रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् १२५
ज्ञानदशायां तु रतिपोषितस्य वैक्लव्यस्येति करुण एव। यदा तु
सत्यपि मृतत्वज्ञाने देवताप्रसादादिना पुनरुज्जीवनज्ञानं कथञ्चित्स्यात्, तदा-
लम्बनस्यात्यन्तिकनिरासाभावाच्चिरप्रवास इव विप्रलम्भ एव, न स
करुणः। यथा चन्द्रापीडं प्रति महाश्वेतावाक्येषु। केचित्तु रसान्तरमेवात्र
करुणविप्रलम्भाख्यमिच्छन्ति।
नित्यानित्यवस्तुविचारजन्मा विषयविरागाख्यो निर्वेदः॥
केचित् = दर्पणकारादयः। इच्छन्तीति। एतेनात्रारुचिः सूचिता। तद्बीजन्तु
वैक्लव्यस्य चिरमवस्थानाभावेन तस्य स्थायित्वानुपपत्तिरेव। अभिनिवेशस्य
चिरमवस्थानेऽभ्युपगते तु शृङ्गारोच्छेदापत्तिर्दोषः।
शान्तस्थायिभावं लक्षयति—नित्येत्यादिना। नित्यं च अनित्यं चेति नित्या-
नित्ये, तयोर्वसतीति नित्यानित्यवस्तु। यद्वा तयोर्वसत इति नित्याऽनित्यवस्तूनी।
तयोर्विचारेण विवेकेन जन्म यस्येति विग्रहः। अनित्यस्य वस्तुत्वाभावेन नित्या-
नित्ययोर्द्वन्द्वे कृते वस्तुशब्देन कर्मधारयोऽयुक्तः। नित्य आत्मा तदन्यत्सर्वमनित्यम्।
तथा च परस्परविरुद्धयोर्नित्यानित्यधर्मयोर्विवेकेन जायमानो विषयविरागो निर्वेद
इति फलति। इदमेव तत्त्वज्ञानजन्यं वैराग्यमित्युच्यते। एतेनेर्ष्यादिजनितवैराग्यस्य
स्थायित्वाभावः सूचितः। अत एव—
का स्थायित्व स्पष्ट है। रति तो उस विकलता का परिपोषक मात्र होती।
अत एव यहाँ करुण रस हीं उचित है, विप्रलम्भ शृङ्गार नहीं। अत एव
यदि नायक-नायिका में से एक के मरण का ज्ञान होने पर भी देवताप्रसाद
आदि से उसके पुनरुज्जीवन का ज्ञान हो तो वहाँ आदि-अन्त में रति के
वर्त्तमान रहने से मध्य में मरण के कारण कुछ समय के लिए विकलता होने पर भी
स्थायित्व रति का ही होता। अतः ऐसी दशा में रति के वियोगकालावच्छिन्न
होने से विप्रलम्भ शृङ्गार रस हीं होता, करुण रस नहीं। कादम्बरी का महाश्वेता-
विषयक वर्णन इसका उदाहरण है। यहाँ चन्द्रापीडनिष्ठ महाश्वेताविषयक रति
होने से विप्रलम्भशृङ्गार रस है, करुण नहीं। साहित्यदर्पणकार आदि कुछ
आचार्य तो ऐसे स्थलों में करुण-विप्रलम्भ रस मानना चाहते। किन्तु इसमें आदि
अन्त में विकलता के न होने से उनका मत उचित नहीं प्रतीत होता॥
शान्तरस का स्थायिभाव निर्वेद है जिसे विषयवैराग्य भी कहते। यह वैराग्य
( निर्वेद ) नित्य और अनित्य पदार्थों में वर्तमान धर्मों तथा उन धर्मियों के विवेक
से उत्पन्न होता॥