रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३४ रसगङ्गाधरः
उदाहरणम्—
यदि लक्ष्मण ! सा मृगेक्षणा, न मदीक्षासरणिं समेष्यति ।
अमुना जडजीवितेन मे, जगता वा विफलेन किं फलम् ॥
नित्यानित्यवस्तुविवेकजन्यत्वाभावान्नासौ रसपदव्यपदेशहेतुः ।
देवादिविषया रतिर्यथा—
निर्वेदो जायते, अधिक्षेप-व्याधि-दारिद्र्येष्टविरहादिभिस्तु उभयेषु उत्तमे रामचन्द्रे
विरहेणैव निर्वेदस्यानुपदमेवोदाहृतत्वादिति । अनुभावास्तु उभयेषु रोदनादयः ।
उदाहरति—यदीति । सीताहरणापमानेन विरहेण वा रामस्येयमुक्तिः । हे
लक्ष्मण ! सा मृगनयना सीता यदि मदीक्षासरणिं मन्नेत्रपथं न समेष्यति, ( तदा ) मे
मम अमुना दुरवस्थापन्नेन जडवज्जीवनेन, विफलेन निरर्थकेन, जगता संसारेण वा किं
फलम् ? न किमपीत्यर्थः । अत्र फलशब्दस्य द्विरुपादानरूपस्य कथितपदत्वदोषस्य
परिहाराय 'फलम्' इत्यस्य स्थाने 'भवेत्' इति पाठ्यम् । उत्तरवाक्ये 'तदा' इति
आक्षेपलभ्यम् ।
ननु निर्वेदस्य स्थायिभावत्वादत्र शान्तरसध्वनिरेव कथं न प्रतीयत इति चेत्
समाधत्ते—नित्यानित्येति । योऽसौ स्थायीभावो निर्वेदः स हि नित्यानित्यवस्तुविवेक-
जन्यः । भावरूपस्यास्य निर्वेदस्य तु आक्रोशादिजन्यत्वादुभयोर्वैषम्यम् ।
चतुस्त्रिंशं भावं रतिमुदाहरति—यथेति । रतिर्हि द्विविधा—स्त्रीपुरुषयोः
परस्परानुरागात्मिका स्थायीभावस्वरूपा शृङ्गाररसाधारभूता प्रथमा, देवता-गुरु-मित्र-
पुत्रादि-विषयक-प्रेमाख्यचित्तवृत्तिस्वरूपा व्यभिचारिभावात्मिका द्वितीया । पूर्वनिरूपि-
विरक्तिस्वरूप निर्वेद उत्पन्न होता है, जो रोना, लम्बी साँस, दीन मुँह होना आदि
का कारण है । वस्तुतः गाली, मारपीट और परसम्पत्तिदर्शन से नीचों में ही और
अवज्ञा से उत्तमों में ही तथा विरहादि से दोनों में निर्वेद देखा जाता है । अतएव उत्तम
श्रीराम में विरह ने निर्वेद का उदाहरण प्रस्तुत हो रहा है ।
हे लक्ष्मण ! यदि वह प्राणप्रिया मृगनयनी सीता मेरी आँखों के सामने नहीं
आयेगी तो मेरे इस जड़ ( चैतन्यहीन ) जीवन से तथा निरर्थक इस संसार से ही क्या
फल होगा ? कुछ नहीं । यहाँ प्रिया का विरह विभाव एवं जीवन-जगत् का निष्फल
बताना अनुभाव है ।
निर्वेद दो प्रकार का है—एक शान्तरस का स्थायीभाव, जो नित्यानित्यवस्तु-
विवेक से उत्पन्न होता है और दूसरा प्रस्तुत भावरूप, जो विरहादि से उत्पन्न होता है।
यहाँ नित्यानित्यवस्तुविवेक के न रहने से रसध्वनि नहीं हो सकता है ।
देवता-गुरु-पुत्र इत्यादि विषयक रतिभाव का उदाहरण देते हैं—