रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
११० रसगङ्गाधरः
(६) 'दुष्यन्तादिगतो रत्यादिर्नटे पक्षे दुष्यन्तत्वेन गृहीते विभावादिभिः
भावात्; यदापि साध्यधर्मविशिष्टधर्मिणोऽनुमेयत्वं तदाऽपि नटमात्रविषयक लौकिक-
प्रत्यक्षसामग्रया रत्यादिविशिष्टनटानुमितिसामग्रीबाधकत्वं न, समानविषयत्वाभावात्;
अलौकिकप्रत्यक्षसामग्री तु तद्विषयविशिष्टविषयक लौकिकानुभवसामग्रयाऽपि
बाध्यत एव, अनुभवबलादिति न लोल्लटाद्यभिमतो रत्यादिः साक्षात्क्रियमाणोऽपि-
त्वनुमीयमान एव रसः, अनुमीयमानस्यापि रत्यादेरलौकिकाह्लादजनकत्वन्तु
विषयस्वभावबलादेवास्थेयमिति मन्यमानानां शङ्कुकादीनां मतं प्रस्तौति —
दुष्यन्तादिगत इत्यादिना । अत्रापि मते रत्यादिरेव रस इति स्पष्टमेव ।
दुष्यन्तत्वेन गृहीत इति । दुष्यन्तत्वग्रहश्च नटे मुख्यतः शब्दादेव । क्वचित्
पूर्ववासनाऽपि निमित्तभावमुपयात्यत्र । पोषितश्चायं दुष्यन्तचेष्टादिसदृशचेष्टादि-
आदि के मत से कुछ भिन्न है। जहां तक रत्यादिस्वरूप रस के मुख्य आश्रयों की
बात है वह तो पूर्ववत् दुष्यन्त आदि हीं है। दुष्यन्त तथा शकुन्तला आदि के
स्वाभाविक क्रियाकलापों के अभिनय में पूर्ण सफल नट-नटी आदि में सादृश्यातिशय
के कारण दुष्यन्तत्व-शकुन्तलात्व आदि का समारोप तथा नट-नटी के चेष्टादि में
दुष्यन्त-शकुन्तला आदि के चेष्टादि का आरोप भी पूर्ववत् इन्हें मान्य है। किन्तु
सहृदयों को जो—'दुष्यन्तोऽयं शकुन्तलाविषयकरतिमान्' इत्याकार बोध होता वह
अलौकिक भ्रमात्मक साक्षात्कार नहीं, अपि तु अनुमित्यात्मक है। इसका
कारण यह है कि अलौकिकसन्निकर्षजन्य प्रत्यक्ष का लौकिक अनुभव की सामग्री
बाधक होती। इसी लिए 'पर्वतो वह्निमान्' इत्यादि स्थलों में व्याप्तिस्मरणरूप
ज्ञान को अलौकिक सन्निकर्ष मानकर नैयायिक वह्नि का अलौकिक प्रत्यक्ष नहीं,
अपि तु अनुमिति हीं मानते। अतः जहाँ 'सुरभि चन्दनम्' आदि में सुरभि अंश का
अलौकिक प्रत्यक्ष मान्य है वहाँ अनुमितिसामग्री का फल के आधार पर अभाव
मानना चाहिए। हां, लौकिक-प्रत्यक्ष की सामग्री अन्य परोक्षज्ञान की सामग्री से
प्रबल अवश्य है। इसी लिए कहीं यदि किसी विषय के प्रत्यक्ष और अनुमित्यादि
की भी सामग्रियां समानकाल में उपस्थित होतीं तो वहाँ उस विषय का प्रत्यक्षज्ञान
हीं होता, अनुमित्यादिस्वरूप परोक्षज्ञान नहीं। अत एव न्यायदर्शन के प्रत्यक्ष सूत्र
की तात्पर्यटीका में वाचस्पति मिश्र ने अपने आचार्य की उक्ति उद्धृत की है—
शब्दजत्वेन शब्दं चेत् प्रत्यक्षं चाक्षुषत्वतः ।
स्पष्टग्रहणसम्बन्धाद् युक्तमैन्द्रियकं हि तत् ॥
किन्तु यह बाध्यबाधकभाव विरोध होने पर हीं होता है, अन्यथा नहीं। विरोध
समानविषयता होने पर हीं सम्भव है, इसके बिना नहीं। अतः 'पर्वतो वह्निमान्'
कृत्रिमैरप्यकृत्रिमधिया गृहीतैर्भिन्ने विषयेऽनुमितिसामग्र्या बलवत्त्वादनु-
मीयमानो रसः' इत्यपरे ॥
(७) 'विभावादयस्त्रयः समुदिता रसाः' इति कतिपये ॥ (८) 'त्रिषु य
एव चमत्कारी स एव रसोऽन्यथा तु त्रयोऽपि न' इति बहवः ॥ (९) 'भाव्य-
बोधेन । अकृत्रिमधियेति । अत्र हेतुरभिनयपाटवादिः । शेषो ग्रन्थो व्याख्यातप्रायः ।
अनुमानप्रयोगश्च—दुष्यन्तोऽयं शकुन्तलाविषयकरतिमान्, तद्रतिव्याप्यचेष्टादिमत्त्वात्,
तादृशचेष्टादिमत्पुरुषान्तरवत् । यद्वा आत्मैव दृष्टान्तोऽत्र । अत्र च नटे दुष्यन्त-
तदीय शकुन्तलाविषयकरतेः, तद्व्याप्यचेष्टादेश्च पूर्वारोपसादृश्यादिनैकत्वाध्यव-
सायादारोपितत्वेनेयमनुमितिः भ्रमात्मिकैव, न प्रमात्मिकेति स्पष्टम् । अत्र प्रयोगे
[L10
११२ रसगङ्गाधरः
मानो विभाव एव रसः' इत्यन्ये ॥ (१०) 'अनुभावस्तथा' इतीतरे ॥
(११) 'व्यभिचार्येव तथा तथा परिणमति' इति केचित् ॥
तत्र 'विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः' इति सूत्रं तत्तन्मत-
परतया व्याख्यायते- 'विभावानुभावव्यभिचारिभिः संयोगाद्व्यञ्जना-
द्रसस्य चिदानन्दविशिष्टस्थाय्यात्मनः स्थाय्युपहितचिदानन्दात्मनो वा
निष्पत्तिः स्वरूपेण प्रकाशनम्' इत्याद्ये । 'विभावानुभावव्यभिचारिणां
सम्यक्साधारणात्मतया योगाद्भावकत्वव्यापारेण भावनाद्रसस्य स्थाय्युप-
हितसत्त्वोद्रेकप्रकाशितस्वात्मानन्दरूपस्य निष्पत्तिर्भोगाख्येन साक्षात्कारेण
भाव्यमान इति । भावनाविषयीभूतः । विभावस्य प्रामुख्यं च स्थायिभावाश्रयत्वा-
दबोध्यम् । मतान्तरमाह-अनुभावस्तथेति । तथा = भाव्यमानः । रस इति शेषः ।
भाव्यमान इत्यनेन तदभावे न रसत्वमिति सूचितम् । अन्त्यं मतमाह-व्यभि-
चार्यैवेति । तथा = भाव्यमानः । तथा = रसरूपेण ॥
तदेवमेकादश मतानि रसविषये पण्डितराजेन वर्णितानि,-स्वमतं च प्रथममेव
निरूपितम् । एषु चरमाणि त्रीणि मतानि विहायान्येषु भरतसूत्रं यथा व्याख्यातव्य
तदाह-तत्रेत्यादिना । रसस्वरूपविषय इत्यर्थः । अत्र चाद्येष्वष्टसु मतेषु सूत्रस्थ-
संयोगनिष्पत्तिशब्दयोरर्थभेदमाश्रित्य सूत्रसमन्वयः प्रदर्श्यते । धातूनामनेकार्थतया
चोक्तशब्दद्वयस्य तत्तदर्थपरत्वं स्वीकृतम् । तत्तदर्थश्च पूर्वमेव तत्तन्मतव्याख्यानावसरे
में जो चमत्कारातिशयजनक हो वही रस है। अतः कहीं चमत्कारातिशयजनक
विभाव, कहीं वैसा अनुभाव और कहीं तादृश सञ्चारिभाव ही रस है ॥ अन्य
आचार्यों का मन्तव्य यह है कि भावनाविषयीभूत विभाव हीं रत्यादि का
आश्रय होने से रस है ॥ कुछ आचार्य अनुभाव के रत्यादि-प्रकाशन में सामर्थ्य
प्रकट होने से अनुभाव हीं भावना-पुनः पुनः अनुसंधान के फलस्वरूप
रसरूप में परिणत हो जाता ॥ जब कि कुछ आचार्य परिपोषक होने से भावना-
विषयीभूत व्यभिचारि-भाव का हीं रसरूप मे परिणाम मानते ॥
अब 'विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः' इस भरतकृत रस-सूत्र की
विभिन्नमतानुसारिणी व्याख्या की जा रही है। इस सूत्र में आए 'संयोग,' 'रस'
और 'निष्पत्ति' शब्द हीं अनेकार्थक माने गये हैं। प्रथममतानुसारिणी व्याख्या यह
