर्मितेः करणार्थे प्रयोगः । निदर्शना-
लङ्कारः ।
भग्नहरकार्मुकस्य भग्नं हरकार्मुकं शिवधनुर्येन । तत्रत्यानां धनुर्यज्ञे सीता-
परिणयार्थमागतानां राज्ञाम् ।
पुनरसूयाममर्षसङ्कीर्णामुदाहरति — तृष्णेति । अत्र कस्यचिद् राजकुमारस्या-
गमनं प्रस्तुतं सहसाऽवरुद्धमिति अप्रस्तुतेन चन्द्रवृत्तान्तेन वर्णितम् । चन्द्रोदयकाल एव
मेघाडम्बरविघातारं धातारं कश्चिदाक्रोशति — हे धातः अधुना सायंकाले चन्द्रोदयावसरे
तृष्णया चन्द्रिकाप्राप्तीच्छया लोले चञ्चले विलोचने यस्य तस्मिन्, चकोरसमुदाये प्राचीं
दिशं कलयति पश्यति सति, किञ्च अपि च, कैरवकुले कुमुदगणे मौनं दिवाकृतमुद्रणं
मुञ्चति सति, कामदेवे धनुः धुन्वति कम्पयति सति, मानवतीजनस्य माने प्रणयकोपे
कहाँ यह शिव का धनुष और कहाँ यह साधारण बालक (राम) ? इस
धनुष का भङ्ग तो सबों के संहार करने वाले कालपुरुष ने ही किया है ।
यह शिवधनुष को तोड़ने वाले राम के पराक्रम को न सहने वाले वहाँ सीता-
परिणय के लिए उपस्थित राजाओं की उक्ति है । यहाँ श्रीमान् दाशरथि राम के सैन्यों
की सर्वोत्कृष्टता देखना विभाव एवं 'साधारण शिशु' पद से ध्वनित निन्दा अनुभाव है ।
अमर्षमिश्रित असूया का उदाहरण—हे विधाता ! अभी चन्द्रोदय होने के
समय सायंकाल में जब चांदनी को देखते हेतु चंचल आँखों वाले चकोरगण पूरब
की ओर देखने लगे, कुमुदिनी-वन अपनी चुप्पी (संकुचित होना) छोड़ने लगे, काम-

प्रथमाननम् ३२९
अत्रापि यद्यपि तदीयोच्छृङ्खलतादि-दर्शनजन्या, अनुचितकारित्वरूप-
निन्दाप्रकाशानुभाविता, कविगता, विधात्रालम्बनामूया व्यज्यत इति शक्यते
वक्तुम्, तथापि कार्यकारणयोस्तुल्यत्वादभिव्यक्तेनामर्षेण शवलितैवासौ न
विविक्ततया प्रतीयते । नहि विधातुरपराध इव भगवतो रामस्यापराधोऽस्ति,
येन कवेरिव वीराणामप्यमर्षोऽभिव्यज्येत । स्वभावो हि महोन्नतक्रियानिष्पादनं
वीराणाम् ।
प्रस्थातुकामे प्रस्थानमुद्यते सति, विधौ चन्द्रे, धाराधराडम्बरः मेघाच्छन्नत्वं किं नु त्वया
विधातुमुचितः ? सर्वथा नैवोचित इत्यर्थः ।
तदीया धातुः, उच्छृङ्खलता अनुचितकारिता । विधात्रालम्बना विधातृ-
सम्बन्धिनी । कार्यकारणयोः अनुभावविभावयोः निन्दाप्रकाशोच्छृङ्खलनादर्शनयोः तुल्य-
त्वात्, समानत्वात्, असूयामर्षयोस्तुल्यविभावानुभावकत्वादेककालोपस्थितावसूयामर्षौ ।
शबलितैव मिश्रितैव । विविक्ततया पृथक्तया । नहीति । अमर्षमिश्रितासूयो-
दाहरणे प्रस्तुतपद्ये विधातुरपराधेन कवेरमर्षः । शुद्धासूयोदाहरणे "कुत्र शैवम्" इत्यादि
पद्ये रामस्यापराध एव नास्ति, येन वीराणाममर्षः स्यात् । वीरो हि रामो नैवापराधी,
स स्वभावतो महोन्नतिप्रदकार्ये धनुर्भङ्गे प्रवृत्तो न तु मत्सरतया ।
देव अपने धनुष को कँपाने लगे और मानवती जनों के मान झट से प्रस्थान करने लगे,
तब उसी समय चन्द्रमा पर यह मेघ की घटा लाद देना क्या उचित हुआ ?
