रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 349, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् ३६७
उदाहरणम्—
दयितस्य गुणाननुस्मरन्ती
शयने सम्प्रति या विलोकितासीत् ।
अधुना खलु हन्त ! सा कृशाङ्गी
गिरमङ्गीकुरुते न भाषितापि ॥
प्रियविरहोऽत्र विभावः । वचनविरामोऽनुभावः । हन्तपदस्यात्रात्यन्तमु-
पकारकत्वाद् वाक्यव्यङ्ग्योऽप्ययं भावः पदव्यङ्ग्यतामावहति । एतेन भावस्य
पदव्यङ्ग्यतायां नात्यन्तं वैचित्र्यमिति परास्तम् । दयितस्य गुणाननुस्मरन्ती-
त्यनेन व्यज्यमानं चरमावस्थायामपि तस्या दयितगुणविस्मरणं नाभूदिति वस्तु
विप्रलम्भस्य शोकस्य वा चरममभिव्यक्तस्य पोषकम् ।
दयितेति । प्रवासस्थस्य दयितस्य प्रियस्य, गुणोत्कीर्त्तनं कुर्वती अतिदौर्बल्याद्
या शयने शय्यायां दृष्टा, सैव कृशाङ्गी प्रियविरहेऽतिशयितं दुर्बलाङ्गी अधुना क्षणा-
नन्तरमेव हन्त ! भाषितापि पृष्टापि गिरं स्ववचनं नैव अङ्गीकुरुते स्वीकुरुते प्रत्युत्तरं
नैव ददातीति भावस्तेन मूर्च्छावस्था गम्यते ।
वचनविरामो भाषणशक्तिनिवृत्तिः । हन्तपदस्य दुःखातिशयबोधकस्य ।
एतेन पदव्यङ्ग्यतायां . चमत्कारातिशयप्रदर्शितेन । व्यज्यमानं वस्तु विप्रलम्भस्य
शोकस्य वा पोषकमित्यन्वयः । चरमावस्था मरणम् । चरममभिव्यक्तस्य अन्ते
मरण का प्रसंग ही नहीं है और सभी भावों में, कार्य ( अनुभाव ) के साथ-साथ रहने
वाला शरीर के साथ प्राण का संयोग ही हेतु है। ( यह कारण कार्य से पूर्व नष्ट न
होकर कार्यकाल में भी रहता ही है )।
जो दुर्बल अङ्गवाली अपने प्रियतम के गुणों का स्मरण करती हुई अभी-अभी
बिछावन पर लेटी हुई देखी गयी, वही अब तुरत ही हाय हाय ! पूछने पर भी नहीं
बोलती है ! उसे बोलने की भी शक्ति नहीं रही।
यहाँ प्रिय का विरह विभाव है। बोलने की भी शक्ति का अभाव अनुभाव है।
दुःखातिशयबोधक 'हन्त' पद यहाँ ( मरणभाव में ) अत्यन्त उपकारक है, इसलिए
वाक्य द्वारा व्यंग्य होने पर यह मरण-भाव पदव्यंग्य बन जाता है। इस प्रकार पदव्यंग्य
में भी वैलक्षण्य देखने के कारण किसी आचार्य का यह मत खण्डित हो जाता है कि
'भाव की पदव्यंग्यता में कोई चमत्कार नहीं है'।
“प्रिय के गुणों का स्मरण करती हुई" इस उक्ति से व्यंग्य वस्तु ध्वनि यह है
कि “अन्तिम ( मरण ) अवस्था में भी वह प्रिय के गुणों को नहीं भूली" । यह वस्तु-
ध्वनि भी अन्त में अभिव्यक्त विप्रलम्भ या शोक का पोषक होता है। प्रथमतः प्रतीत
मरण भावध्वनि ही प्रधान है। वस्तु एवं रस ध्वनि बाद में प्रतीत हो रहे हैं।