है कि विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग, अर्थात् उन तीनों से
व्यञ्जित होने पर, रस, अर्थात् चिदानन्दविशिष्ट रत्यादि स्थायी भाव की अथवा
रत्याद्युपहित चिदानन्द की विष्पत्ति, अर्थात् स्वरूपप्रकाशन, होती। द्वितीयमत के
अनुसार 'संयोग' का अर्थ है सम्यग्-योग-विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों
प्रथमाननम् ११३
त्रिषयीकृतिः' इति द्वितीये । 'विभावानुभावव्यभिचारिणां संयोगाद्भाव-
नाविशेषरूपाद्दोषाद्रसस्यानिर्वचनीयदुष्यन्तरत्याद्यात्मनो निष्पत्तिरुत्पत्तिः'
इति तृतीये । विभावादीनां संयोगाज्ज्ञानाद्रसस्य ज्ञानविशेषात्मनो निष्पत्ति-
रुत्पत्तिः' इति चतुर्थे । 'विभावादीनां सम्बन्धाद्रसस्य रत्यादेर्निष्पत्ति-
रारोपः' इति पञ्चमे । 'विभावादिभिः कृत्रिमैरप्यकृत्रिमतया गृहीतैः
संयोगादनुमानाद्रसस्य रत्यादेर्निष्पत्तिरनुमितिः, नटादौ पक्ष इति शेषः' इति
षष्ठे । 'विभावादीनां त्रयाणां संयोगात्समुदायाद्रसनिष्पत्तौ रसपदव्यवहारः'
इति सप्तमे । 'विभावादिषु सम्यग्योगाच्चमत्कारात्' इत्यष्टमे । तदेवं
विवृतं उपपादितश्चेति नेह पुनः प्रयतते तत्र । नटादौ पक्ष इति । एतच्च वस्तु-
गत्या, न शब्दतः, अनुमितौ हि तस्य दुष्यन्तत्वेनोपस्थित्या नटशब्देनानुपात्तत्वात् ।
तदेवमिति । मिलितानामेव विभावानुभावव्यभिचारिणां रसोपकारित्वे रसत्वे वा
सूत्रेण समर्थिते सतीत्यर्थः । त्रिषु मतेषु = प्रत्येकं विभावादीनां रसत्वसमर्थकेषु
की (सम्यक् =) साधारण रूप में (योग =) भावकत्व-व्यापार द्वारा भावना, उससे
रस, अर्थात् भोजकत्व व्यापार द्वारा चित्त में हुए सत्त्वगुण के प्रकर्ष से प्रकाशित
और रत्यादि से उपहित आत्मस्वरूपानन्द१, की भोगस्वरूप साक्षात्कार द्वारा निष्पत्ति
(स्थाय्युपहित आनन्द को विषय बनाया जाना ) होती है । तृतीय मत में विभाव,
अनुभाव और व्यभिचारिभावों के संयोग (= भावनाविशेषस्वरूप दोष) से रस,
अर्थात् अनिर्वचनीय रत्यादि, की सामाजिक में निष्पत्ति, अर्थात् उत्पत्ति हीं सूत्रार्थ
है । विभाव आदि के संयोग-ज्ञान से ज्ञानविशेषस्वरूप रस की निष्पत्ति
(उत्पत्ति ) होती है—यह चतुर्थमतानुसारी सूत्रार्थ है । पञ्चम मत में विभावादि
के संयोग ( = सम्बन्ध ) से सामाजिक में रत्यादि स्वरूप रस की निष्पत्ति—
आरोप ही सूत्र का तात्पर्य है । षष्ठमतानुसारिणी व्याख्या यह है कि कृत्रिम होने
पर भी नटादि की अभिनयचातुरी से अकृत्रिम रूप में समझे जाने वाले विभाव
आदि के साथ रत्यादि का संयोग = अनुमान = व्याप्ति सम्बन्ध होने से व्याप्य
विभावादि के द्वारा नट में सामाजिक को व्यापकीभूत रत्यादिस्वरूप रस की
निष्पत्ति, अर्थात् अनुमिति, होती है। सप्तम मत के अनुसार भरत के रससूत्र का यह
अर्थ है—विभाव, अनुभाव और व्यभिचारिभाव के संयोग = समुदाय के कारण
हीं रसनिष्पत्ति, अर्थात् समुदित रूप में इनके लिए रस-पद का प्रयोग होता ।
१. यद्यपि भट्टनायक के मत में चित्तसत्त्वगत आनन्द की हीं प्रतीति माननी
चाहिए तथापि वास्तविक आनन्द के आत्मस्वरूपभूत होने से आत्मानन्द
कहा है पण्डितराजने ।
११४ रसगङ्गाधरः
पर्यवसितस्त्रिषु मतेषु सूत्रविरोधः । विभावानुभावव्यभिचारिणामेकस्य तु
रसान्तरसाधारणतया नियतरसव्यञ्जकतानुपपत्तेः सूत्रे मिलितानामु
पादानम् ।
एवं च प्रामाणिके मिलितानां व्यञ्जकत्वे यत्र क्वचिदेकस्मादेवा-
साधारणाद्रसोद्बोधस्तत्रेतरद्वयमाक्षेप्यम् । अतो नानैकान्तिकत्वम् । इत्थं
अन्येषु त्रिषु पक्षेषु 'भाव्यमानो विभाव एव रसः' इत्यादिषु । रसान्तरसाधारण-
तयेति । अत्र काव्यप्रकाश उक्तम्- 'व्याघ्रादयो विभावा भयानकस्येव रौद्राद्भुत-
वीराणाम् । अश्रुपातादयोऽनुभावाः शृङ्गारस्येव करुणभयानकयोः । चिन्तादयो
व्यभिचारिणः शृङ्गारस्येव करुणवीरभयानकानाम्' इति ।
उपसंहरति- एवं चेत्यादिना । प्रामाणिके = सूत्रसमर्थिते । व्यञ्जकत्व इति
स्वमतानुरोधेन । एकस्मादेवेति । असाधारणाद् विभावात्, तथाविधादनुभावात्,
अष्टम मत के अनुकूल यह व्याख्या है—विभाव आदि में संयोग, अर्थात् चमत्कार
के कारण किसी एक, चाहे वह चमत्कारी विभाव हो या वैसा अनुभाव या वैसा
व्यभिचारिभाव, को रस कहा जाता है। नवम, दशम और एकादश मतों में तो
क्रमशः केवल विभाव, केवल अनुभाव और केवल व्यभिचारिभाव को रस कहे जाने
से तीनों को समुदित रूप से रसोपयोगी बताने वाले उक्त रससूत्र का विरोध स्पष्ट
ही है। विभावादि तीनों का सम्मिलितरूप में उल्लेख आवश्यक भी है, क्योंकि
कुछ विभावों, कुछ अनुभावों और कुछ व्यभिचारिभावों के अनेक रसों में समान
रूप से उपयुक्त होने के कारण किसी एक विभाव या अनुभाव या व्यभिचारिभाव
से किसी एक रस का अभिव्यञ्जन, इन मतों के अनुसार, मानना सम्भव नहीं ।
उदाहरणार्थ व्याघ्र आदि पदार्थ भयानक, रौद्र तथा वीर इन तीनों ही रसों के
विभाव हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में केवल व्याघ्रादि विभाव को रस मानने पर
उनसे किसी एक रस की अभिव्यक्ति कैसे हो सकेगी ? इसी तरह अश्रुपात आदि
अनुभाव शृङ्गार, वीर, करुण और भयानक रसों के प्रसङ्ग में समानरूप से होते ।
अतः केवल अनुभाव या केवल व्यभिचारिभाव को रस मानने में वही आपत्ति
है जो केवल विभाव को रस मानने में कही गई है । सभी विभावों, या सभी
अनुभावों या सभी व्यभिचारिभावों के रसान्तरसाधारण न होने पर भी उनमें
किसी एक के समुदाय को रस कहना सम्भव नहीं, क्योंकि विभाव-समुदाय आदि के
व्यक्तिभेद से भिन्न-भिन्न होने से समुदाय का स्वरूप ही स्पष्ट करना असम्भव
है । अतः किसी एक को रस कहने वाले सभी पक्ष सूत्रविरुद्ध हैं ।
इस प्रकार विभावादित्रितय के रसव्यञ्जक सिद्ध हो जाने से जब किसी ऐसे
काव्य से सामाजिकों को रसाभिव्यक्ति होती जहाँ तीनों—विभाव, अनुभाव और
... wait!
