रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ रसगङ्गाधरः
चिरमिति व्यभिचारिवारणाय । अनुबन्धिभिर्विभावाद्यैः ।
तथा—
सजातीयविजातीयैरतिरस्कृतमूर्त्तिमान् ।
यावद्रसं वर्तमानः स्थायिभाव उदाहृतः ।। इति ।
केचित्तु रत्याद्यन्यतमत्वं स्थायित्वमाहुः । तन्न । रत्यादीनामेकस्मिन्प्र-
रूढेऽन्यस्याप्ररूढस्य व्यभिचारित्वोपगमात् । प्ररूढत्वाऽप्ररूढत्वे बह्वल्प-
मृष्टभोजनादौ स्वभावविरुद्धस्याप्यम्लादेरुपकारकत्वं दृष्टम् । स्वभावभेदेऽपि विरो-
धोऽयं तावदेव काव्योपकारी यावदङ्गिभावापेक्षयाऽङ्गभावो न प्ररूढतर इत्यादि
ध्वन्यालोकादिग्रन्थेभ्योऽवसेयम् । स्वयं च ग्रन्थकृद् व्याख्यास्यत्यग्रे । ईदृशमेव
विजातीयत्वमभिमतमग्रिमपद्येऽपि । मूर्त्तिः = स्वरूपम्, तच्च वासनात्मकम् । यद्वा
मूर्त्तिरभिव्यक्तिः, तत्राभिव्यक्तिः स्मृतिः । सा चोत्तरोत्तरा, स्वपूर्वस्मृतेविरुद्धभावेन
तिरस्कारात् । अत एव मुहुर्मुहुरभिव्यक्तिरुक्ता ।
बह्वल्पेति । निबद्धाक्षिसान्यतरसकलविभावजत्वं प्ररूढत्वं तद्भिन्नत्वं
चाऽप्ररूढत्वं रत्यादेरित्यर्थः । विभावपदस्य चात्रानुभावाद्युपलक्षणत्वम् । जन्यत्वं
होकर उद्बोधक की उपस्थिति में बारम्बार अभिव्यक्त होते, अनुबन्धियों
( = विभाव आदि ) से सम्बद्ध होते, अर्थात् उन्हें अपने अनुकूल बना लेते, और
अन्ततः रसरूपता को प्राप्त होते वे प्रसिद्ध रत्यादि भाव हीं नाट्यदि में 'स्थायी'
नाम से प्रसिद्ध हैं।।"
द्वितीय पद्य में 'चिर काल तक' यह अंश व्यभिचारी भावों में स्थायी भाव
के लक्षण की अतिव्याप्ति के निराकरणार्थ दिया गया है। यहाँ 'अनुबन्धी' शब्द का
अर्थ विभाव-अनुभाव-सञ्चारिभाव है। और भी,
"स्थायी भाव उसी को कहा गया है जिसकी मूर्त्ति ( = उत्तरोत्तर अभिव्यक्ति)
पूर्वपूर्व सजातीय अथवा विजातीय भावों (व्यभिचारिभावों) द्वारा अवरुद्ध नहीं होती
और जो तब तक वासनारूप में चित्त में वर्त्तमान रहता जब तक वह रसरूपता
को प्राप्त न हो जाता।।"
कुछ आचार्य रति आदि में से अन्यतम को हीं 'स्थायी' मानते । किन्तु यह
लक्षण उचित नहीं है । इन नौ भावों में से एक के प्ररूढ़ होने पर अप्ररूढ़ावस्थ अन्य
भाव स्थायी नहीं, अपितु व्यभिचारी माने जाते हैं। जैसे शृंगार के सन्दर्भ में रति
प्ररूढ़ होती पर हास अप्ररूढ़ । इसमें स्थायी भाव केवल रति है, हास नहीं। वह तो
शृंगार के व्यभिचारी भावों में से एक है। किन्तु ऐसे हासादि व्यभिचारी भाव भी तो
नौ भावों में अन्यतम है हीं। अतः रत्याद्यन्यतमत्वस्वरूप स्थायिभावलक्षण की उक्त-