सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 152

१२० रसगङ्गाधरः
द्वितीययोर्मतयोः, सत्यरजतस्यानिर्वचनीयरजतादिव तृतीये, विषयस्य
(रजतादेः) ज्ञानादिव चतुर्थे भेदो बोध्यः ।
तत्र आप्रबन्धं स्थिरत्वादमीषां भावानां स्थायित्वम् । न च चित्तवृत्ति-
प्रदर्शिते मते । अत्र च भावनास्वरूपदोषमहिम्ना सामाजिकस्य स्वात्मनि दुष्यन्तादि-
तादात्म्यावगाहिशकुन्तलादिविषयकरत्यादिमदभेदबोधस्यैव मानसस्य रसत्वेन रसो
ज्ञानस्थानीयः, स्थायी रत्यादिश्च तद्विषयस्थानीय इत्यर्थः । पञ्चमषष्ठयोस्तु मतयोः
प्रकारभेदेन स्थायिन एव रसत्वमिति न भेद उक्तो गङ्गाधरकृता । सप्तमादिमतेषु
पुनर्विभावादीनां समवेतानामसमवेतानां वा रसत्वेन तत्र रसस्थायिभावयोराश्रया-
श्रयिवत् कारणकार्यवत्सहकार्यसहकारिवद्वा भेदोऽवगन्तव्यः । मतानामेषामनुपादेयत्वेन
ग्रन्थकृन्नैतानि विवेचितवान् । पञ्चमादिमते तु न भेद इति न तद्विवेचितमिति
व्याख्यानन्तु चिन्त्यम् ।
रत्यादीनां स्थायिपदव्यपदेशनिमित्तमाह—तत्रेत्यादिना । अभिव्यक्तः-
वच्छिन्न आकाश और उसके अवच्छेदक घट में है। प्रथममत में (अभिनवगुप्तमत),
जिसे 'वस्तुतस्तु' प्रतीक के अन्तर्गत ग्रन्थकार ने प्रस्तुत किया है, रत्याद्यवच्छिन्न
भग्नावरणा चित् रस है। अतः रत्यादि स्थायी भाव अवच्छेदक और चित्स्वरूप
रस अवच्छेद्य है। द्वितीय मत (भट्टनायकमत्त) में रत्यादिभोग को रस कहा
गया है। इसमें विशेषणीभूत रत्यादि स्थायिभाव अवच्छेदक और भोगस्वरूप रस
अवच्छेद्य है। 'नव्यास्तु' इस प्रतीक के अर्न्तगत जो तृतीय मत प्रस्तुत किया गया
है उसमें दुष्यन्तादिनिष्ठ सत्य रत्यादि स्थायिभाव हैं और सामाजिक में
उत्पन्न अनिर्वचनीय रत्यादि रस हैं। अतः वेदान्तसिद्धान्त में जो अन्तर सत्य रजत
और अनिर्वचनीय रजत में माना गया है वही इस मत में स्थायिभाव ओर रस में
है। 'परे तु' प्रतीकान्तर्गत रसविषयक चतुर्थ मत में तो शकुन्तलादिविषयक
रत्यादि से विशिष्ट दुष्यन्तादि के साथ अपना भ्रमात्मक अभेद-बोध हीं रस है।
अतः इस मत में ज्ञान और उसके विषय में जो अन्तर होता वही अन्तर रस और
स्थायिभाव में है। पञ्चम और षष्ठ मतों में तो प्रकारभेद से स्थायिभाव को
हीं रस कहा गया है। अतः इन दोनों मतों में रस और स्थायिभाव में कोई
तात्त्विक अन्तर नहीं है। सप्तम से एकादश तक के मतों में विभावादि को समुदित
रूप में अथवा असमृदित रूप में रस कहा गया है। अतः इन मतों के अनुसार रस
और स्थायिभावों में आश्रय-आश्रित, कारण-कार्य या सहकार्य-सहकारी के समान
अन्तर है। किन्तु इन मतों के उपेक्षणीय होने से ग्रन्थकार न इन मतों में अन्तर
नहीं बताया है।
रत्यादि भावों को स्थायी इसी लिए कहा जाता है चुँकि ये प्रबन्धपर्यन्त