Look at the character after ल:
Wait, could it be म्बन?
Wait, what if the first glyph is म्ब?
Then the second glyph is नो?
Wait, why did I think there are two नs?
Look at the image:
After ल:
Glyph 1: looks like a म with ब under it? No, look at the top: it's a म. Underneath is ब.
Wait! Then there is a न?
Wait, look at:
...रूपाणामालम्बन...
Wait, is there an आ?
No, रूपाणाम् + आलम्बन -> in Sanskrit with sandhi: रूपाणामालम्बन... (मा-ल-म्ब-न-...).
Wait, if it's रूपाणामालम्बन..., then:
रूपाणा (4 aksharas: rū-pā-ṇā)
Then मा (mā)
ल (la)
म्बन?
Wait! In Hindi/Sanskrit print, how is म्बन written?
Often म्ब is one conjunct, and न is the next consonant!
Wait, is नोद्दीपन a separate word?
Wait!
"आलम्बन" and "उद्दीपन"!
If it's NOT sandhied, it
इत्युक्तेर्नवैधा। मुनिवचनं चात्र मानम्।
केचित्तु —
तन्निरासायाह—मुनिवचनमित्यादि। नाट्यशास्त्रस्य षष्ठाध्यायस्यान्ते भरतमुनि-
प्रोक्तं वचनमित्यर्थः। यद्यपि बहुष्वादर्शपुस्तकेषु शान्तरसप्रकरणं न लभ्यते तथापि
अभिनवगुप्ताचार्यैः स्पष्टमङ्गीकृतत्वाच्चिरन्तनपुस्तकानुरोधेनेति पण्डितराजेनापि
स्वीकृतमेतद्युक्तमेव। यत्तु पूर्वं भरतेनोक्तम्—
शृङ्गारहास्यकरुणा रौद्रवीरभयानकाः।
बीभत्साद्भुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्ये रसाः स्मृताः॥
(ना० शा० ६।१५)
इति तत् पूर्वाचार्यानुरोधेनेति स्पष्टमेव—
“एते ह्यष्टौ रसाः प्रोक्ता द्रुहिणेन महात्मना” इति तदुक्त्या ज्ञायते। स्वयन्तु
भरतर्षिणा शान्तस्यापि रसत्वं स्वीकृतमेव।
यद्वा अष्टाविति पाठः शान्तापलापिनामिति स्पष्टमेवाभिनवगुप्ताचार्यैरुक्तम्।
ततश्च शान्तपक्षपातिनां मते प्रोक्तवचनोत्तरार्धम्—‘बीभत्साद्भुतशान्ताश्च नाट्ये
नव रसाः स्मृताः’ इत्येव पठनीयम्। इदमेवात्राभिप्रेतं मुनिवचनं गङ्गाधरकृत
इति सम्प्रदायः। वस्तुतश्चैतदुपलक्षणमेतदद्ध्यायान्तेऽभिनवगुप्तादिपठितस्य सकलस्य
शान्तविषयकनाट्यशास्त्रीयसन्दर्भस्य।
इन रसों के समर्थन में भरतमुनि का वचन भी प्रमाण है—
शृङ्गारहास्यकरुणा रौद्रवीरभयानकाः।
बीभत्साद्भुतशान्ताश्च नाट्ये नव रसाः स्मृताः॥
यद्यपि उक्त कारिका का पाठान्तर भी प्रचलित है जिसमें उत्तरार्ध का
स्वरूप—
बीभत्साद्भुतशान्ताश्चेत्यष्टौ नाट्ये रसाः स्मृताः॥
इस प्रकार उपलब्ध होता तथापि यह पाठान्तर शान्तरस का अपलाप करने
वालों द्वारा गढ़ा गया है—ऐसा आचार्य अभिनवगुप्त ने इस पद्य की टीका में
कहा है¹।
१. सम्पूर्ण सन्दर्भ को पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता कि अभिनवगुप्त भी शान्तरस के
विषय में दृढ़ विचार नहीं रखते। विशेष विवेचन विद्वानों को स्वयं
करना चाहिए।
प्रथमाननम् ११७
शान्तस्य शमसाध्यत्वान्नटे च तदसंभवात् ।
अष्टावेव रसा नाट्ये न शान्तस्तत्र युज्यते ॥
इत्याहुः । तच्चापरे न क्षमन्ते । तथा हि—नटे शमाभावादिति हेतुर-
संगतः, नटे रसाभिव्यक्तेरस्वीकारात् । सामाजिकानां शमवत्त्वेन तत्र
रसोद्बोधे बाधकाभावात् । न च नटस्य शमाभावात्तदभिनयप्रकाशकत्वा-
नुपपत्तिरिति वाच्यम्, तस्य भयक्रोधादेरप्यभावेन तदभिनयप्रकाशक-
ताया अप्यसंगत्यापत्तेः । यदि च नटस्य क्रोधादेरभावेन वास्तवतत्का-
र्याणां वधबन्धादीनामुत्पत्त्यसंभवेऽपि कृत्रिमत्तत्कार्याणां शिक्षाभ्यासादित
शान्तापलापिनां मतमुपन्यस्यति—केचित्त्वित्यादिना । शमसाध्यत्वादित्यस्य
शमस्थायिकत्वादित्यर्थः । तदसम्भवादिति । नटस्य शमवत्त्वे हि तस्य नटत्वानुप-
पत्तिरित्याशयः । एतन्मतं निरस्यन्नाह—तच्चेत्यादि । असङ्गतः = असिद्धः, अपक्ष-
धर्मत्वादित्यर्थः । यत्र सामाजिके शान्तरसोद्बोध इष्टस्तत्र शमाभावस्य पराभिमतस्य
हेतोरसत्त्वेन शान्तरसोद्बोधाभावसाध्यसामानाधिकरण्यरूपव्याप्तिमत्त्वेऽपि पक्षा-
वृत्तित्वेन स्वरूपासिद्धोऽयं शमाभावात्मको हेतुः । यत्र तु स वर्त्तमानस्तत्र नटादौ
कुछ लोग मानते हैं—
"शान्त रस का स्थायी भाव है शम जो नट में हो नहीं सकता । अतः नाट्य
में आठ हीं रस होते, शान्त रस तो कहीं हो नहीं सकता ॥"
परन्तु इससे सब आचार्य सहमत नहीं है । इसका कारण यह है—नाट्य में
शान्त रस के न होने का जो हेतु 'नट में शम का अभाव' बताया गया है वह
असंगत है । वह संगत तब होता जब जिन सामाजिकों को रसानुभूति होती
उनमें शम न होता । परन्तु सामाजिकों में तो शम हो हीं सकता है। ऐसी स्थिति
में उनमें शमाभाव तो है नहीं । हाँ, नट में शमाभाव अवश्य है, किन्तु उसे तो
रसानुभूति नट के रूप में होती हीं नहीं । तो फिर नट में शमाभाव से नाट्य में
शान्तरस के अभ्युपगम में कौन सी बाधा आती ? नट में शम न होने से वह शान्त-
रसानुकूल अभिनय हीं नहीं कर सकता — यह कहना भी अयुक्त है, क्योंकि तब तो
उसमें अभिनय-काल में वास्तविक भय एवं शोक आदि के भी न रहने से वह
भयानक, करुण आदि रसों के अभिव्यञ्जक अभिनय भी न कर पाता । अतः अन्य
रसों के अनुकूल अभिनय के प्रसंग में यह मानना हीं होगा कि नट में वास्तविक
भय आदि तथा उनके कार्य आदि का अभाव होने पर भी अभिनय करने की
शिक्षा तथा अभिनय के अभ्यास आदि के प्रभाव से वह भय आदि के कार्यों का
अभिनय कर लेता है । ऐसी स्थिति में शम के अभाव में भी शम के कार्यों का
११८ रसगङ्गाधरः
उत्पत्तौ नास्ति बाधकमिति निरीक्ष्यते, तदा प्रकृतेऽपि तुल्यम् ।
अथ नाट्ये गीतवाद्यादीनां विरोधिनां सत्त्वात्सामाजिकेष्वपि विषयव-
मुख्यात्मनः शान्तस्य कथमुद्रेक इति चेत् ? नाट्ये शान्तरसमभ्युपगच्छद्भिः
फलबलात्तद्गीतवाद्यादेस्तस्मिन्विरोधिताया अकल्पनात् । विषयचिन्ता-
सामान्यस्य तत्र विरोधित्वस्वीकारे तदीयालम्बनस्य संसारानित्यत्वस्य
