रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११८ रसगङ्गाधरः
उत्पत्तौ नास्ति बाधकमिति निरीक्ष्यते, तदा प्रकृतेऽपि तुल्यम् ।
अथ नाट्ये गीतवाद्यादीनां विरोधिनां सत्त्वात्सामाजिकेष्वपि विषयव-
मुख्यात्मनः शान्तस्य कथमुद्रेक इति चेत् ? नाट्ये शान्तरसमभ्युपगच्छद्भिः
फलबलात्तद्गीतवाद्यादेस्तस्मिन्विरोधिताया अकल्पनात् । विषयचिन्ता-
सामान्यस्य तत्र विरोधित्वस्वीकारे तदीयालम्बनस्य संसारानित्यत्वस्य
तदुद्दीपनस्य पुराणश्रवण-सत्सङ्ग-पुण्यवन-तीर्थावलोकनादेरपि विषयत्वेन
विरोधित्वापत्तेः । अत एव च चरमाध्याये संगीतरत्नाकरे--
अष्टावेव रसा नाट्येष्विति केचिदचूचुदन् ।
तदचारु, यतः कंचित्न रसं स्वदते नटः ॥
शान्तोद्बोधाभावसाधकत्वमस्त्येवेत्याह--नट इत्यादिना । तत्कार्याणाम् = क्रोधादि-
कार्याणामाङ्गिकाभिनयानाम् ।
सामाजिके शमवत्त्वस्य बाधितत्वमाशङ्कते—अथेत्यादिना । विरोधितायाः=
बाधकतायाः । विषयत्वेनेति । विषयत्वस्य केवलान्वयित्वादिति भावः । शेषो
ग्रन्थो निगदव्याख्यातः ॥
प्रदर्शन उसके द्वारा हो ही सकता है जिससे शान्त रस की सामाजिकों मे अभिव्यक्ति
हो जाती है ।
अब प्रश्न यह उठता है कि (शान्त रस के) विरोधी गीत-वाद्य आदि के
अभिनय-काल में आवश्यक होने से सामाजिकों मे विषयवैराग्यात्मक शान्तरस
का उद्बोध कैसे होगा । इसका यही उत्तर है कि कि जो नाट्य में शान्तरस मानते
उनके मत में विशेष प्रकार के गीत-वाद्य आदि शान्त रस के उद्बोध में प्रतिबन्धक
नहीं है, क्योंकि जब गीत-वाद्य आदि के रहने पर भी सामाजिकों मे नाट्यावलोकन
से शान्तरसोद्बोधरूप फल प्रामाणिक है तो फिर गीत-वाद्य आदि उसके प्रतिबन्धक
कैसे हो सकते ? यदि विषयमात्र (= सभी विषयों) के चिन्तन को शान्तरसोद्बोध
का विरोधी मान कर विषयान्तर्गत गीत-वाद्य आदि को भी उसका विरोधी कहा
जाय तब गीत-वाद्य आदि को हीं क्यों, शान्तरस के (= शम के) आलम्बन
विभाव-संसाराऽनित्यत्व और उद्दीपनविभाव-पुराणश्रवण, सत्संग, पुण्यवन और
तीर्थादि के दर्शन-भ्रमण आदि को भी वे विरोधी क्यों नहीं कहते, कारण, ये सब
भी तो विषय हीं है । अतः शान्तरस के विरोध में दी गई युक्ति असंगत है । इसी
लिए सङ्गीतरत्नाकर के अन्तिम अध्याय में नाट्य में भी शान्तरस की स्थापना
करते हुए कहा गया है-
"कुछ लोग ऐसा कहते कि नाट्य में आठ ही रस होते । किन्तु यह अशो-