रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 357, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंउदाहरणम्—
यदवधि दयितो विलोचनाभ्यां, सहचरि ! दैववशेन दूरतोऽभूत् ।
तदवधि शिथिलीकृतो मदीयैरथ करणैः प्रणयो निजक्रियासु ॥
प्रियविरहोऽत्र विभावः, करणैश्चक्षुःश्रवणादिभिः क्रियासु तत्तत्प्रमितिषु
प्रणयस्य शिथिलीकरणमनुभावः । मोहे चक्षुरादिभिश्चाक्षुषादेरजननम्, इह तु
प्रकारविशेषवैशिष्ट्येन बाहुल्येनाजननमिति तस्मादस्य विशेषः । अत एवो-
दाहरणे शिथिलीकृत इत्युक्तं, न तु त्यक्त इति ।
अतितृप्ति-गर्भ-व्याधि-श्रमादिजन्या चेतसः क्रियाऽनुन्मुखताऽऽलस्यम् ।
उदाहरति—यदवधीति । हे सहचरि सखि ! दैववशेन भाग्यवशात् मम दयितः
प्रियः यदवधि यस्मात्कालादारभ्य मम विलोचनाभ्यां दूरतोऽभूद् दूरं गतवान्, तदवधि
तस्मादेव कालात् मदीयैः करणैः चक्षुरादिभिः निजक्रियासु दर्शन-श्रवणादिषु प्रणयः
स्वव्यापारासक्तिरूपः, शिथिलीकृतो मन्दीकृतः । अत्र 'अथे'ति पादपूरणे । 'प्रणयो
निजे'त्यत्र पूर्वान्त्य-परादिवर्णयोः सहावस्थानेनाश्लीलत्वम् ।
प्रमितिषु चाक्षुषप्रत्यक्ष-श्रावणप्रत्यक्षादिषु । ननु मोहजडतयोर्ज्ञानवैकल्य-
रूपत्वात् कुतः पृथगुपादानमिति समाधत्ते—मोह इति । मोहे इन्द्रियाणां सर्वथा क्रिया-
शून्यत्वं, जडतायां तु ईषत्कार्यकरत्वं, न सर्वथा ज्ञानाभाव इत्युभयोर्वैलक्षण्येन पृथगु-
पादानम् । प्रकारेति तत्तदसाधारणरूपेण बहुशो न तु सर्वथा । तेन क्वचिच्चाक्षुषादे-
जननमपि जडतायां, मोहे तु सामान्यरूपेणैव तदजननमिति ।
आलस्यं लक्षयति—अतितृप्तीति । अतिसन्तुष्टि-गर्भरोगश्रमादिकारणेन
उदाहरण—हे सखि ! जब से मेरे प्रियतम भाग्यवश मेरी आँखों से दूर हो
गये हैं, उसी समय से मेरी आँख-कान आदि इन्द्रियों ने अपने देखना-सुनना आदि कार्यों
में स्नेह को मन्द कर दिया है ।
यहाँ प्रिय का विरह विभाव है, करणों ( साधनों ) आँख-कान आदि से
कार्यों में—उन-उन इन्द्रियों की प्रमितियों ( प्रत्यक्षों ) में प्रणय ( स्नेह ) का मन्द
करना अनुभाव है । मोह-भाव में आँख आदि से चाक्षुषादि प्रतीति नहीं होती और
यहाँ जड़ता भाव में उन-उन असाधारण विशेषताओं के द्वारा अधिकतर रूप से प्रतीति
नहीं होती, किन्तु कहीं-कहीं प्रतीति होती भी है । इसलिए मोह से जड़ता का पार्थक्य
ही है । मोह में इन्द्रियों के विषयों से सम्पर्क होने पर भी कदापि कुछ भी प्रतीति नहीं
होती है, जब कि जड़ता में स्थूल रूप से कुछ-कुछ होती है ।
इसलिए पूर्वोक्त उदाहरण में 'शिथिलीकृत' कहा है, 'त्यक्त' नहीं ।
अत्यन्त तृप्ति, गर्भ, व्याधि, श्रम आदि के कारण उत्पन्न मन में कार्य न करने
की प्रवृत्ति को आलस्य कहते हैं ।