तदुद्दीपनस्य पुराणश्रवण-सत्सङ्ग-पुण्यवन-तीर्थावलोकनादेरपि विषयत्वेन
विरोधित्वापत्तेः । अत एव च चरमाध्याये संगीतरत्नाकरे--
अष्टावेव रसा नाट्येष्विति केचिदचूचुदन् ।
तदचारु, यतः कंचित्न रसं स्वदते नटः ॥
शान्तोद्बोधाभावसाधकत्वमस्त्येवेत्याह--नट इत्यादिना । तत्कार्याणाम् = क्रोधादि-
कार्याणामाङ्गिकाभिनयानाम् ।
सामाजिके शमवत्त्वस्य बाधितत्वमाशङ्कते—अथेत्यादिना । विरोधितायाः=
बाधकतायाः । विषयत्वेनेति । विषयत्वस्य केवलान्वयित्वादिति भावः । शेषो
ग्रन्थो निगदव्याख्यातः ॥
प्रदर्शन उसके द्वारा हो ही सकता है जिससे शान्त रस की सामाजिकों मे अभिव्यक्ति
हो जाती है ।
अब प्रश्न यह उठता है कि (शान्त रस के) विरोधी गीत-वाद्य आदि के
अभिनय-काल में आवश्यक होने से सामाजिकों मे विषयवैराग्यात्मक शान्तरस
का उद्बोध कैसे होगा । इसका यही उत्तर है कि कि जो नाट्य में शान्तरस मानते
उनके मत में विशेष प्रकार के गीत-वाद्य आदि शान्त रस के उद्बोध में प्रतिबन्धक
नहीं है, क्योंकि जब गीत-वाद्य आदि के रहने पर भी सामाजिकों मे नाट्यावलोकन
से शान्तरसोद्बोधरूप फल प्रामाणिक है तो फिर गीत-वाद्य आदि उसके प्रतिबन्धक
कैसे हो सकते ? यदि विषयमात्र (= सभी विषयों) के चिन्तन को शान्तरसोद्बोध
का विरोधी मान कर विषयान्तर्गत गीत-वाद्य आदि को भी उसका विरोधी कहा
जाय तब गीत-वाद्य आदि को हीं क्यों, शान्तरस के (= शम के) आलम्बन
विभाव-संसाराऽनित्यत्व और उद्दीपनविभाव-पुराणश्रवण, सत्संग, पुण्यवन और
तीर्थादि के दर्शन-भ्रमण आदि को भी वे विरोधी क्यों नहीं कहते, कारण, ये सब
भी तो विषय हीं है । अतः शान्तरस के विरोध में दी गई युक्ति असंगत है । इसी
लिए सङ्गीतरत्नाकर के अन्तिम अध्याय में नाट्य में भी शान्तरस की स्थापना
करते हुए कहा गया है-
"कुछ लोग ऐसा कहते कि नाट्य में आठ ही रस होते । किन्तु यह अशो-
प्रथमाननम् ११९
इत्यादिना नाट्येडपि शान्तो रसोऽस्तीति व्यवस्थापितम् । यैरपि नाट्ये
शान्तो रसो नास्तीत्यभ्युपगम्यते तैरपि बाधकाभावान्महाभारतादिप्रब-
न्धानां शान्तरसप्रधानतया अखिललोकानुभवसिद्धत्वाच्च काव्ये सोऽवश्यं
स्वीकार्यः । अत एव 'अष्टौ नाट्ये रसाः स्मृताः' इत्युपक्रम्य 'शान्तोऽपि
नवमो रसः' इति मम्मटभट्टा अप्युपसंजह्रुः ॥
अमीषां च—
रतिः शोकश्च निर्वेदक्रोधोत्साहाश्च विस्मयः ।
हासो भयं जुगुप्सा च स्थायिभावाः क्रमादमी ॥
रसेभ्यः स्थायिभावानां घटादेर्घटाद्यवच्छिन्नाकाशादिव प्रथम-
स्थायिभावानामित्यस्य भेदो बोध्य इत्यनेनान्वयः । भेदस्वरूपमाह—घटा-
देरित्यादिना । व्यक्ति(=भग्नावरणविद् )विषयीकृतो रत्यादिरेव रस इत्य-
भिनवगुप्तमते प्रथमे नीलघटघटयोरिव यद्यपि रसस्थायिभावयोर्भेदस्तथापि
वस्तुतस्तु' इत्यादिना वर्णितेऽभिनवगुप्तमतात्पर्यविषयीभूते रत्याद्यवच्छिन्नचित एव
रसत्वे रसस्याकाशस्थानीयत्वेनावच्छेद्यत्वम् स्थायिभावस्य पुनर्धटादिस्थानीयत्वे-
नाऽवच्छेदकत्वमित्यनयोर्भेद उक्तः । द्वितीये पुनर्भट्टनायकोक्तमते भुज्यमानो
रत्यादी रस इति पक्षे नावच्छेद्यावच्छेदकरूपदनयोर्भेद अपि तु प्राग्वदेव । परन्तु
पूर्वोक्तवस्तुतस्त्वित्यादियुक्तिसाहित्येन रत्याद्यवच्छिन्नस्य भोगस्य चिदपरपर्यायस्य
रसत्वमिति पक्षेऽवच्छेद्यावच्छेदकयोरिवानयोर्भेदो बोध्यः । तृतीये = 'नव्यास्तु' इति
प्रतीकमादाय वर्णिते पक्षे । अस्मिंश्च दुष्यन्तादिनिष्ठसत्यरत्यादेः स्थायित्वम्
सहृदयनिष्ठाऽनिर्वचनीयरत्यादेश्च रसत्वमित्यनयोर्भेदः । चतुर्थे = 'परे तु' इत्यादिना
भनीय है, क्योंकि नट तो किसी भी रस का आस्वादन करता नहीं । ( अतः नट
में शमाभाव को शान्तरस न मानने में हेतु नहीं माना जा सकता ) ।"
जो लोग नाट्य में शान्तरस नहीं मानते उन्हें भी महाभारत आदि प्रबन्ध
काव्यों में शान्तरस मानना ही है, क्योंकि इन प्रबन्धों के अभिनेय न होने से
‘नट में शमाभावस्वरूप’ शान्तरस-बाधक हेतु यहाँ बाधक नहीं हो सकता ।
इसके अतिरिक्त, भारतादि प्रबन्धों में शान्तरस सर्वानुभवसिद्ध भी है । अतः इसका
अपलाप किसी भी युक्ति (=युक्त्याभास ) से नहीं किया जा सकता ॥
उक्त नौ रसों के क्रमशः निम्नलिखित नौ स्थायिभाव हैं—रति, शोक, निर्वेद,
क्रोध, उत्साह, विस्मय, हास, भय और जुगुप्सा ॥
इन रसों तथा इनके स्थायिभावों में निम्ननिर्दिष्ट अन्तर है—रसविषयक
प्रथम और द्वितीय मतों में तो रस और स्थायिभाव में वही अन्तर है जो घटा-
१२० रसगङ्गाधरः
द्वितीययोर्मतयोः, सत्यरजतस्यानिर्वचनीयरजतादिव तृतीये, विषयस्य
(रजतादेः) ज्ञानादिव चतुर्थे भेदो बोध्यः ।
तत्र आप्रबन्धं स्थिरत्वादमीषां भावानां स्थायित्वम् । न च चित्तवृत्ति-
प्रदर्शिते मते । अत्र च भावनास्वरूपदोषमहिम्ना सामाजिकस्य स्वात्मनि दुष्यन्तादि-
तादात्म्यावगाहिशकुन्तलादिविषयकरत्यादिमदभेदबोधस्यैव मानसस्य रसत्वेन रसो
ज्ञानस्थानीयः, स्थायी रत्यादिश्च तद्विषयस्थानीय इत्यर्थः । पञ्चमषष्ठयोस्तु मतयोः
प्रकारभेदेन स्थायिन एव रसत्वमिति न भेद उक्तो गङ्गाधरकृता । सप्तमादिमतेषु
पुनर्विभावादीनां समवेतानामसमवेतानां वा रसत्वेन तत्र रसस्थायिभावयोराश्रया-
श्रयिवत् कारणकार्यवत्सहकार्यसहकारिवद्वा भेदोऽवगन्तव्यः । मतानामेषामनुपादेयत्वेन
ग्रन्थकृन्नैतानि विवेचितवान् । पञ्चमादिमते तु न भेद इति न तद्विवेचितमिति
व्याख्यानन्तु चिन्त्यम् ।
रत्यादीनां स्थायिपदव्यपदेशनिमित्तमाह—तत्रेत्यादिना । अभिव्यक्तः-
वच्छिन्न आकाश और उसके अवच्छेदक घट में है। प्रथममत में (अभिनवगुप्तमत),
जिसे 'वस्तुतस्तु' प्रतीक के अन्तर्गत ग्रन्थकार ने प्रस्तुत किया है, रत्याद्यवच्छिन्न
भग्नावरणा चित् रस है। अतः रत्यादि स्थायी भाव अवच्छेदक और चित्स्वरूप
