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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 361

प्रथमाननम् ३२९
अत्रापि यद्यपि तदीयोच्छृङ्खलतादि-दर्शनजन्या, अनुचितकारित्वरूप-
निन्दाप्रकाशानुभाविता, कविगता, विधात्रालम्बनामूया व्यज्यत इति शक्यते
वक्तुम्, तथापि कार्यकारणयोस्तुल्यत्वादभिव्यक्तेनामर्षेण शवलितैवासौ न
विविक्ततया प्रतीयते । नहि विधातुरपराध इव भगवतो रामस्यापराधोऽस्ति,
येन कवेरिव वीराणामप्यमर्षोऽभिव्यज्येत । स्वभावो हि महोन्नतक्रियानिष्पादनं
वीराणाम् ।
प्रस्थातुकामे प्रस्थानमुद्यते सति, विधौ चन्द्रे, धाराधराडम्बरः मेघाच्छन्नत्वं किं नु त्वया
विधातुमुचितः ? सर्वथा नैवोचित इत्यर्थः ।
तदीया धातुः, उच्छृङ्खलता अनुचितकारिता । विधात्रालम्बना विधातृ-
सम्बन्धिनी । कार्यकारणयोः अनुभावविभावयोः निन्दाप्रकाशोच्छृङ्खलनादर्शनयोः तुल्य-
त्वात्, समानत्वात्, असूयामर्षयोस्तुल्यविभावानुभावकत्वादेककालोपस्थितावसूयामर्षौ ।
शबलितैव मिश्रितैव । विविक्ततया पृथक्तया । नहीति । अमर्षमिश्रितासूयो-
दाहरणे प्रस्तुतपद्ये विधातुरपराधेन कवेरमर्षः । शुद्धासूयोदाहरणे "कुत्र शैवम्" इत्यादि
पद्ये रामस्यापराध एव नास्ति, येन वीराणाममर्षः स्यात् । वीरो हि रामो नैवापराधी,
स स्वभावतो महोन्नतिप्रदकार्ये धनुर्भङ्गे प्रवृत्तो न तु मत्सरतया ।
देव अपने धनुष को कँपाने लगे और मानवती जनों के मान झट से प्रस्थान करने लगे,
तब उसी समय चन्द्रमा पर यह मेघ की घटा लाद देना क्या उचित हुआ ?
यहाँ यद्यपि विधाता की उच्छृंखलता (मनमानी) के दर्शन में उत्पन्न 'अनुचित
किया विधाता ने' इस निन्दा से अनुभावित कविगत विधाता-विषयक असूया अभिव्यक्त
हो रही है-ऐसा कहा जा सकता है, तथापि उसी समय अभिव्यक्त अमर्ष (अपराध
के कारण बिगड़ना या चुप होना) के साथ वह मिश्रित रूप से ही प्रकाशित हो रही
है, पृथक् स्वतन्त्र रूप से नहीं। असूया एवं अमर्ष के विभाव और अनुभाव यहाँ समान
(एक) ही हैं, इस कारण दोनों समानकाल में हो प्रतीत होते हैं। अतः यह उदाहरण
अमर्षसंकीर्ण असूया का है।
पूर्वोदाहृत 'कुत्र शैवं' पद्य शुद्ध-असूया का उदाहरण है, क्योंकि जैसे 'तृष्णा-
लोल' पद्य में विधाता का अपराध है, वैसे इस पद्य में भगवान् राम का अपराध नहीं
है, जिससे कि विधाता के प्रति कवि के अमर्ष के समान वीरों को भी राम के प्रति
अमर्ष हो । शिव के धनुष को तोड़ना अपराधवश नहीं, स्वभाववश ही राम के द्वारा
हुआ, क्योंकि महान् उन्नतिदायक कार्य करना वीरों का स्वभाव ही है।