यहाँ यद्यपि विधाता की उच्छृंखलता (मनमानी) के दर्शन में उत्पन्न 'अनुचित
किया विधाता ने' इस निन्दा से अनुभावित कविगत विधाता-विषयक असूया अभिव्यक्त
हो रही है-ऐसा कहा जा सकता है, तथापि उसी समय अभिव्यक्त अमर्ष (अपराध
के कारण बिगड़ना या चुप होना) के साथ वह मिश्रित रूप से ही प्रकाशित हो रही
है, पृथक् स्वतन्त्र रूप से नहीं। असूया एवं अमर्ष के विभाव और अनुभाव यहाँ समान
(एक) ही हैं, इस कारण दोनों समानकाल में हो प्रतीत होते हैं। अतः यह उदाहरण
अमर्षसंकीर्ण असूया का है।
पूर्वोदाहृत 'कुत्र शैवं' पद्य शुद्ध-असूया का उदाहरण है, क्योंकि जैसे 'तृष्णा-
लोल' पद्य में विधाता का अपराध है, वैसे इस पद्य में भगवान् राम का अपराध नहीं
है, जिससे कि विधाता के प्रति कवि के अमर्ष के समान वीरों को भी राम के प्रति
अमर्ष हो । शिव के धनुष को तोड़ना अपराधवश नहीं, स्वभाववश ही राम के द्वारा
हुआ, क्योंकि महान् उन्नतिदायक कार्य करना वीरों का स्वभाव ही है।

३३० रसगङ्गाधरः
अत्राप्रस्तुत-चन्द्रवृत्तान्तेन प्रस्तुत-राजकुमारादिवृत्तान्तस्य ध्वननान्ना-
स्त्यसूयाध्वनित्वमिति तु न वाच्यम्, एकध्वनेर्ध्वन्यन्तराविरोधित्वात् । अन्यथा
महावाक्यध्वनेरवान्तरवाक्यध्वनिभिः, तेषां च पदध्वनिभिः सह सामानाधि-
करण्यं कुत्रापि न स्यात् ।
वियोग-शोक-भय-जुगुप्सादीनामतिशयाद् ग्रहावेशादेश्चोत्पन्नो
व्याधिविशेषोऽपस्मारः ।
व्याधित्वेनास्य कथनेऽपि विशेषाकारेण पुनः कथनं बीभत्स-भयानक-
योरस्यैव व्याधेरङ्गत्वं नान्यस्येति स्फोरणाय । विप्रलम्भे तु व्याध्यन्तर-
स्यापि च ।
अत्रेति । “तृष्णालोलेति” पद्ये चन्द्रवृत्तान्तेन राजकुमारवृत्तान्तोऽपि ध्वन्यते ।
तत्समकालमेवासूयाध्वनिः स्वतन्त्रतयैव प्रतीयते । उभयध्वनेरेकत्र समावेशे न कश्चिद्वि-
रोधः । महावाक्ये प्रबन्धरूपे अनेकध्वनीनां समावेशः । एकस्मिन् वाक्येऽनेकपदध्वनीनां
प्रतीतिर्भवत्येव ।
अपस्मारभावं लक्षयति―वियोगेति । वियोगादीनामाधिक्याद् भूताद्यावेशाच्च
समुत्पन्नश्चित्तविक्षेपरूपो व्याधिरेवापस्मारः । व्याधावस्मिन् ज्ञानहरण-कम्प-स्वेद-लाला-
निपातादयो भवन्ति । ग्रहपदेनात्र पूतनादयो बालपिशाचा भूतादयो वा ग्राह्याः ।
विरहादयोऽत्र विभावाः । निपतनादयोऽनुभावाः ।
ननु व्याधिभावः पृथगुक्तस्तद्विशेषस्यापस्मारस्य तदन्तर्गतत्वेन पृथगुपादानं
यहाँ अप्रस्तुत चन्द्रवृत्तान्त के द्वारा प्रस्तुत ( वर्णनीय ) राजकुमार के वृत्तान्त
के ध्वनित होने से अप्रस्तुतप्रशंसालंकारध्वनि ही है, न कि असूयाध्वनि, ऐसा नहीं
कह सकते; क्योंकि एक ध्वनि दूसरे ध्वनि का विरोधी नहीं है । तात्पर्य यह है कि एक ही
जगह दो स्वतन्त्र प्रधान ध्वनियों का समावेश हो सकता है । अतः यहाँ दोनों ध्वनि हैं ।