रस अवच्छेद्य है। द्वितीय मत (भट्टनायकमत्त) में रत्यादिभोग को रस कहा
गया है। इसमें विशेषणीभूत रत्यादि स्थायिभाव अवच्छेदक और भोगस्वरूप रस
अवच्छेद्य है। 'नव्यास्तु' इस प्रतीक के अर्न्तगत जो तृतीय मत प्रस्तुत किया गया
है उसमें दुष्यन्तादिनिष्ठ सत्य रत्यादि स्थायिभाव हैं और सामाजिक में
उत्पन्न अनिर्वचनीय रत्यादि रस हैं। अतः वेदान्तसिद्धान्त में जो अन्तर सत्य रजत
और अनिर्वचनीय रजत में माना गया है वही इस मत में स्थायिभाव ओर रस में
है। 'परे तु' प्रतीकान्तर्गत रसविषयक चतुर्थ मत में तो शकुन्तलादिविषयक
रत्यादि से विशिष्ट दुष्यन्तादि के साथ अपना भ्रमात्मक अभेद-बोध हीं रस है।
अतः इस मत में ज्ञान और उसके विषय में जो अन्तर होता वही अन्तर रस और
स्थायिभाव में है। पञ्चम और षष्ठ मतों में तो प्रकारभेद से स्थायिभाव को
हीं रस कहा गया है। अतः इन दोनों मतों में रस और स्थायिभाव में कोई
तात्त्विक अन्तर नहीं है। सप्तम से एकादश तक के मतों में विभावादि को समुदित
रूप में अथवा असमृदित रूप में रस कहा गया है। अतः इन मतों के अनुसार रस
और स्थायिभावों में आश्रय-आश्रित, कारण-कार्य या सहकार्य-सहकारी के समान
अन्तर है। किन्तु इन मतों के उपेक्षणीय होने से ग्रन्थकार न इन मतों में अन्तर
नहीं बताया है।
रत्यादि भावों को स्थायी इसी लिए कहा जाता है चुँकि ये प्रबन्धपर्यन्त
यहाँ पृष्ठ की देवनागरी सामग्री का पंक्तिबद्ध लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:
प्रथमाननम् १२१
रूपाणामेषामार्युविनाशित्वेन स्थिरत्वं दुर्लभम वासना रूपतया स्थिरत्वं तु
व्यभिचारिष्वतिप्रसक्तमिति वाच्यम, वासना रूपाणाममीषां मुहुर्मुहुरभि
व्यक्तेरेव स्थिरपदार्थत्वात्। व्यभिचारिणां तु नैव, तदभिव्यक्तेर्विद्युदु-
द्योतप्रायतवात्।
यदाहुः -
विरुद्धैरविरुद्धैर्वा भावैर्विच्छिद्यते न यः ।
आत्मभावं नयत्याशु स स्थायी लवणाकरः ॥
चिरं चित्तेऽवतिष्ठन्ते संबध्यन्तेऽनुबन्धिभिः ।
रसत्वं ये प्रपद्यन्ते प्रसिद्धाः स्थायिनोऽत्र ते ॥
स्मृतेः। एवंरूपमेव दृढतरत्वं संस्कारस्य नैयायिकादयोऽप्यङ्गीकुर्वन्ति । विच्छिद्यते =
विनाश्यते । आत्मभावम् = स्वरूपताम्, स च स्वाङ्गत्वसम्पादनद्वारेति बोध्यम् ।
लवणाकर इत्युपमानम् । यथा लवणाकरः स्वसंसृष्टानि प्रवाहान्तरजलानि स्वरूपतं
लवणरूपतां प्रापयति तद्वदयं स्थाय्यपि स्वसंसृष्टान् विरुद्धानविरुद्धवांश्चान्यान् स्वरूपतां
प्रापयति । एतच्च प्रकर्षकृतमेव रत्यादौ । अयं च सन्दर्भः समूहालम्बनात्मक रसपक्षे
सुकरविवरणः । विरुद्धत्वं च भावानां स्वभावभेदान्न त्वनुपकारकत्वात् । अत एव
स्थिर रहते । अब प्रश्न यह है कि ये रत्यादि चित्तवृत्तिविशेषस्वरूप हैं; अतः ये
स्वरूपतः तो स्थिर हो हीं नहीं सकते, क्योंकि योग्य वित्तवृत्तियां अपनी उत्पत्ति के
तृतीय क्षण में विनष्ट हो जातीं अथवा तभी तक स्थिर रहतीं जब तक अन्य वृत्ति
का चित्त में उदय नहीं हो जाता; हां वासना (= संस्कार ) रूप में ये रह सकतीं
हैं, किन्तु संस्कार रूप में तो केवल रत्याद्यात्मक चित्तवृत्तियां ही नहीं अपि तु
व्यभिचारिस्वरूप चित्तवृत्तियां भी स्थिर रहतीं हीं हैं । ऐसी दशा में यदि वासना-
रूप में स्थिर रहने के कारण रत्यादिभावों को स्थायी कहा जाय तब तो व्यभि-
चारिभावों को भी स्थायी क्यों न कहा जाय । इस प्रश्न का उत्तर यही है कि
वासनात्मक रत्यादि की पुनः पुनः अभिव्यक्ति (= उद्बोधक का समवधान होने से,
स्मरण होना) हीं उनकी स्थिरता है। ऐसी स्थिरता वासनात्मक व्यभिचारिभावों
की नहीं, क्योंकि उनकी अभिव्यक्ति तो बिजली की चमक की तरह कभी-कभी एक
दो बार हीं होती है, वारम्वार नहीं । जैसा प्राचीन आचार्यों ने कहा है—
"जो भाव अपने प्रतिकूल और अनुकूल भावों द्वारा कभी विनष्ट न
होने से बारम्बार अभिव्यक्त होता और स्वसंसृष्ट अन्य जलों को स्वाङ्ग बनाकर
स्वाभिन्न-सा बनाने वाले क्षारसमुद्र के समान अन्य भावों को स्वाभिन्न-सा बना
देता वही स्थायी है ।। जो भाव चिर काल तक चित्त में वासना रूप में विद्यमान
१२२ रसगङ्गाधरः
चिरमिति व्यभिचारिवारणाय । अनुबन्धिभिर्विभावाद्यैः ।
तथा—
सजातीयविजातीयैरतिरस्कृतमूर्त्तिमान् ।
यावद्रसं वर्तमानः स्थायिभाव उदाहृतः ।। इति ।
केचित्तु रत्याद्यन्यतमत्वं स्थायित्वमाहुः । तन्न । रत्यादीनामेकस्मिन्प्र-
रूढेऽन्यस्याप्ररूढस्य व्यभिचारित्वोपगमात् । प्ररूढत्वाऽप्ररूढत्वे बह्वल्प-
मृष्टभोजनादौ स्वभावविरुद्धस्याप्यम्लादेरुपकारकत्वं दृष्टम् । स्वभावभेदेऽपि विरो-
धोऽयं तावदेव काव्योपकारी यावदङ्गिभावापेक्षयाऽङ्गभावो न प्ररूढतर इत्यादि
ध्वन्यालोकादिग्रन्थेभ्योऽवसेयम् । स्वयं च ग्रन्थकृद् व्याख्यास्यत्यग्रे । ईदृशमेव
विजातीयत्वमभिमतमग्रिमपद्येऽपि । मूर्त्तिः = स्वरूपम्, तच्च वासनात्मकम् । यद्वा
मूर्त्तिरभिव्यक्तिः, तत्राभिव्यक्तिः स्मृतिः । सा चोत्तरोत्तरा, स्वपूर्वस्मृतेविरुद्धभावेन
तिरस्कारात् । अत एव मुहुर्मुहुरभिव्यक्तिरुक्ता ।
बह्वल्पेति । निबद्धाक्षिसान्यतरसकलविभावजत्वं प्ररूढत्वं तद्भिन्नत्वं
चाऽप्ररूढत्वं रत्यादेरित्यर्थः । विभावपदस्य चात्रानुभावाद्युपलक्षणत्वम् । जन्यत्वं
होकर उद्बोधक की उपस्थिति में बारम्बार अभिव्यक्त होते, अनुबन्धियों
( = विभाव आदि ) से सम्बद्ध होते, अर्थात् उन्हें अपने अनुकूल बना लेते, और
अन्ततः रसरूपता को प्राप्त होते वे प्रसिद्ध रत्यादि भाव हीं नाट्यदि में 'स्थायी'
नाम से प्रसिद्ध हैं।।"
द्वितीय पद्य में 'चिर काल तक' यह अंश व्यभिचारी भावों में स्थायी भाव
के लक्षण की अतिव्याप्ति के निराकरणार्थ दिया गया है। यहाँ 'अनुबन्धी' शब्द का
अर्थ विभाव-अनुभाव-सञ्चारिभाव है। और भी,
