रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३० रसगङ्गाधरः
अत्राप्रस्तुत-चन्द्रवृत्तान्तेन प्रस्तुत-राजकुमारादिवृत्तान्तस्य ध्वननान्ना-
स्त्यसूयाध्वनित्वमिति तु न वाच्यम्, एकध्वनेर्ध्वन्यन्तराविरोधित्वात् । अन्यथा
महावाक्यध्वनेरवान्तरवाक्यध्वनिभिः, तेषां च पदध्वनिभिः सह सामानाधि-
करण्यं कुत्रापि न स्यात् ।
वियोग-शोक-भय-जुगुप्सादीनामतिशयाद् ग्रहावेशादेश्चोत्पन्नो
व्याधिविशेषोऽपस्मारः ।
व्याधित्वेनास्य कथनेऽपि विशेषाकारेण पुनः कथनं बीभत्स-भयानक-
योरस्यैव व्याधेरङ्गत्वं नान्यस्येति स्फोरणाय । विप्रलम्भे तु व्याध्यन्तर-
स्यापि च ।
अत्रेति । “तृष्णालोलेति” पद्ये चन्द्रवृत्तान्तेन राजकुमारवृत्तान्तोऽपि ध्वन्यते ।
तत्समकालमेवासूयाध्वनिः स्वतन्त्रतयैव प्रतीयते । उभयध्वनेरेकत्र समावेशे न कश्चिद्वि-
रोधः । महावाक्ये प्रबन्धरूपे अनेकध्वनीनां समावेशः । एकस्मिन् वाक्येऽनेकपदध्वनीनां
प्रतीतिर्भवत्येव ।
अपस्मारभावं लक्षयति―वियोगेति । वियोगादीनामाधिक्याद् भूताद्यावेशाच्च
समुत्पन्नश्चित्तविक्षेपरूपो व्याधिरेवापस्मारः । व्याधावस्मिन् ज्ञानहरण-कम्प-स्वेद-लाला-
निपातादयो भवन्ति । ग्रहपदेनात्र पूतनादयो बालपिशाचा भूतादयो वा ग्राह्याः ।
विरहादयोऽत्र विभावाः । निपतनादयोऽनुभावाः ।
ननु व्याधिभावः पृथगुक्तस्तद्विशेषस्यापस्मारस्य तदन्तर्गतत्वेन पृथगुपादानं
यहाँ अप्रस्तुत चन्द्रवृत्तान्त के द्वारा प्रस्तुत ( वर्णनीय ) राजकुमार के वृत्तान्त
के ध्वनित होने से अप्रस्तुतप्रशंसालंकारध्वनि ही है, न कि असूयाध्वनि, ऐसा नहीं
कह सकते; क्योंकि एक ध्वनि दूसरे ध्वनि का विरोधी नहीं है । तात्पर्य यह है कि एक ही
जगह दो स्वतन्त्र प्रधान ध्वनियों का समावेश हो सकता है । अतः यहाँ दोनों ध्वनि हैं ।
यदि एकत्र एक ही ध्वनि रहे तो प्रबन्ध या प्रकरण रूप महावाक्यस्थित ध्वनि का उस
प्रकरणस्थ लघुवाक्यस्थ ध्वनियों के साथ एवं एकवाक्यस्थ ध्वनि का पदध्वनि के साथ
सहावस्थिति ( एक साथ रहना ) कहीं भी न होती ।
वियोग, शोक, डर, घृणा आदि के अत्यधिक होने पर या भूत लगने से उत्पन्न
चित्तविक्षेपरूप ( जिसमें गिरना, कँपकँपी, मुंह से लार आना आदि हो जाते हैं )
व्याधि-विशेष को अपस्मार ( मृगी ) कहते हैं ।
व्याधिसंज्ञक भाव पहले ही प्रदर्शित हो चुका है और यह अपस्मार भी तो
व्याधि ही है । व्याधिरूप में इसका कथन सामान्यरूप से यद्यपि हो चुका है, तथापि
विशेषरूप से इसका यहाँ पुनः कथन इसलिए हुआ है कि बीभत्स और भयानक रस में