यदि एकत्र एक ही ध्वनि रहे तो प्रबन्ध या प्रकरण रूप महावाक्यस्थित ध्वनि का उस
प्रकरणस्थ लघुवाक्यस्थ ध्वनियों के साथ एवं एकवाक्यस्थ ध्वनि का पदध्वनि के साथ
सहावस्थिति ( एक साथ रहना ) कहीं भी न होती ।
वियोग, शोक, डर, घृणा आदि के अत्यधिक होने पर या भूत लगने से उत्पन्न
चित्तविक्षेपरूप ( जिसमें गिरना, कँपकँपी, मुंह से लार आना आदि हो जाते हैं )
व्याधि-विशेष को अपस्मार ( मृगी ) कहते हैं ।
व्याधिसंज्ञक भाव पहले ही प्रदर्शित हो चुका है और यह अपस्मार भी तो
व्याधि ही है । व्याधिरूप में इसका कथन सामान्यरूप से यद्यपि हो चुका है, तथापि
विशेषरूप से इसका यहाँ पुनः कथन इसलिए हुआ है कि बीभत्स और भयानक रस में

प्रथमाननम् ३३१
उदाहरणम्—
हरिमागतमाकर्ण्य मथुरामान्तकान्तकम् ।
कम्पमानः श्वसन् कंसो निपपात महीतले ॥
अत्र भयं विभावः, कम्प-निःश्वास-पतनादयोऽनुभावाः ।
अमर्षादिजन्या वाक्पारुष्यादिकारणीभूता चित्तवृत्तिश्चपलता ॥
यदाहुः—
अमर्षप्रातिकूल्येष्र्यारागद्वेषाश्च मत्सरः ।
इति यत्र विभावाः स्युरनुभावस्तु भर्त्सनम् ॥
व्यर्थमिति चेन्न; वीभत्स-भयानकयोरपस्माररूप एक एव व्याधिराश्रीयते नान्य इति
सूचनाय विशेषसाधनत्वात् । विप्रलम्भशृङ्गारे अपस्मारेण सहैवान्यव्याधिरपि दृश्यते ।
हरिमिति । अन्तकस्य यमराजस्यापि अन्तकं विनाशकं हरिं श्रीकृष्णं मथुरां
कंसस्य राजधानीम् आगतम् आकर्ण्य चारमुखात् श्रुत्वा कंसः भयात् कम्पमानः श्वसन्
महीतले निपपात । अत्र हर्यागमनजन्यं भयं विभावः, कम्प-श्वास-निपतनानि चानुभावाः ।
चपलताख्यं भावं लक्षयति—अमर्षेति । असहिष्णुताद्वेषादिसमुत्पन्ना कठोर-
वाक्प्रयोग-ताडनादिजनिका चित्तवृत्तिरेव चपलता । "अमर्षादिजन्य-वाक्पारुष्यादि"-
पाठो भट्टमथुरानाथ-केदारनाथसम्मतोंऽपि न समीचीनो "विशेषणद्वयस्य गुणानाञ्च
परार्थत्वादसम्बन्धः समत्वाद्" इति मीमांसकसिद्धान्तेनान्वयासम्भवात् "समासस्य दुर्घट-
तयोपेक्षित" इति कविशेखरचरणैरूक्तत्वाद्, असूयादिभावलक्षणे मूलकृता तथैवाचरणाच्च ।
चपलता हि अमर्षादिजन्या सती वाक्पारुष्यादि जनयति । नहि अमर्षजन्यं वाक्पारुष्यं,
तत्कारणस्य चपलता रूपस्य विद्यमानत्वादिति ।
अमर्षप्रातिकूल्येति । यत्र चपलतायामिति । अमर्षः, प्रतिकूलता, ईर्ष्या,
द्वेषः, मत्सरोऽन्यशुभेद्वेषः इत्येते कारणत्वेन विभावाः । भर्त्सनं तर्जनं, वाक्पारुष्यं कठोर-
इसी व्याधि का ग्रहण होता है, अन्य का नहीं । जब कि विप्रलम्भ शृंगार में अपस्मार
ही नहीं, अन्य किसी भी व्याधि का ग्रहण होता है ।
यमराज के भी अन्तकारक ( सर्वशक्तिमान् ) श्रीकृष्ण को मथुरा में आया
हुआ सुनकर काँपता एवं तेज साँस लेता हुआ कंस पृथ्वी पर गिर गया ।
