रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 365, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंन चामर्ष एवात्र व्यज्यत इति वाच्यम्, सदैव भगवदनुरागिणि प्रह्लादे
हिरण्यकशिपोरमर्षस्य चिरकालसम्भूतत्वेनात्मवधेच्छाया इदमप्रथमतानुपपत्तेः,
इदमप्रथमकार्यस्य चेदमप्रथमकारणप्रयोज्यतया प्राचीनचित्तवृत्तिविलक्षणया
एव चपलताख्यचित्तवृत्तेः सिद्धेः । न चामर्षप्रकर्ष एवात्मवधेच्छादिकारणमभि-
व्यज्यतामिति वाच्यम्, प्रकर्षस्यापि स्वाभाविक-विलक्षणलक्षणतया आवश्य-
कतया तस्यैव चपलतापदार्थत्वात् ।
नीचपुरुषेष्वाक्रोशनाधिक्षेप-व्याधि-ताडन-दारिद्र्येष्टविरह-परसम्प-
द्दर्शनादिभिः, उत्तमेषु त्ववज्ञादिभिर्जनिता विषयविद्वेषाख्या रोदन-दीर्घ-
श्वास-दीनमुखतादिकारिणी चित्तवृत्तिर्निर्वेदः ।
स्वाभाविकेति । स्वाभाविकाद् विलक्षणं लक्षणं यस्याः सा, तस्याः भावः ।
अमर्षस्य स्वभावः चिरकालिकः, स तु नात्मवधेच्छाजनकः, ततो विलक्षणमेवोत्कटा-
मर्षस्तज्जनकः । उत्कटावस्था हि स्वाभाविकावस्थाविलक्षणा भवत्येव । उत्कटामर्ष एव
चपलता वैलक्षण्यातिशयाद् भावान्तरमिति ।
निर्वेदाख्यं भावं लक्षयति—नीचेति । आलम्बनभेदेन निर्वेदस्य द्वौ भेदौ—
नीचपुरुषगत उत्तमपुरुषगतश्च । तत्र नीचेषु भर्त्सन-गालिप्रदान-रोगादिभिः, उत्तम-
पुरुषेषु अपमानादिभिः सांसारिकविषयाद् विरागरूपा चित्तवृत्तिर्निर्वेदो जायते ।
वस्तुतस्तु अवज्ञा उत्तमेष्वेव न नीचेषु, आक्रोश-ताडन-परसम्पद्दर्शनैर्नीचेष्वेव नोत्तमेषु
अमर्ष भाव ही यहाँ अभिव्यक्त हो रहा है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि सतत
भगवान् में अनुरागवाले प्रह्लाद में हिरण्यकशिपु का अमर्ष चिरकाल से विद्यमान
रहने के कारण 'आत्मवधेच्छा का अभी-अभी प्राथमिकरूप से होना संगत नहीं होता है
( यदि आत्मवधेच्छा अमर्ष से ही होती तो इससे पहले भी विद्यमान अमर्ष के द्वारा
होती रहती, अभी ही क्यों हुई और इससे पहले क्यों नहीं हुई ? ) । पहले-पहल
उत्पन्न कार्य का पहले-पहल समागत कारण से ही उत्पत्ति युक्त है, अतः चिरकाल से
विद्यमान चित्तवृत्ति से विलक्षण ही एक चित्तवृत्ति, जो अभी-अभी हुई है, इसका
कारण है और वही तो चपलता है ।
यदि यह कहे कि उत्कट-अमर्ष ही आत्मवधेच्छा के कारण के रूप में ध्वनि बन
रहा है तो ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि प्रकर्ष ( उत्कृष्ट, अतिशय ) अमर्ष भी
स्वाभाविक ( सामान्य ) से विलक्षण है, ऐसा मानना तो आवश्यक ही है और वही
अमर्ष-प्रकर्ष तो चपलता कहलाता है ।
निर्वेद भाव दो प्रकार का है—नीचपुरुषगत एवं उत्तमपुरुषगत । नीच पुरुष
में गाली-गलौज, तर्जन, रोग, मारपीट, दरिद्रता, विरह, दूसरों की उन्नति देखना
आदि के कारण एवं उत्तम पुरुष में अपमान आदि के कारण से सांसारिक विषयों से