रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् ३१५
एषा कर्णेन पराभूतं गाण्डिवं निन्दन्तं, युधिष्ठिरं प्रति धनञ्जयस्योक्तिः।
युधिष्ठिरकर्त्तृका गाण्डिवनिन्दात्र विभावः। वधेच्छानुभावः।
न चामर्षोग्रतयोर्नास्ति भेद इति वाच्यम्, प्रागुदाहृतेऽमर्षध्वनावुग्रताया
अप्रतीतेः। नाप्यसौ क्रोधः, तस्य स्थायित्वेन अस्याः सञ्चारिणीत्वेनैव भेदात्।
विप्रलम्भ-महापत्ति-परमानन्दादिजन्माऽन्यस्मिन्नन्यावभास उन्मादः॥
शुक्तिरजतादिज्ञानव्यावृत्तये जन्मान्तम्।
गाण्डीवो गाण्डिवश्चेति सिद्धौ। युधिष्ठिरद्वारा अनुपमप्रभावस्य गाण्डिवस्य निन्द्रां श्रुत्वा
अर्जुनः उग्रतया शत्रुवधेच्छामकरोदिति भावः।
प्रागुदाहृते "वक्षोजाग्रं पाणिनेति" पद्ये। अमर्षे मौन-वाक्पारुष्याद्यनुभावाः
तस्य अनुत्कटताम्, उग्रतायां तु वध-बन्धादयोऽनुभावा उत्कटतां द्योतयन्ति। अस्या
उग्रतायाः सञ्चारिभावत्वात् क्षणिकत्वम्।
उन्मादं निरूपयति-विप्रलम्भेति। विप्रलम्भो वियोगः, महापत्तिर्घोरविपत्तिः,
अतिशयानन्दादिभ्य उत्पन्नो योऽन्यवस्तुनि तदितरवस्तुनोऽवभासो ज्ञानं, स एव उन्माद-
संज्ञको भावः। वियोगादयो विभावाः, अन्यस्मिन्नन्यावभासव्यवहारोऽनुभावः। शुक्तौ
रजतभ्रमस्थलेऽतिव्याप्तिवारणाय जन्मान्तं 'परमानन्दादिजन्मा' इत्यन्तं लक्षणे निवेशितम्।
कांपता नहीं है? अर्थात् अवश्य काँपना उचित है, मैं अवश्य इस धनुष से शत्रु का
नाश करूँगा।
यह उक्ति कर्ण से परास्त एवं गाण्डीव धनुष की निन्दा करते हुए युधिष्ठिर के
प्रति अर्जुन की है। युधिष्ठिर के द्वारा की गयी गाण्डीव की निन्दा यहाँ विभाव और
शत्रुवध की इच्छा अनुभाव है।
अमर्ष और उग्रता में भेद नहीं है—ऐसा नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि
अमर्षध्वनि के "वक्षोजाग्रम्" इस पूर्वोदाहृत पद्य में उग्रता की प्रतीतिं नहीं होती हैं।
विषयगत अनुत्कटता एवं उत्कटता ही दोनों में भेदक है। यह उग्रता क्रोध के अन्तर्गत
भी नहीं आ सकती, क्योंकि क्रोध स्थायीभाव है, जबकि उग्रता संचारीभाव (क्षणिक
है), और यही दोनों में भेद है।
वियोग, घोर विपत्ति, अतिशय आनन्द इत्यादि से उत्पन्न जो किसी एक वस्तु
में अन्य वस्तु होने का ज्ञान उसे उन्माद कहते हैं।
इस लक्षण में 'जन्मा' यहाँ तक का अंश इसलिए दिया गया कि यह लक्षण
'शुक्ति में रजत-भ्रम' स्थल में न चला जाय। रजतभ्रम का कारण वियोगादि नहीं,
अपितु चाकचिक्य, दूरत्व आदि है।