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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 155

प्रथमाननम् १२३
विभावजत्वे ।
तदुक्तं रत्नाकरे—
रत्यादयः स्थायिभावाः स्युर्भूयिष्ठविभावजाः ।
स्तोकैर्विभावैरुत्पन्नास्त एव व्यभिचारिणः ॥ इति ।
एवं च वीररसे प्रधाने क्रोधः, रौद्रे चोत्साहः, शृङ्गारे हासो
व्यभिचारी भवति, नान्तरीयकश्च । यदा तु प्रधानपरिपोषार्थं सोऽपि
बहुविभावजः क्रियते तदा तु रसालंकार इत्यादि बोध्यम् ॥
तत्र—
चात्राभिव्यज्यमानत्वसाधारणम् । एवं चेति । स्तोकविभावजत्वे चेत्यर्थः ।
वीररसेत्यादि । तदुक्तं दर्पणे—
शृङ्गारवीरयोर्हासो वीरे क्रोधस्तथा मतः ।
शान्ते जुगुप्सा कथिता व्यभिचारितया पुनः ॥ इति ।
प्रधान इति । उभयोः प्ररूढत्वेऽपि वीरादेः प्राधान्यं प्राकरणिकत्वादिनः
बोध्यम् । रसालङ्कार इति । तदुक्तं ध्वनिकृता —
प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे यत्राङ्गं तु रसादयः ।
काव्ये तस्मिन्नलङ्कारो रसादिरिति मे मतिः ॥ इति ।
विध हासादि में अतिव्याप्ति हो जाने से यह लक्षण असंगत है । जब ये रत्यादि
भाव विभावादि (=अनुभाव तथा व्यभिचारिभावों) की सामग्री से उत्पन्न
अथवा ज्ञाप्य होते तब इन्हें प्ररूढ कहा जाता । इसके विपरीत, यदि ये भाव
विभावादि-सामग्री से नहीं अपितु इसमें से कुछ से हीं उत्पन्न या ज्ञाप्य होते तो इन्हें
अप्ररूढ कहा जाता । यही विषय सङ्गीतरत्नाकर में स्पष्ट रूप में कहा गया है—
"यदि ये रत्यादि भाव सम्पूर्ण विभावादि-सामग्री से उत्पन्न या ज्ञाप्य होते तब
तो ये स्थायिभाव कहलाते । किन्तु यत्किञ्चिद् विभावादि से उत्पन्न या ज्ञाप्य होने
पर ये हीं रत्यादिभाव व्यभिचारिभाव हो जाते ॥"
इस प्रकार, वीर रस (=उत्साह) के प्रधान (=प्ररूढ़) होने पर क्रोध, रौद्र
(=क्रोध) के प्रधान होने पर उत्साह और शृंगार (=रति) के प्रधान होने पर
हास व्यभिचारी भाव हैं । क्रोधादि के बिना वीर आदि रसों के परिपुष्ट न होने से
ये व्यभिचारि-स्थानीय क्रोधादिभाव उनमें नान्तरीयक (=अवश्यम्भावी) हैं । जब
मुख्य भाव के परिपोषण के लिए गौण भाव भी बहुविभावादिजन्य, अर्थात् प्ररूढ़
रूप में कवि द्वारा निबद्ध किये जाते तो भी ये भाव गौण होने से रसस्थानीन न
होकर रस (प्रधान भाव = स्थायी भाव) के अलङ्कार मात्र होते ॥