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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 414 में से

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पृष्ठ 156

१२४ रसगङ्गाधरः
स्त्रीपुंसयोरन्योन्यालम्बनः प्रेमाख्यश्चित्तवृत्तिविशेषो रतिः स्थायि-
भावः ॥
गुरुदेवतापुत्राद्यालम्बनस्तु व्यभिचारी ।
पुत्रादिवियोगमरणादिजन्मा वैक्लव्याख्यश्चित्तवृत्तिविशेषः शोकः ॥
स्त्रीपुंसयोस्तु वियोगे जीवितत्वज्ञानदशायां वैक्लव्यपोषिताया रतेरेव
प्राधान्याच्छृङ्गारो विप्रलम्भाख्यो रसः । वैक्लव्यं तु संचारिमात्रम् । मृतत्व
सम्प्रति स्थायिभावान् विशेषतो लक्षयितुकाम आदौ स्वभावतोऽनुरञ्जकस्य
शृङ्गारस्य स्थायिभावं रतिं लक्षयति—स्त्रीपुंसयोरिति । पुत्रादीति । आदिशब्देन
मुनिनृपादिपरिग्रहः । व्यभिचारीति । तदुक्तं प्रदीपकृता—
रत्यादिश्चेन्निरङ्गः स्याद् देवादिविषयोऽथवा ।
अन्याङ्गभावभाग्वा स्यान्न तदा स्थायिशब्दभाक् ॥ इति ।
पुत्रादीति । आदिशब्द इष्टमात्रोपसंग्राहकः । द्वितीय आदिशब्द इष्टाश्रिता-
निष्टमात्रोपलक्षकः । सञ्चारिमात्रमिति । वैक्लव्यस्य चिरमवस्थानाभावादिति
हेतुरत्र । वैक्लव्यस्येत्यत्र प्राधान्यादित्यनुषज्यते । विप्रलम्भः = विप्रलम्भशृङ्गारः ।
रति-नामक स्थायिभाव वह है जिसे प्रेम कहते हैं । यह एक प्रकार की चित्त-
वृत्ति है जिसके आलम्बन परस्पर नायक और नायिका होते हैं ॥
किन्तु इसी रति का आलम्बन यदि गुरु, देवता या पुत्र आदि इष्टजनों में से
कोई होता तो वह स्थायिभाव न होकर (करुण आदि रसों में) व्यभिचारिभाव
हो जाती ।
शोक-नामक स्थायिभाव वह है जिसे विकलता (= वैक्लव्य) कहते हैं । यह भी
एक प्रकार की चित्तवृत्ति है और इसकी उत्पत्ति पुत्र आदि इष्टजन के वियोग
अथवा मरण आदि से होती ॥
यदि नायक-नायिका का वियोग हो किन्तु एक दूसरे के जीवित होने का
ज्ञान हो तो वहाँ विप्रलम्भ शृंगार हीं होता, क्योंकि वहाँ परस्पर वियोग से
विकलता होने पर भी प्रधानता रति की हीं रहती । विकलता तो उस रति
का परिपोषण मात्र करती । अतः इसमें होने वाली विकलता व्यभिचारिभाव है,
स्थायिभाव नहीं । हाँ, यदि एक को दूसरे के मर जाने का ज्ञान हो तब तो विकलता
के हीं प्रधान होने से वहाँ करुण रस हीं होगा । रति उस विकलता का केवल
परिपोषक होगी । तात्पर्य यह है कि जिस व्यक्ति से जितना हीं प्रेम होता उसके
विनाश से उतना ही अधिक क्लेश भी होता । अतः प्रियतम या प्रियतमा के मरण
से सर्वाधिक मात्रा में क्लेश (= विकलता) होना स्वाभाविक है । यतः मरण के
ज्ञान के बाद मिलन की कोई आशा नहीं रह जाती अतः ऐसी दशा में विकलता