रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् ११३
त्रिषयीकृतिः' इति द्वितीये । 'विभावानुभावव्यभिचारिणां संयोगाद्भाव-
नाविशेषरूपाद्दोषाद्रसस्यानिर्वचनीयदुष्यन्तरत्याद्यात्मनो निष्पत्तिरुत्पत्तिः'
इति तृतीये । विभावादीनां संयोगाज्ज्ञानाद्रसस्य ज्ञानविशेषात्मनो निष्पत्ति-
रुत्पत्तिः' इति चतुर्थे । 'विभावादीनां सम्बन्धाद्रसस्य रत्यादेर्निष्पत्ति-
रारोपः' इति पञ्चमे । 'विभावादिभिः कृत्रिमैरप्यकृत्रिमतया गृहीतैः
संयोगादनुमानाद्रसस्य रत्यादेर्निष्पत्तिरनुमितिः, नटादौ पक्ष इति शेषः' इति
षष्ठे । 'विभावादीनां त्रयाणां संयोगात्समुदायाद्रसनिष्पत्तौ रसपदव्यवहारः'
इति सप्तमे । 'विभावादिषु सम्यग्योगाच्चमत्कारात्' इत्यष्टमे । तदेवं
विवृतं उपपादितश्चेति नेह पुनः प्रयतते तत्र । नटादौ पक्ष इति । एतच्च वस्तु-
गत्या, न शब्दतः, अनुमितौ हि तस्य दुष्यन्तत्वेनोपस्थित्या नटशब्देनानुपात्तत्वात् ।
तदेवमिति । मिलितानामेव विभावानुभावव्यभिचारिणां रसोपकारित्वे रसत्वे वा
सूत्रेण समर्थिते सतीत्यर्थः । त्रिषु मतेषु = प्रत्येकं विभावादीनां रसत्वसमर्थकेषु
की (सम्यक् =) साधारण रूप में (योग =) भावकत्व-व्यापार द्वारा भावना, उससे
रस, अर्थात् भोजकत्व व्यापार द्वारा चित्त में हुए सत्त्वगुण के प्रकर्ष से प्रकाशित
और रत्यादि से उपहित आत्मस्वरूपानन्द१, की भोगस्वरूप साक्षात्कार द्वारा निष्पत्ति
(स्थाय्युपहित आनन्द को विषय बनाया जाना ) होती है । तृतीय मत में विभाव,
अनुभाव और व्यभिचारिभावों के संयोग (= भावनाविशेषस्वरूप दोष) से रस,
अर्थात् अनिर्वचनीय रत्यादि, की सामाजिक में निष्पत्ति, अर्थात् उत्पत्ति हीं सूत्रार्थ
है । विभाव आदि के संयोग-ज्ञान से ज्ञानविशेषस्वरूप रस की निष्पत्ति
(उत्पत्ति ) होती है—यह चतुर्थमतानुसारी सूत्रार्थ है । पञ्चम मत में विभावादि
के संयोग ( = सम्बन्ध ) से सामाजिक में रत्यादि स्वरूप रस की निष्पत्ति—
आरोप ही सूत्र का तात्पर्य है । षष्ठमतानुसारिणी व्याख्या यह है कि कृत्रिम होने
पर भी नटादि की अभिनयचातुरी से अकृत्रिम रूप में समझे जाने वाले विभाव
आदि के साथ रत्यादि का संयोग = अनुमान = व्याप्ति सम्बन्ध होने से व्याप्य
विभावादि के द्वारा नट में सामाजिक को व्यापकीभूत रत्यादिस्वरूप रस की
निष्पत्ति, अर्थात् अनुमिति, होती है। सप्तम मत के अनुसार भरत के रससूत्र का यह
अर्थ है—विभाव, अनुभाव और व्यभिचारिभाव के संयोग = समुदाय के कारण
हीं रसनिष्पत्ति, अर्थात् समुदित रूप में इनके लिए रस-पद का प्रयोग होता ।
१. यद्यपि भट्टनायक के मत में चित्तसत्त्वगत आनन्द की हीं प्रतीति माननी
चाहिए तथापि वास्तविक आनन्द के आत्मस्वरूपभूत होने से आत्मानन्द
कहा है पण्डितराजने ।