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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 355

प्रथमाननम् ३२३
उदाहरणम्—
निपतद्वाष्प-संरोध-मुक्तचाञ्चल्यतारकम् ।
कदा नयननीलाब्जमालोकेय मृगीदृशः ॥
अनर्थातिशयजनिता चित्तस्य सम्भ्रमाख्या वृत्तिरावेगः ।
उदाहरणम्—
लीलया विहित-सिन्धुबन्धनः, सोऽयमेति रघुवंशनन्दनः ।
दर्पदुर्विलसितो दशाननः, कुत्र यामि ? निकटे कुलक्षयः ॥
एषा स्वात्मनि मन्दोदर्या उक्तिः । रघुनन्दनागमनमत्र विभावः । कुत्र
यामीत्येतद्व्यङ्ग्यः स्थैर्याभावोऽनुभावः ।
न चात्र चिन्ता प्राधान्येन व्यज्यत इति शक्यते वक्तुम्, कुत्र यामीति
स्फुटं प्रतीतेन स्थैर्याभावेनोद्वेगस्येव चिन्ताया अप्रत्यायनात् । परन्त्वावेग-चर्व-
णायां तत्परिपोषकतया गुणत्वेन चिन्तापि विषयीभवति ।
निपतदिति । विरही नायकश्चिन्तयति—मृगीदृशो नयननीलाब्जं नयनरूपं
नीलकमलं कदा आलोकेय पश्येयम्, यत्कमलं निपततां बाष्पाणां नेत्रबिन्दूनां संरोधेन
स्तम्भनेन मुक्तं त्यक्तं चाञ्चल्यं याभ्यां ते तारके कनीनिके यस्य तथाविधम् । प्रियविरहा-
लम्बनेन तत्स्मरणोद्दीपनेन तच्चिन्तानुभावेन प्रियादर्शनोत्कटेच्छारूप औत्सुक्यभावः
प्रतीयते ।
आवेगाख्यं भावं लक्षयति—अनर्थेति । आकस्मिकरूपेण अत्यन्तानिष्टघटनायाः
कारणेन चित्ते जायमानः सम्भ्रमो विक्षोभ एव आवेगाख्यो भावः । यथा—रावणपत्न्या
उदाहरण—मृगनयनी के गिरते हुए आंसू ( जल ) को रोकने के कारण
चञ्चलता को त्यागने वाले पुतलियों से युक्त आँख रूपी नीलकमल को कब देखूँगा ?
अत्यन्त अनर्थ ( अनिष्ट घटना ) के अकस्मात् आ जाने से उत्पन्न चित्त के
सम्भ्रम ( विक्षोभ, हड़बड़ी ) को आवेग या उद्वेग कहते हैं । विश्वनाथ ने आवेग को
हर्ष से भी उत्पन्न माना है ।
लीला से ही सागर में सेतु बाँधने वाले, अतुल पराक्रमशाली रूप में प्रख्यात वे
( जिनकी पत्नी का अपहरण किया गया है ) श्रीरामचन्द्रजी लङ्का आ रहे हैं और
रावण उनके स्वागत के बजाय दर्प से दुराचाररत है, उनसे द्वेष ही कर रहा है । तब
तो सम्पूर्ण कुल का ही नाश बहुत निकट है । हाय ! कहाँ जाऊँ ?
यह अपने मन में मन्दोदरी की उक्ति है । रघुनन्दन का आगमन यहाँ विभाव
है । 'कहाँ जाऊँ' इससे व्यंग्य चंचलता अनुभाव है ।
यहाँ चिन्ता ही प्रधानरूप से प्रतीत हो रही है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि
'कहाँ जाऊँ' इस वाक्य के द्वारा स्फुट ( स्पष्ट ) रूप से प्रतीत स्थिरता के अभाव
२३ र०