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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 414 में से

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पृष्ठ 148

इत्युक्तेर्नवैधा। मुनिवचनं चात्र मानम्।
केचित्तु —


तन्निरासायाह—मुनिवचनमित्यादि। नाट्यशास्त्रस्य षष्ठाध्यायस्यान्ते भरतमुनि-
प्रोक्तं वचनमित्यर्थः। यद्यपि बहुष्वादर्शपुस्तकेषु शान्तरसप्रकरणं न लभ्यते तथापि
अभिनवगुप्ताचार्यैः स्पष्टमङ्गीकृतत्वाच्चिरन्तनपुस्तकानुरोधेनेति पण्डितराजेनापि
स्वीकृतमेतद्युक्तमेव। यत्तु पूर्वं भरतेनोक्तम्—
शृङ्गारहास्यकरुणा रौद्रवीरभयानकाः।
बीभत्साद्भुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्ये रसाः स्मृताः॥
(ना० शा० ६।१५)
इति तत् पूर्वाचार्यानुरोधेनेति स्पष्टमेव—
“एते ह्यष्टौ रसाः प्रोक्ता द्रुहिणेन महात्मना” इति तदुक्त्या ज्ञायते। स्वयन्तु
भरतर्षिणा शान्तस्यापि रसत्वं स्वीकृतमेव।
यद्वा अष्टाविति पाठः शान्तापलापिनामिति स्पष्टमेवाभिनवगुप्ताचार्यैरुक्तम्।
ततश्च शान्तपक्षपातिनां मते प्रोक्तवचनोत्तरार्धम्—‘बीभत्साद्भुतशान्ताश्च नाट्ये
नव रसाः स्मृताः’ इत्येव पठनीयम्। इदमेवात्राभिप्रेतं मुनिवचनं गङ्गाधरकृत
इति सम्प्रदायः। वस्तुतश्चैतदुपलक्षणमेतदद्ध्यायान्तेऽभिनवगुप्तादिपठितस्य सकलस्य
शान्तविषयकनाट्यशास्त्रीयसन्दर्भस्य।


इन रसों के समर्थन में भरतमुनि का वचन भी प्रमाण है—
शृङ्गारहास्यकरुणा रौद्रवीरभयानकाः।
बीभत्साद्भुतशान्ताश्च नाट्ये नव रसाः स्मृताः॥
यद्यपि उक्त कारिका का पाठान्तर भी प्रचलित है जिसमें उत्तरार्ध का
स्वरूप—
बीभत्साद्भुतशान्ताश्चेत्यष्टौ नाट्ये रसाः स्मृताः॥
इस प्रकार उपलब्ध होता तथापि यह पाठान्तर शान्तरस का अपलाप करने
वालों द्वारा गढ़ा गया है—ऐसा आचार्य अभिनवगुप्त ने इस पद्य की टीका में
कहा है¹।


१. सम्पूर्ण सन्दर्भ को पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता कि अभिनवगुप्त भी शान्तरस के
विषय में दृढ़ विचार नहीं रखते। विशेष विवेचन विद्वानों को स्वयं
करना चाहिए।