"स्थायी भाव उसी को कहा गया है जिसकी मूर्त्ति ( = उत्तरोत्तर अभिव्यक्ति)
पूर्वपूर्व सजातीय अथवा विजातीय भावों (व्यभिचारिभावों) द्वारा अवरुद्ध नहीं होती
और जो तब तक वासनारूप में चित्त में वर्त्तमान रहता जब तक वह रसरूपता
को प्राप्त न हो जाता।।"
कुछ आचार्य रति आदि में से अन्यतम को हीं 'स्थायी' मानते । किन्तु यह
लक्षण उचित नहीं है । इन नौ भावों में से एक के प्ररूढ़ होने पर अप्ररूढ़ावस्थ अन्य
भाव स्थायी नहीं, अपितु व्यभिचारी माने जाते हैं। जैसे शृंगार के सन्दर्भ में रति
प्ररूढ़ होती पर हास अप्ररूढ़ । इसमें स्थायी भाव केवल रति है, हास नहीं। वह तो
शृंगार के व्यभिचारी भावों में से एक है। किन्तु ऐसे हासादि व्यभिचारी भाव भी तो
नौ भावों में अन्यतम है हीं। अतः रत्याद्यन्यतमत्वस्वरूप स्थायिभावलक्षण की उक्त-
प्रथमाननम् १२३
विभावजत्वे ।
तदुक्तं रत्नाकरे—
रत्यादयः स्थायिभावाः स्युर्भूयिष्ठविभावजाः ।
स्तोकैर्विभावैरुत्पन्नास्त एव व्यभिचारिणः ॥ इति ।
एवं च वीररसे प्रधाने क्रोधः, रौद्रे चोत्साहः, शृङ्गारे हासो
व्यभिचारी भवति, नान्तरीयकश्च । यदा तु प्रधानपरिपोषार्थं सोऽपि
बहुविभावजः क्रियते तदा तु रसालंकार इत्यादि बोध्यम् ॥
तत्र—
चात्राभिव्यज्यमानत्वसाधारणम् । एवं चेति । स्तोकविभावजत्वे चेत्यर्थः ।
वीररसेत्यादि । तदुक्तं दर्पणे—
शृङ्गारवीरयोर्हासो वीरे क्रोधस्तथा मतः ।
शान्ते जुगुप्सा कथिता व्यभिचारितया पुनः ॥ इति ।
प्रधान इति । उभयोः प्ररूढत्वेऽपि वीरादेः प्राधान्यं प्राकरणिकत्वादिनः
बोध्यम् । रसालङ्कार इति । तदुक्तं ध्वनिकृता —
प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे यत्राङ्गं तु रसादयः ।
काव्ये तस्मिन्नलङ्कारो रसादिरिति मे मतिः ॥ इति ।
विध हासादि में अतिव्याप्ति हो जाने से यह लक्षण असंगत है । जब ये रत्यादि
भाव विभावादि (=अनुभाव तथा व्यभिचारिभावों) की सामग्री से उत्पन्न
अथवा ज्ञाप्य होते तब इन्हें प्ररूढ कहा जाता । इसके विपरीत, यदि ये भाव
विभावादि-सामग्री से नहीं अपितु इसमें से कुछ से हीं उत्पन्न या ज्ञाप्य होते तो इन्हें
अप्ररूढ कहा जाता । यही विषय सङ्गीतरत्नाकर में स्पष्ट रूप में कहा गया है—
"यदि ये रत्यादि भाव सम्पूर्ण विभावादि-सामग्री से उत्पन्न या ज्ञाप्य होते तब
तो ये स्थायिभाव कहलाते । किन्तु यत्किञ्चिद् विभावादि से उत्पन्न या ज्ञाप्य होने
पर ये हीं रत्यादिभाव व्यभिचारिभाव हो जाते ॥"
इस प्रकार, वीर रस (=उत्साह) के प्रधान (=प्ररूढ़) होने पर क्रोध, रौद्र
(=क्रोध) के प्रधान होने पर उत्साह और शृंगार (=रति) के प्रधान होने पर
हास व्यभिचारी भाव हैं । क्रोधादि के बिना वीर आदि रसों के परिपुष्ट न होने से
ये व्यभिचारि-स्थानीय क्रोधादिभाव उनमें नान्तरीयक (=अवश्यम्भावी) हैं । जब
मुख्य भाव के परिपोषण के लिए गौण भाव भी बहुविभावादिजन्य, अर्थात् प्ररूढ़
रूप में कवि द्वारा निबद्ध किये जाते तो भी ये भाव गौण होने से रसस्थानीन न
होकर रस (प्रधान भाव = स्थायी भाव) के अलङ्कार मात्र होते ॥
१२४ रसगङ्गाधरः
स्त्रीपुंसयोरन्योन्यालम्बनः प्रेमाख्यश्चित्तवृत्तिविशेषो रतिः स्थायि-
भावः ॥
गुरुदेवतापुत्राद्यालम्बनस्तु व्यभिचारी ।
पुत्रादिवियोगमरणादिजन्मा वैक्लव्याख्यश्चित्तवृत्तिविशेषः शोकः ॥
स्त्रीपुंसयोस्तु वियोगे जीवितत्वज्ञानदशायां वैक्लव्यपोषिताया रतेरेव
प्राधान्याच्छृङ्गारो विप्रलम्भाख्यो रसः । वैक्लव्यं तु संचारिमात्रम् । मृतत्व
सम्प्रति स्थायिभावान् विशेषतो लक्षयितुकाम आदौ स्वभावतोऽनुरञ्जकस्य
शृङ्गारस्य स्थायिभावं रतिं लक्षयति—स्त्रीपुंसयोरिति । पुत्रादीति । आदिशब्देन
मुनिनृपादिपरिग्रहः । व्यभिचारीति । तदुक्तं प्रदीपकृता—
रत्यादिश्चेन्निरङ्गः स्याद् देवादिविषयोऽथवा ।
अन्याङ्गभावभाग्वा स्यान्न तदा स्थायिशब्दभाक् ॥ इति ।
पुत्रादीति । आदिशब्द इष्टमात्रोपसंग्राहकः । द्वितीय आदिशब्द इष्टाश्रिता-
निष्टमात्रोपलक्षकः । सञ्चारिमात्रमिति । वैक्लव्यस्य चिरमवस्थानाभावादिति
हेतुरत्र । वैक्लव्यस्येत्यत्र प्राधान्यादित्यनुषज्यते । विप्रलम्भः = विप्रलम्भशृङ्गारः ।
रति-नामक स्थायिभाव वह है जिसे प्रेम कहते हैं । यह एक प्रकार की चित्त-
वृत्ति है जिसके आलम्बन परस्पर नायक और नायिका होते हैं ॥
किन्तु इसी रति का आलम्बन यदि गुरु, देवता या पुत्र आदि इष्टजनों में से
कोई होता तो वह स्थायिभाव न होकर (करुण आदि रसों में) व्यभिचारिभाव
हो जाती ।
शोक-नामक स्थायिभाव वह है जिसे विकलता (= वैक्लव्य) कहते हैं । यह भी
एक प्रकार की चित्तवृत्ति है और इसकी उत्पत्ति पुत्र आदि इष्टजन के वियोग
अथवा मरण आदि से होती ॥
यदि नायक-नायिका का वियोग हो किन्तु एक दूसरे के जीवित होने का
ज्ञान हो तो वहाँ विप्रलम्भ शृंगार हीं होता, क्योंकि वहाँ परस्पर वियोग से
विकलता होने पर भी प्रधानता रति की हीं रहती । विकलता तो उस रति
का परिपोषण मात्र करती । अतः इसमें होने वाली विकलता व्यभिचारिभाव है,
स्थायिभाव नहीं । हाँ, यदि एक को दूसरे के मर जाने का ज्ञान हो तब तो विकलता
के हीं प्रधान होने से वहाँ करुण रस हीं होगा । रति उस विकलता का केवल
परिपोषक होगी । तात्पर्य यह है कि जिस व्यक्ति से जितना हीं प्रेम होता उसके
विनाश से उतना ही अधिक क्लेश भी होता । अतः प्रियतम या प्रियतमा के मरण
से सर्वाधिक मात्रा में क्लेश (= विकलता) होना स्वाभाविक है । यतः मरण के
ज्ञान के बाद मिलन की कोई आशा नहीं रह जाती अतः ऐसी दशा में विकलता
प्रथमाननम् १२५
ज्ञानदशायां तु रतिपोषितस्य वैक्लव्यस्येति करुण एव। यदा तु
सत्यपि मृतत्वज्ञाने देवताप्रसादादिना पुनरुज्जीवनज्ञानं कथञ्चित्स्यात्, तदा-
लम्बनस्यात्यन्तिकनिरासाभावाच्चिरप्रवास इव विप्रलम्भ एव, न स
