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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 359

प्रथमाननम् ३२७
जडतायां मोहात् पूर्ववर्त्तित्वमुत्तरवर्त्तित्वं वा नियतं, न त्वत्रेत्यपरो
विशेषः । गोपनीयविषयत्वाद् यदि कथाभिरित्यविवक्षितवाच्यं, तदा श्रमोऽस्तु
परिपोषकः, श्रमजन्ये ह्यालस्ये श्रमस्य परिपोषकताया अवार्यत्वात् । अति-
तृप्त्यादिजनिते त्वालस्ये श्रमाद् विविक्तविषयत्वं बोध्यम् ।
परोत्कर्षदर्शनादिजन्यः परनिन्दादिकारणभूतश्चित्तवृत्तिविशे-
षोऽसूया ।
इमामेवासहनादिशब्देन व्यवहरन्ति । यथा—
गोपनीयत्वाद् वाच्यरूपेण तस्योपादानं न कृतं, लज्जारक्षणाय च । तेन सुरतेन श्रमाति-
शयो व्यङ्ग्यार्थो लभ्यते, किन्तु तज्जन्यमेवालस्यं प्रधानमेव । श्रमस्य स्वजन्यालस्यपरि-
पोषकत्वमपरिहार्यम् । न च श्रमं विनालस्यं न सम्भवतीति वाच्यम्, अतितृप्ति-गर्भ-
व्याधिजन्य आलस्ये श्रमरहितोदाहरणसम्भवात् ।
असूयाख्यं भावं लक्षयति—परेति । परस्य उत्कृष्टत्वदर्शनेन उत्पन्ना, तन्नि-
न्दायाः कारणस्वरूपा चित्तवृत्तिरसूया । इमामसूयामेव असहनासहिष्णुतादिशब्देनापि
कथयन्ति । परगुणासहिष्णुता परदोषाविष्कृतिश्चासूयाशब्दार्थः ।
प्रति किसी नायिका की यह उक्ति है, जो रातभर जागने से अलसायी हुई है । यहाँ
रात मे जागना विभाव और अधिक बोलने का अभाव अनुभाव हैं ।
जडता भाव में मूर्च्छा से पहले या बाद में जडता का रहना नियत है, किन्तु
इस आलस्य में ऐसी बात नहीं, यह इसकी दूसरी विशेषता है । सुरत के गोपनीय विषय
होने के कारण 'कथाभिः' यह पद अविवक्षितवाच्य ध्वनि के रूप में अपने वाच्यार्थ
वार्तालाप को अविवक्षा कर सुरतव्यापाररूप लाक्षणिक अर्थ के द्वारा श्रमातिशय को ही
ध्वनित कर रहा है और तब तो यह श्रमध्वनि का ही उदाहरण हुआ, आलस्य का
नहीं, ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि श्रमध्वनि रहने पर वह आलस्य का ही पोषक है,
क्योंकि श्रम से उत्पन्न आलस्य में श्रम का पोषक होना अपरिहार्य है । ( नायक बहुत
दिन पर आया है, वह बात ही में रात बिता दे, यह संगत नही है, इसलिए 'कथा'
शब्द से सुरत अर्थ लेना आवश्यक है और लज्जानिवारणार्थ नायिका सुरत न कहकर
'कथा' से काम चला रही है । ) श्रम से असंकीर्ण आलस्य का उदाहरण अतितृप्ति
आदि से उत्पन्न रहेगा ।
दूसरे के उत्कर्ष को देखने आदि से उत्पन्न