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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 149

प्रथमाननम् ११७
शान्तस्य शमसाध्यत्वान्नटे च तदसंभवात् ।
अष्टावेव रसा नाट्ये न शान्तस्तत्र युज्यते ॥
इत्याहुः । तच्चापरे न क्षमन्ते । तथा हि—नटे शमाभावादिति हेतुर-
संगतः, नटे रसाभिव्यक्तेरस्वीकारात् । सामाजिकानां शमवत्त्वेन तत्र
रसोद्बोधे बाधकाभावात् । न च नटस्य शमाभावात्तदभिनयप्रकाशकत्वा-
नुपपत्तिरिति वाच्यम्, तस्य भयक्रोधादेरप्यभावेन तदभिनयप्रकाशक-
ताया अप्यसंगत्यापत्तेः । यदि च नटस्य क्रोधादेरभावेन वास्तवतत्का-
र्याणां वधबन्धादीनामुत्पत्त्यसंभवेऽपि कृत्रिमत्तत्कार्याणां शिक्षाभ्यासादित
शान्तापलापिनां मतमुपन्यस्यति—केचित्त्वित्यादिना । शमसाध्यत्वादित्यस्य
शमस्थायिकत्वादित्यर्थः । तदसम्भवादिति । नटस्य शमवत्त्वे हि तस्य नटत्वानुप-
पत्तिरित्याशयः । एतन्मतं निरस्यन्नाह—तच्चेत्यादि । असङ्गतः = असिद्धः, अपक्ष-
धर्मत्वादित्यर्थः । यत्र सामाजिके शान्तरसोद्बोध इष्टस्तत्र शमाभावस्य पराभिमतस्य
हेतोरसत्त्वेन शान्तरसोद्बोधाभावसाध्यसामानाधिकरण्यरूपव्याप्तिमत्त्वेऽपि पक्षा-
वृत्तित्वेन स्वरूपासिद्धोऽयं शमाभावात्मको हेतुः । यत्र तु स वर्त्तमानस्तत्र नटादौ
कुछ लोग मानते हैं—
"शान्त रस का स्थायी भाव है शम जो नट में हो नहीं सकता । अतः नाट्य
में आठ हीं रस होते, शान्त रस तो कहीं हो नहीं सकता ॥"
परन्तु इससे सब आचार्य सहमत नहीं है । इसका कारण यह है—नाट्य में
शान्त रस के न होने का जो हेतु 'नट में शम का अभाव' बताया गया है वह
असंगत है । वह संगत तब होता जब जिन सामाजिकों को रसानुभूति होती
उनमें शम न होता । परन्तु सामाजिकों में तो शम हो हीं सकता है। ऐसी स्थिति
में उनमें शमाभाव तो है नहीं । हाँ, नट में शमाभाव अवश्य है, किन्तु उसे तो
रसानुभूति नट के रूप में होती हीं नहीं । तो फिर नट में शमाभाव से नाट्य में
शान्तरस के अभ्युपगम में कौन सी बाधा आती ? नट में शम न होने से वह शान्त-
रसानुकूल अभिनय हीं नहीं कर सकता — यह कहना भी अयुक्त है, क्योंकि तब तो
उसमें अभिनय-काल में वास्तविक भय एवं शोक आदि के भी न रहने से वह
भयानक, करुण आदि रसों के अभिव्यञ्जक अभिनय भी न कर पाता । अतः अन्य
रसों के अनुकूल अभिनय के प्रसंग में यह मानना हीं होगा कि नट में वास्तविक
भय आदि तथा उनके कार्य आदि का अभाव होने पर भी अभिनय करने की
शिक्षा तथा अभिनय के अभ्यास आदि के प्रभाव से वह भय आदि के कार्यों का
अभिनय कर लेता है । ऐसी स्थिति में शम के अभाव में भी शम के कार्यों का