यहाँ भय विभाव एवं कम्प, निःश्वास, गिरना आदि अनुभाव हैं ।
अमर्ष ( अपराधी के प्रति असहिष्णुता ), ईर्ष्या, द्वेष आदि से उत्पन्न एवं
कठोरवचन, मारना, पीटना, कोसना आदि का कारण जो चित्तवृत्ति है उसे चपलता
( चञ्चलता ) कहते हैं । अमर्ष से चपलता एवं उससे वाक्पारुष्यादि यही क्रम है ।
जैसा कि कहा है—अमर्ष ( असहिष्णुता ), प्रतिकूलता, ईर्ष्या, राग, द्वेष और
मत्सर ( अन्य की उन्नति से जलन )—ये जहाँ विभाव हों और डाँटना, कठोर वचन

३३२ रसगङ्गाधरः
वाक्पारुष्यं प्रहारश्च ताडनं वधबन्धने ।
तच्चापलमनालोच्य कार्यकारित्वमिष्यते ॥ इति ।
उदाहरणम्-
अहितव्रत ! पापात्मन् ! मैवं मे दर्शयाननम् ।
आत्मानं हन्तुमिच्छामि, येन त्वमसि भावितः ॥
एषा भगवदनुरक्तिविघटनोपायमपश्यतः, प्रह्लादं प्रति हिरण्यकशि-
पोरुक्तिः । भगवद्द्वेषोत्थापितः पुत्रद्वेषोऽत्र विभावः, आत्मवधेच्छा परुषवचनं
चानुभावः ।
वाक्प्रयोगः, प्रहारः, ताडनं, वधः, बन्धनमित्यादयोऽनुभावाः कार्यरूपाः । अनालोच्य
अविचार्यैव कार्यकरणं चापलं चपलताख्यो भावः । उदाहरति—अहितेति । 'अस्य
विष्णोर्हितमहितं मदपकारं वा व्रतमङ्गीकृतं यस्य स तत्सम्बुद्धौ । पितुरादेशावहेलनात्
पापस्वरूप प्रह्लाद ! त्वं मे मह्यम् आननं स्वमुखम् एवं = धृष्टवन्मा दर्शय । त्वदाचरण-
परिवर्त्तनाय वधाय वा अप्रतीकारः सन्नहं स्वात्मानमेव हन्तुमिच्छामि, येन मया त्वं
भावित उत्पादितोऽसि । त्वदुत्पादनेन त्वत्कृतानिष्टाचरणस्य पापो ममैवेति भावः ।
चिरकालेति । चिरकालाद् विद्यमानत्वेनेत्यर्थः । सदैव भगवदनुरागिणि
प्रह्लादे सदैव हिरण्यकशिपोरमर्षः, किन्तु न सदैव न वा प्रारम्भकाले आत्मवधेच्छा,
अपि तु चिरवर्षदिनन्तरमेव । अत आत्मवधेच्छा नामर्षमात्रजन्या । इयम् आत्मवधेच्छा
एव प्रथमा इति इदम्प्रथमा तस्या भाव इदम्प्रथमता प्रथमोत्पत्तिः । इदम्प्रथमकार्यम्
आत्मवधेच्छा । इदम्प्रथमकारणं चपलता । प्राचीनचित्तवृत्तिः चिरकालात् स्थितोऽमर्षः ।
सद्यः प्राथम्येनोत्पन्नाया आत्मवधेच्छायाः कारणं सद्यः तत्पूर्वक्षणे समुत्पन्ना चपलतैव,
न तु चिरकालात् स्थितोऽमर्ष इत्यत्र चपलताध्वनिरेव ।
बोलना, प्रहार करना, पीटना, वध करना और बांधना-ये जहाँ अनुभाव हों, वह बिना
सोचे-विचारे कार्य करना चपलता है ।
उदाहरण-हे अनिष्ट कार्य करने की प्रतिज्ञा वाला ! पिता की आज्ञा को
उपेक्षित करने के कारण पापस्वरूप ! प्रह्लाद ! तू इस तरह निर्लज्ज होकर अपना
मुंह मत दिखा । अब मैं आत्महत्या ही कर लेता हूँ ( क्योंकि बहुत प्रयास से भी न तो
तुझे सुधार सका और न ही मार सका ), क्योंकि तुझे पैदा करने के कारणस्वरूप तेरा
दुराचार मेरा ही अपराध है ।
