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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 414 में से

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पृष्ठ 146

११४ रसगङ्गाधरः
पर्यवसितस्त्रिषु मतेषु सूत्रविरोधः । विभावानुभावव्यभिचारिणामेकस्य तु
रसान्तरसाधारणतया नियतरसव्यञ्जकतानुपपत्तेः सूत्रे मिलितानामु
पादानम् ।
एवं च प्रामाणिके मिलितानां व्यञ्जकत्वे यत्र क्वचिदेकस्मादेवा-
साधारणाद्रसोद्बोधस्तत्रेतरद्वयमाक्षेप्यम् । अतो नानैकान्तिकत्वम् । इत्थं
अन्येषु त्रिषु पक्षेषु 'भाव्यमानो विभाव एव रसः' इत्यादिषु । रसान्तरसाधारण-
तयेति । अत्र काव्यप्रकाश उक्तम्- 'व्याघ्रादयो विभावा भयानकस्येव रौद्राद्भुत-
वीराणाम् । अश्रुपातादयोऽनुभावाः शृङ्गारस्येव करुणभयानकयोः । चिन्तादयो
व्यभिचारिणः शृङ्गारस्येव करुणवीरभयानकानाम्' इति ।
उपसंहरति- एवं चेत्यादिना । प्रामाणिके = सूत्रसमर्थिते । व्यञ्जकत्व इति
स्वमतानुरोधेन । एकस्मादेवेति । असाधारणाद् विभावात्, तथाविधादनुभावात्,
अष्टम मत के अनुकूल यह व्याख्या है—विभाव आदि में संयोग, अर्थात् चमत्कार
के कारण किसी एक, चाहे वह चमत्कारी विभाव हो या वैसा अनुभाव या वैसा
व्यभिचारिभाव, को रस कहा जाता है। नवम, दशम और एकादश मतों में तो
क्रमशः केवल विभाव, केवल अनुभाव और केवल व्यभिचारिभाव को रस कहे जाने
से तीनों को समुदित रूप से रसोपयोगी बताने वाले उक्त रससूत्र का विरोध स्पष्ट
ही है। विभावादि तीनों का सम्मिलितरूप में उल्लेख आवश्यक भी है, क्योंकि
कुछ विभावों, कुछ अनुभावों और कुछ व्यभिचारिभावों के अनेक रसों में समान
रूप से उपयुक्त होने के कारण किसी एक विभाव या अनुभाव या व्यभिचारिभाव
से किसी एक रस का अभिव्यञ्जन, इन मतों के अनुसार, मानना सम्भव नहीं ।
उदाहरणार्थ व्याघ्र आदि पदार्थ भयानक, रौद्र तथा वीर इन तीनों ही रसों के
विभाव हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में केवल व्याघ्रादि विभाव को रस मानने पर
उनसे किसी एक रस की अभिव्यक्ति कैसे हो सकेगी ? इसी तरह अश्रुपात आदि
अनुभाव शृङ्गार, वीर, करुण और भयानक रसों के प्रसङ्ग में समानरूप से होते ।
अतः केवल अनुभाव या केवल व्यभिचारिभाव को रस मानने में वही आपत्ति
है जो केवल विभाव को रस मानने में कही गई है । सभी विभावों, या सभी
अनुभावों या सभी व्यभिचारिभावों के रसान्तरसाधारण न होने पर भी उनमें
किसी एक के समुदाय को रस कहना सम्भव नहीं, क्योंकि विभाव-समुदाय आदि के
व्यक्तिभेद से भिन्न-भिन्न होने से समुदाय का स्वरूप ही स्पष्ट करना असम्भव
है । अतः किसी एक को रस कहने वाले सभी पक्ष सूत्रविरुद्ध हैं ।
इस प्रकार विभावादित्रितय के रसव्यञ्जक सिद्ध हो जाने से जब किसी ऐसे
काव्य से सामाजिकों को रसाभिव्यक्ति होती जहाँ तीनों—विभाव, अनुभाव और