करुणः। यथा चन्द्रापीडं प्रति महाश्वेतावाक्येषु। केचित्तु रसान्तरमेवात्र
करुणविप्रलम्भाख्यमिच्छन्ति।
नित्यानित्यवस्तुविचारजन्मा विषयविरागाख्यो निर्वेदः॥
केचित् = दर्पणकारादयः। इच्छन्तीति। एतेनात्रारुचिः सूचिता। तद्बीजन्तु
वैक्लव्यस्य चिरमवस्थानाभावेन तस्य स्थायित्वानुपपत्तिरेव। अभिनिवेशस्य
चिरमवस्थानेऽभ्युपगते तु शृङ्गारोच्छेदापत्तिर्दोषः।
शान्तस्थायिभावं लक्षयति—नित्येत्यादिना। नित्यं च अनित्यं चेति नित्या-
नित्ये, तयोर्वसतीति नित्यानित्यवस्तु। यद्वा तयोर्वसत इति नित्याऽनित्यवस्तूनी।
तयोर्विचारेण विवेकेन जन्म यस्येति विग्रहः। अनित्यस्य वस्तुत्वाभावेन नित्या-
नित्ययोर्द्वन्द्वे कृते वस्तुशब्देन कर्मधारयोऽयुक्तः। नित्य आत्मा तदन्यत्सर्वमनित्यम्।
तथा च परस्परविरुद्धयोर्नित्यानित्यधर्मयोर्विवेकेन जायमानो विषयविरागो निर्वेद
इति फलति। इदमेव तत्त्वज्ञानजन्यं वैराग्यमित्युच्यते। एतेनेर्ष्यादिजनितवैराग्यस्य
स्थायित्वाभावः सूचितः। अत एव—
का स्थायित्व स्पष्ट है। रति तो उस विकलता का परिपोषक मात्र होती।
अत एव यहाँ करुण रस हीं उचित है, विप्रलम्भ शृङ्गार नहीं। अत एव
यदि नायक-नायिका में से एक के मरण का ज्ञान होने पर भी देवताप्रसाद
आदि से उसके पुनरुज्जीवन का ज्ञान हो तो वहाँ आदि-अन्त में रति के
वर्त्तमान रहने से मध्य में मरण के कारण कुछ समय के लिए विकलता होने पर भी
स्थायित्व रति का ही होता। अतः ऐसी दशा में रति के वियोगकालावच्छिन्न
होने से विप्रलम्भ शृङ्गार रस हीं होता, करुण रस नहीं। कादम्बरी का महाश्वेता-
विषयक वर्णन इसका उदाहरण है। यहाँ चन्द्रापीडनिष्ठ महाश्वेताविषयक रति
होने से विप्रलम्भशृङ्गार रस है, करुण नहीं। साहित्यदर्पणकार आदि कुछ
आचार्य तो ऐसे स्थलों में करुण-विप्रलम्भ रस मानना चाहते। किन्तु इसमें आदि
अन्त में विकलता के न होने से उनका मत उचित नहीं प्रतीत होता॥
शान्तरस का स्थायिभाव निर्वेद है जिसे विषयवैराग्य भी कहते। यह वैराग्य
( निर्वेद ) नित्य और अनित्य पदार्थों में वर्तमान धर्मों तथा उन धर्मियों के विवेक
से उत्पन्न होता॥
१२६ रसगङ्गाधरः
गृहकलहादिजस्तु व्यभिचारी ॥
गुरुबन्धुवधादिपरमापराधजन्मा प्रज्वलनाख्यः क्रोधः ॥
अयं च परविनाशादिहेतुः । क्षुद्रापराधजन्मा तु परुषवचनासंभाषणा-
दिहेतुः । अयमेवामर्षाख्यो व्यभिचारीति विवेकः ॥
परपराक्रम-दानादिस्मृतिजन्मा औन्नत्याख्य उत्साहः ॥
अलौकिकवस्तुदर्शनादिजन्मा विकासाख्यो विस्मयः ॥
गन्तव्यं यदि नाम निश्चितमहो ! गन्ताऽसि केयं त्वरा
द्वित्राण्येव पदानि तिष्ठतु भवान् पश्यामि यावन्मुखम् ।
संसारे घटिकाप्रणालविगलद्वारा समे जीविते
को जानाति पुनस्त्वया सह मम स्याद्वा न वा सङ्गमः ॥
इत्यत्र दैन्यजो विरागो विप्रलम्भे व्यभिचार्येव, तत्पोषकत्वात् । न तस्य
स्थायित्वम् । अतोत्र रससङ्करानौचित्यवर्णनमसहृदयतामेव प्रकाशयति । एतत्सर्व-
मभिप्रेत्याह—गृहकलहादिजेत्यादि ।
रौद्रस्थायिभावलक्षणमाह—गुरुबन्धुवधेत्यादि । आदिपदमिष्टमात्रोपसंग्रा-
हकम् । प्रज्वलनाख्य इत्यस्य चित्तवृत्तिविशेष इति शेषः । व्यभिचारीति ।
रौद्रादाविति शेषः ।
गृह-कलह आदि से उत्पन्न निर्वेद तो क्षणिक होने से विप्रलम्भ शृंगार आदि
रसों में व्यभिचारिभाव होता, स्थायिभाव नहीं ॥
रौद्र रस का स्थायिभाव क्रोध है जिसे चित्त का प्रज्वलन (जलन) भी कहते ।
यह गुरु अथवा अन्य किसी इष्टजन के वध अथवा उसे अत्यन्त कष्ट आदि पहुँचाने
जैसे उत्कट अपराध किये जाने पर उत्पन्न होता ॥
यही क्रोध उत्कट अपराधी के विनाश आदि का कारण है । किन्तु यदि
अपराध साधारण कोटि का होता तो इससे उसके प्रति लोग कठोर वचन का
प्रयोग करते या फिर बोलते हीं नहीं । अन्य प्रकार की कटु भावना आदि भी इसी
से उत्पन्न होतीं । साधारण कोटि के अपराध से उत्पन्न कोप को हीं अमर्ष कहा
जाता जो रौद्र आदि रसों के व्यभिचारिभावों में अन्यतम है । क्रोध और अमर्ष
में यही अन्तर है ॥
. वीर रस का स्थायिभाव उत्साह है जिसे चित्त का औन्नत्य, अर्थात् उत्कृष्ट-
प्रयत्नसम्पन्नता भी कहा जाता । इसकी उत्पत्ति शत्रु के पराक्रम और उसकी
दानशीलता आदि के स्मरण से होती ॥
अद्भुत रस का स्थायिभाव विस्मय है । अलौकिक वस्तु के दर्शन आदि से
उत्पन्न चित्त का विकास ( विस्तार = फैलना ) हीं इसका स्वरूप है ॥
प्रथमाननम् १२७
वागङ्गादिविकारदर्शनजन्मा विकासाख्यो हासः ॥
व्याघ्रादिदर्शनादिजन्मा परमानर्थविषयको वैक्लव्याख्यः स भयम् ॥
परमानर्थविषयकत्वाभावे तु स एव त्रासो व्यभिचारी । अपरे तु
औत्पातिकप्रभवस्त्रासः, स्वापराधद्वारोत्थं भयमिति भयत्रासयोर्भेदमाहुः ॥
कदर्यवस्तुविलोकनजन्मा विचिकित्साख्यचित्तवृत्तिविशेषा जुगुप्सा ॥
एवमेषां स्थायिभावानां लोके तत्तन्नायकगतानां यान्यालम्बनतयोद्दीपन-
विकारेति। स चात्र स्वाभाविकः, कृत्रिमश्च क्षुद्र एव, गुरुतरविकारोऽपि
स्वकृतः न परकृतः, परकृते हि गुरुतरविकारे क्रोधोदयाद् विकर्तरि इति
बोध्यम् ।
निगडनिबद्धव्याघ्रादिदर्शने कस्यचिद्भयानुदयात् परमानर्थविषयक इत्युक्तम् ।
अतश्च यस्य तथाविधव्याघ्रादिदर्शनेऽपि परमानर्थजनकत्वसम्भावना तस्य भयं
ततोऽप्युत्पद्यत एव । क्षुद्रानर्थविषयकत्वे त्वाह—व्यभिचारीति । बीभत्सादाविति
शेषः । शोकभययोर्वैक्लव्यात्मकत्वेऽपि कारणभेदाद् भेदोऽनयोरवगन्तव्यः । औत्पा-
तिकेति । वज्रनिर्घातादिप्रभव इत्यर्थः । अत्रापि कारणभेदादेव त्रासभयोर्भेदः ।
कदर्यम् = कुत्सितम् । विचिकित्सा = गर्हणा । एते च रत्यादयो यथोद्देशं
शृङ्गारादीनां स्थायिनः ।
सम्प्रति आलम्बनकारणादीनां विभावपदव्यपदेशे हेतुमाह—एवमित्यादिना ।
हास्य रस का स्थायिभाव हास है । इसे किसी व्यक्ति के वचन, अङ्ग प्रत्यङ्ग