यह भगवान् में (प्रह्लाद के) अनुराग को हटाने के उपाय को न देखने पर
हिरण्यकशिपु की प्रह्लाद के प्रति उक्ति है । भगवान् के प्रति विद्यमान द्वेष के कारण
समापतित भगवद्भक्त पुत्र के प्रति द्वेष यहाँ विभाव है और आत्महत्या की इच्छा तथा
कठोर वचन अनुभाव है ।

न चामर्ष एवात्र व्यज्यत इति वाच्यम्, सदैव भगवदनुरागिणि प्रह्लादे
हिरण्यकशिपोरमर्षस्य चिरकालसम्भूतत्वेनात्मवधेच्छाया इदमप्रथमतानुपपत्तेः,
इदमप्रथमकार्यस्य चेदमप्रथमकारणप्रयोज्यतया प्राचीनचित्तवृत्तिविलक्षणया
एव चपलताख्यचित्तवृत्तेः सिद्धेः । न चामर्षप्रकर्ष एवात्मवधेच्छादिकारणमभि-
व्यज्यतामिति वाच्यम्, प्रकर्षस्यापि स्वाभाविक-विलक्षणलक्षणतया आवश्य-
कतया तस्यैव चपलतापदार्थत्वात् ।
नीचपुरुषेष्वाक्रोशनाधिक्षेप-व्याधि-ताडन-दारिद्र्येष्टविरह-परसम्प-
द्दर्शनादिभिः, उत्तमेषु त्ववज्ञादिभिर्जनिता विषयविद्वेषाख्या रोदन-दीर्घ-
श्वास-दीनमुखतादिकारिणी चित्तवृत्तिर्निर्वेदः ।
स्वाभाविकेति । स्वाभाविकाद् विलक्षणं लक्षणं यस्याः सा, तस्याः भावः ।
अमर्षस्य स्वभावः चिरकालिकः, स तु नात्मवधेच्छाजनकः, ततो विलक्षणमेवोत्कटा-
मर्षस्तज्जनकः । उत्कटावस्था हि स्वाभाविकावस्थाविलक्षणा भवत्येव । उत्कटामर्ष एव
चपलता वैलक्षण्यातिशयाद् भावान्तरमिति ।
निर्वेदाख्यं भावं लक्षयति—नीचेति । आलम्बनभेदेन निर्वेदस्य द्वौ भेदौ—
नीचपुरुषगत उत्तमपुरुषगतश्च । तत्र नीचेषु भर्त्सन-गालिप्रदान-रोगादिभिः, उत्तम-
पुरुषेषु अपमानादिभिः सांसारिकविषयाद् विरागरूपा चित्तवृत्तिर्निर्वेदो जायते ।
वस्तुतस्तु अवज्ञा उत्तमेष्वेव न नीचेषु, आक्रोश-ताडन-परसम्पद्दर्शनैर्नीचेष्वेव नोत्तमेषु
अमर्ष भाव ही यहाँ अभिव्यक्त हो रहा है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि सतत
भगवान् में अनुरागवाले प्रह्लाद में हिरण्यकशिपु का अमर्ष चिरकाल से विद्यमान
रहने के कारण 'आत्मवधेच्छा का अभी-अभी प्राथमिकरूप से होना संगत नहीं होता है
( यदि आत्मवधेच्छा अमर्ष से ही होती तो इससे पहले भी विद्यमान अमर्ष के द्वारा
होती रहती, अभी ही क्यों हुई और इससे पहले क्यों नहीं हुई ? ) । पहले-पहल
उत्पन्न कार्य का पहले-पहल समागत कारण से ही उत्पत्ति युक्त है, अतः चिरकाल से
विद्यमान चित्तवृत्ति से विलक्षण ही एक चित्तवृत्ति, जो अभी-अभी हुई है, इसका
कारण है और वही तो चपलता है ।
यदि यह कहे कि उत्कट-अमर्ष ही आत्मवधेच्छा के कारण के रूप में ध्वनि बन
रहा है तो ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि प्रकर्ष ( उत्कृष्ट, अतिशय ) अमर्ष भी
स्वाभाविक ( सामान्य ) से विलक्षण है, ऐसा मानना तो आवश्यक ही है और वही
अमर्ष-प्रकर्ष तो चपलता कहलाता है ।
