रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१६ रसगङ्गाधरः
उदाहरणम्—
अकरुणहृदय ! प्रियतम ! मुञ्चामि त्वामितः परं नाहम् ।
इत्यालपति कराम्बुजमादायालीजनस्य विकला सा ॥
एषा प्रवासगतं स्वनायिकावृत्तान्तं नायकं प्रति कस्याश्चित् सन्देश-
हारिण्या उक्तिः । प्रियविरहोऽत्र विभावः । असम्बद्धोक्तिरनुभावः । उन्मादस्य
व्याधावन्तर्भावे सम्भवत्यपि पृथगुपादानं 'व्याध्यन्तरापेक्षया वैचित्र्यविशेष-
स्फोरणाय ।
रोगादिजन्या मूर्च्छारूपा मरणप्रागवस्था मरणम् ॥
न चात्र प्राणवियोगात्मकं मुख्यं मरणमुचितं ग्रहीतुम्, चित्तवृत्त्यात्म-
केषु भावेषु तस्याप्रसक्तेः, भावेषु च सर्वेषु कार्य-सहवर्त्तितया शरीरप्राणसंयोगस्य
हेतुत्वात् ।
अकरुणेति । विकला सा वियोगिनी, आलीजनस्य सखीजनस्य करकमलं
गृहीत्वा 'अकरुणहृदय ! निष्ठुर ! प्रियतम ! त्वाम् ( चिरान्मिलितं ) इतःपरमद्यप्रभृति
अहं न मुञ्चामि' इति आलपति । अत्र सखीजने प्रियतमावभासः, तेनैवंविधा उक्तिः ।
व्याध्यन्तरेति । व्याधिभावे शय्याशयनम्, उन्मादे भ्रान्तिरसम्बद्धप्रलापः,
मरणे मूर्च्छा, अपस्मारे कम्प-श्वास-पतनादय इत्येव वैचित्र्यम् ।
मरणाख्यं भावं लक्षयति—रोगादीति । रोग-शोक-वियोगादिकारणेनोत्पन्ना
चेतनाशून्या मरणात्पूर्वावस्था ( न तु वास्तविकं मरणम् ) मरणाख्यो भावः ।
कोई वियोगिनी नायिका विकल होकर सखी के करकमल को पकड़कर बोलती
है—निष्ठुरहृदय ! प्रियतम ! तुझे इसके बाद मैं कभी नहीं छोड़ूँगी' । यहाँ सखी को
प्रियतम मानकर कहना ही उन्माद को प्रकटित करता है ।
यह उक्ति किसी सन्देशहारिणी दूती की है, जो प्रवासस्थित नायक के प्रति
उसकी नायिका की दशा कह रही है । प्रिय का विरह यहाँ विभाव है । असम्बद्ध उक्ति
अनुभाव है । यद्यपि उन्माद भी व्याधि ( भाव ) में ही आ जाता है, तथापि इसका
अलग से कथन इसलिए किया गया है कि यह अन्य व्याधि की अपेक्षा अधिक
चमत्कारी होता है, जो सहृदय के द्वारा स्वतः अनुभूत होता है । व्याधि में बिछावन
पर पड़े रहना, उन्माद में भ्रम एवं असम्बद्ध बोलना, मरण में मूर्छा तथा अपस्मार में
काँपकर गिरना आदि वैशिष्ट्य हैं ।
रोग, शोक एवं वियोगादि से उत्पन्न जो मूर्छा, जिसे मरण की पूर्वावस्था कह
सकते हैं, वह मरण-संज्ञक भाव है ।
यहाँ प्राणवियोग रूप मुख्य मरण का ग्रहण करना उचित नहीं है, क्योंकि
चित्तवृत्ति ( मन में रहने वाले ) स्वरूप भावों में प्राणवियोगात्मक ( चित्तरहित )