तथा वेष आदि में विद्यमान विकार के ज्ञान से उत्पन्न चित्तविकास (चित्त का खिल
उठना) कहा जाता है ॥
व्याघ्र आदि हिंस्र जीवों या अन्य किन्हीं परम अनर्थ (= मरण आदि) के जनक
वस्तुओं के दर्शन-श्रवण आदि से उत्पन्न जो चित्त की उत्कट विकलता है वही भय
है । यही भयानक रस का स्थायिभाव है ॥
यदि यह चित्त विकलता परमानर्थविषयक न हो, अर्थात् किसी साधारण अनिष्ट
का जनक प्रतीत होती हो तो उसे 'त्रास' कहते, 'भय' नहीं । अतः त्रास व्यभिचारी
भाव है, स्थायी भाव नहीं । कुछ आचार्यों का मत है कि आधिभौतिक-आधिदैविक
आपदाओं से उत्पन्न चित्तविक्लवता त्रास है जब कि अपने (उत्कट) अपराधों से
उत्पन्न विकलता भय है—यही भय और त्रास में ... ने
कारणभेद से भिन्नता (कार्यभेद) माननी चाहिए ॥
किसी कुत्सित पदार्थ के दर्शन आदि से उत्पन्न एक प्रकार की चित्तवृत्ति, जिसे
'विचिकित्सा' (घृणा) कहते, जुगुप्सा है । यही बीभत्स रस का स्थायी भाव है ॥
इस प्रकार पूर्वोक्त विभिन्न नायक-नायिकाओं में विद्यमान रत्यादि नौ स्थायि-
१२८ रसगङ्गाधरः
तया वा कारणत्वेन प्रसिद्धानि तान्येषु काव्यनाट्ययोर्व्यज्यमानेषु विभाव-
शब्देन व्यपदिश्यन्ते ॥
विभावयन्तीति व्युत्पत्तेः ।
यानि च कार्यतया तान्यनुभावशब्देन ॥
अनु पश्चाद्भाव उत्पत्तिर्येषाम् । अनुभावयन्तीति वा व्युत्पत्तेः ।
यानि व्यभिचरन्ति तानि व्यभिचारिशब्देन ॥
एषु = स्थायिभावेषु । व्यज्यमानेष्वित्यनेन वाच्यत्वादिव्यवच्छेदः । विभावयन्ति =
रत्यादिभावान् सामाजिकगतन् आस्वादाङ्कुरप्रादुर्भावयोग्यान् कुर्व्वन्ति । स्थायि-
जनकत्वे सति साधारणीकरणव्यापारविषयत्वं विभावत्वमिति च प्राहुः ।
पश्चादिति । रत्याद्युत्पत्तेरनन्तरम् इत्यर्थः । अतश्चाव्यवहितप्राक्क्षणावच्छेदेन
वर्त्तमाना अनन्यथासिद्धा रत्यादयः स्थायिनः कारणानि, तदव्यवहितोत्तरक्षणा-
वच्छेदेन जायमानाश्चानुभावाः कार्याणीति व्यपदिश्यन्ते । एतस्य चार्थस्य लौकि-
केऽपि रत्यादिकार्ये सम्भवादतिव्यापकत्वमिति हेतोः काव्यमात्रनियतानुभावपद-
प्रवृत्तिनिमित्तान्तरमाह—अनुभावयन्तीति । अनुमापयन्तीत्यर्थः । अनुभावैर्हि
सामाजिकनिष्ठा रत्यादय अनुमीयन्ते, कार्याणां सकारणत्वनियमादिति तात्पर्यम् ।
व्यभिचरन्तीति । विशेषेण आभिमुख्येन कार्यजनने चरन्ति स्थायिन उपकुर्व्वन्ति
ये ते व्यभिचारिणः । सह चरन्तीति पाठेऽपि स्थायिसहकारित्वमेव सञ्चारित्वं
भावानाम् । तदुक्त दर्पणे—
भावों के जो आलम्बन कारण या उद्दीपन कारण के रूप में लोक-प्रसिद्ध हैं उन्हें हीं
काव्य नाट्य में स्थायिभावों के अभिव्यञ्जक होने के कारण 'विभाव' कहलाते ।
ये आलम्बनादि कारण विभाव इस लिए कहलाते यतः ये स्थायिभाव को
विभावित, अर्थात् आस्वाद्ययोग्य, करते । अन्यथा स्थायिभावों का अस्तित्व
प्रमाणित न होने से किसी भी प्रक्रिया द्वारा सहृदयों को रसास्वाद न हो सकेगा ।
मुखदर्शनादि को अनुभाव इस लिए कहते यतः इनका भाव, अर्थात् उत्पादन
स्थायिभावों के पश्चाद्भावी है। पश्चाद्भावी का नियतपूर्वभावी कारण से उत्पन्न—
कार्य होना शास्त्र-सिद्ध है¹ । अथवा, इन्हें अनुभाव इस लिए कहा जाता यतः ये
स्थायिभावों को सहृदयों के लिए अनुभावित, अर्थात् प्रतितियोग्य बनाते—इन्हीं
अनुभावों से सहृदयों को नायकादिनिष्ठ स्थायिभावों की अनुभूति होती ।
जो स्थायिभावों के साथ कभी-कभी रहते उन्हें सञ्चारिभाव और वे हीं
१. यह ज्ञातव्य है कि भिन्न-भिन्न स्थायी भावों से उत्पन्न रोमाञ्च आदि अनु-
भावों को भी परस्पर विलक्षण हीं होना चाहिए ।
प्रथमाननम् १२९
तत्र शृङ्गारस्य स्त्रीपुंसावालम्बने। चन्द्रिकावसन्तविविधोपवनरहः-
स्थानादय उद्दीपनविभावाः। तन्मुखावलोकनतद्गुणश्रवणकीर्तनादयोऽन्ये
सात्त्विकभावाश्चानुभावाः। स्मृतिचिन्तादयो व्यभिचारिणः।
करुणस्य बन्धुनाशादय आलम्बनानि। तत्संबन्धिगृहतुरगाभरणदर्श-
नादयस्तत्कथाश्रवणादयश्चोद्दीपकाः। गात्रक्षेपाश्रुपातादयोऽनुभावाः।
विशेषेणाभिमुख्येन चरन्तो व्यभिचारिणः।
स्थायिन्युन्मग्ननिमग्नाः कल्लोला इव वारिधौ ॥ इति ।
अत एव प्रदीपकृताऽपि वर्णितम्—
ये तूपकर्तुमायान्ति स्थायिनं रसमुत्तमम् ।
उपकृत्य च गच्छन्ति ते मता व्यभिचारिणः ॥ इति ।
इदानीमादिनिर्दिष्टानां शृङ्गारादीनां चतुर्णां रसानां विभावानुभावव्यभिचारि-
भावानाह विशेषेण—तत्रेत्यादिना । उक्तेषु रसेष्वित्यर्थः ।
बन्धुनाशादय इति । नष्टबन्ध्वादय इति केचित् । तत्र नष्टानामालम्बनत्वा-
सर्वदा साथ न रहने, अर्थात् व्यभिचरित होने, से 'व्यभिचारिभाव' भी
कहे जाते ॥
उक्त नवविध रसों में—
शृङ्गार रस के नायक-नायिका आलम्बन विभाव हैं । रति के उभयनिष्ठ होने
से नायक के लिये नायिका और नायिका के लिए नायक आलम्बन विभाव है।
आलम्बन का अर्थ विषयता सम्बन्ध से रत्यादि का आश्रय है। चन्द्रिका, वसन्त
ऋतु, विभिन्न प्रकार के रम्य पुष्पों से सम्पन्न उद्यान, एकान्त स्थान तथा अन्य
कामोद्दीपक पदार्थ इस रस के उद्दीपन विभाव हैं। वारम्बार प्रियतम अथवा
प्रियतमा के मुख का परस्पर अनुरक्तभाव से अवलोकन, उसके गुणों का
श्रवण तथा उच्चारण एवम् रोमाञ्च आदि कुछ अन्य सात्त्विक भाव शृङ्गार
के अनुभाव हैं। अनुरागपूर्वक परस्पर-स्मरण एवं चिन्ता आदि इसके व्यभिचारि-
भाव हैं ॥
इष्ट जनों का विनाश अथवा उन पर आई कोई घोर विपत्ति या नष्ट इष्टजन
१. 'व्यभिचारी' यह नाम इस तथ्य का स्पष्ट संकेत करता कि शास्त्र में जिस रस
के जितने व्यभिचारिभाव गिनाये गये हैं वे सब के सब सर्वत्र रस-स्थल में
होते ही हों—यह आवश्यक नहीं है। वस्तुतः उद्दीपन विभावों और अनुभावों
की भी यही स्थिति है। उनमें सर्वदा सब का होना अनिवार्य नहीं। ग्रन्थ में
निर्देश तो उपलक्षण है।