निर्वेद भाव दो प्रकार का है—नीचपुरुषगत एवं उत्तमपुरुषगत । नीच पुरुष
में गाली-गलौज, तर्जन, रोग, मारपीट, दरिद्रता, विरह, दूसरों की उन्नति देखना
आदि के कारण एवं उत्तम पुरुष में अपमान आदि के कारण से सांसारिक विषयों से

३३४ रसगङ्गाधरः
उदाहरणम्—
यदि लक्ष्मण ! सा मृगेक्षणा, न मदीक्षासरणिं समेष्यति ।
अमुना जडजीवितेन मे, जगता वा विफलेन किं फलम् ॥
नित्यानित्यवस्तुविवेकजन्यत्वाभावान्नासौ रसपदव्यपदेशहेतुः ।
देवादिविषया रतिर्यथा—
निर्वेदो जायते, अधिक्षेप-व्याधि-दारिद्र्येष्टविरहादिभिस्तु उभयेषु उत्तमे रामचन्द्रे
विरहेणैव निर्वेदस्यानुपदमेवोदाहृतत्वादिति । अनुभावास्तु उभयेषु रोदनादयः ।
उदाहरति—यदीति । सीताहरणापमानेन विरहेण वा रामस्येयमुक्तिः । हे
लक्ष्मण ! सा मृगनयना सीता यदि मदीक्षासरणिं मन्नेत्रपथं न समेष्यति, ( तदा ) मे
मम अमुना दुरवस्थापन्नेन जडवज्जीवनेन, विफलेन निरर्थकेन, जगता संसारेण वा किं
फलम् ? न किमपीत्यर्थः । अत्र फलशब्दस्य द्विरुपादानरूपस्य कथितपदत्वदोषस्य
परिहाराय 'फलम्' इत्यस्य स्थाने 'भवेत्' इति पाठ्यम् । उत्तरवाक्ये 'तदा' इति
आक्षेपलभ्यम् ।
ननु निर्वेदस्य स्थायिभावत्वादत्र शान्तरसध्वनिरेव कथं न प्रतीयत इति चेत्
समाधत्ते—नित्यानित्येति । योऽसौ स्थायीभावो निर्वेदः स हि नित्यानित्यवस्तुविवेक-
जन्यः । भावरूपस्यास्य निर्वेदस्य तु आक्रोशादिजन्यत्वादुभयोर्वैषम्यम् ।
चतुस्त्रिंशं भावं रतिमुदाहरति—यथेति । रतिर्हि द्विविधा—स्त्रीपुरुषयोः
परस्परानुरागात्मिका स्थायीभावस्वरूपा शृङ्गाररसाधारभूता प्रथमा, देवता-गुरु-मित्र-
पुत्रादि-विषयक-प्रेमाख्यचित्तवृत्तिस्वरूपा व्यभिचारिभावात्मिका द्वितीया । पूर्वनिरूपि-
विरक्तिस्वरूप निर्वेद उत्पन्न होता है, जो रोना, लम्बी साँस, दीन मुँह होना आदि
का कारण है । वस्तुतः गाली, मारपीट और परसम्पत्तिदर्शन से नीचों में ही और
अवज्ञा से उत्तमों में ही तथा विरहादि से दोनों में निर्वेद देखा जाता है । अतएव उत्तम
श्रीराम में विरह ने निर्वेद का उदाहरण प्रस्तुत हो रहा है ।
हे लक्ष्मण ! यदि वह प्राणप्रिया मृगनयनी सीता मेरी आँखों के सामने नहीं
आयेगी तो मेरे इस जड़ ( चैतन्यहीन ) जीवन से तथा निरर्थक इस संसार से ही क्या
फल होगा ? कुछ नहीं । यहाँ प्रिया का विरह विभाव एवं जीवन-जगत् का निष्फल
बताना अनुभाव है ।
निर्वेद दो प्रकार का है—एक शान्तरस का स्थायीभाव, जो नित्यानित्यवस्तु-
विवेक से उत्पन्न होता है और दूसरा प्रस्तुत भावरूप, जो विरहादि से उत्पन्न होता है।
यहाँ नित्यानित्यवस्तुविवेक के न रहने से रसध्वनि नहीं हो सकता है ।
देवता-गुरु-पुत्र इत्यादि विषयक रतिभाव का उदाहरण देते हैं—