रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् ३२१
इदं पुनरत्र नोदाहार्यम्—
अयि ! पवनरयाणां निर्दयानां हयानां
श्लथय गतिमहं नो सङ्गरं द्रष्टुमीहे ।
श्रुतिविवरममी मे दारयन्ति प्रकुप्यद्-
भुजगनिभ-भुजानां बाहुजानां निनादाः ॥
पर्यवसाने दुःखातिशयोत्पादकत्वेन विषादध्वनेः अनुग्राहक उपस्कारक एव अर्थान्तर-
संक्रमितध्वनिर्न तु प्रधानम् । परवीरस्य उत्कृष्टवीरस्य । व्यवसायात् निश्चयात्,
चिन्तायां तु तथाविधव्यवसायाभावात् । विपदोऽगणनात् परवीरस्य दुर्योधनस्योक्ति-
रियं वीररसमेव कथं न ध्वनयतीत्याह—उत्साहेति । परस्य शत्रोः अपकर्षो हीनत्वं
तदेव जीवितं प्राणा अस्य, तथाविधस्य उत्साहस्यात्राभावः, दुर्योधनो हि विषादं प्राप्य
स्वस्य मरणमेवाङ्गीकरोति, तेन शत्रूत्कर्ष एव प्रतीयते नापकर्षः । अतो नैवात्र त्रास-
चिन्ता-दैन्य-वीर-रसध्वनीनां शङ्काऽस्ति ।
अत्र = विषादध्वनौ । अयीति । कोमलसम्बोधनं बृहन्नलावेषधारिणमर्जुनं
सारथिनं प्रति युद्धकातरस्य विराट्पुत्रस्योत्तरस्य । पवन इव रयो वेगो येषां तथा-
विधानां दयारहितानां कठोराणां घोटकानां गतिं श्लथय मन्दीकुरु । अहमुत्तरः सङ्गरं
संग्रामं द्रष्टुं न ईहे इच्छामि । यतो हि—प्रकुप्यन्तश्च ते भुजगाः सर्पाः, तन्निभाः
तत्सदृशा भुजा बाहवो येषां तेषां बाहुजानां क्षत्रियाणां; 'बाहू राजन्यः कृत' इति पुरुष-
परमवीर, कर्ण का प्राणाधिक मित्र, पाण्डवों को बार-बार नीचा दिखा चुकने
वाला आदि विशेषण युक्त वक्ता, ऐसा अर्थान्तर में संक्रमितवाच्य ध्वनि है, परन्तु
प्रधान न होकर विषाद का पोषक ही है । यहाँ त्रासभावध्वनि की शंका न करें,
क्योंकि परमवीर दुर्योधन को त्रास का लेश रहना भी संगत नहीं है । तब चिन्ताध्वनि
भी नहीं कह सकते, 'युद्ध करके मारूँगा' यही उनका निश्चय है, जब कि चिन्ता में
ऐसा निश्चय नहीं रहता है। यहाँ दैन्यध्वनि भी नहीं हो सकती, क्योंकि सकल सेना
के क्षय होने पर भी उसने विपत्ति की परवाह न की । इसे वीररसध्वनि भी नहीं
कह सकते, क्योंकि मरण को स्वीकार करने से शत्रु को नीचा दिखाना रूप उत्साह का
ही यहाँ अभाव है ।
यह पद्य तो इस विषादध्वनि के लिए उदाहृत नहीं हो सकता है—हे सारथी !
वायु के समान वेग वाले इन निर्दय घोड़ों की गति को शिथिल करो, मैं युद्ध नहीं
देखना चाहता । प्रकुपित सर्पों के समान भुजा वाले इन क्षत्रियों के ये युद्धोन्माद-शब्द
मेरे कान के बिल को फाड़ रहे हैं । यह उक्ति युद्ध से भयभीत विराट्पुत्र उत्तर का
बृहन्नलावेशधारी अर्जुन के प्रति है ।