रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० रसगङ्गाधरः
(६) 'दुष्यन्तादिगतो रत्यादिर्नटे पक्षे दुष्यन्तत्वेन गृहीते विभावादिभिः
भावात्; यदापि साध्यधर्मविशिष्टधर्मिणोऽनुमेयत्वं तदाऽपि नटमात्रविषयक लौकिक-
प्रत्यक्षसामग्रया रत्यादिविशिष्टनटानुमितिसामग्रीबाधकत्वं न, समानविषयत्वाभावात्;
अलौकिकप्रत्यक्षसामग्री तु तद्विषयविशिष्टविषयक लौकिकानुभवसामग्रयाऽपि
बाध्यत एव, अनुभवबलादिति न लोल्लटाद्यभिमतो रत्यादिः साक्षात्क्रियमाणोऽपि-
त्वनुमीयमान एव रसः, अनुमीयमानस्यापि रत्यादेरलौकिकाह्लादजनकत्वन्तु
विषयस्वभावबलादेवास्थेयमिति मन्यमानानां शङ्कुकादीनां मतं प्रस्तौति —
दुष्यन्तादिगत इत्यादिना । अत्रापि मते रत्यादिरेव रस इति स्पष्टमेव ।
दुष्यन्तत्वेन गृहीत इति । दुष्यन्तत्वग्रहश्च नटे मुख्यतः शब्दादेव । क्वचित्
पूर्ववासनाऽपि निमित्तभावमुपयात्यत्र । पोषितश्चायं दुष्यन्तचेष्टादिसदृशचेष्टादि-
आदि के मत से कुछ भिन्न है। जहां तक रत्यादिस्वरूप रस के मुख्य आश्रयों की
बात है वह तो पूर्ववत् दुष्यन्त आदि हीं है। दुष्यन्त तथा शकुन्तला आदि के
स्वाभाविक क्रियाकलापों के अभिनय में पूर्ण सफल नट-नटी आदि में सादृश्यातिशय
के कारण दुष्यन्तत्व-शकुन्तलात्व आदि का समारोप तथा नट-नटी के चेष्टादि में
दुष्यन्त-शकुन्तला आदि के चेष्टादि का आरोप भी पूर्ववत् इन्हें मान्य है। किन्तु
सहृदयों को जो—'दुष्यन्तोऽयं शकुन्तलाविषयकरतिमान्' इत्याकार बोध होता वह
अलौकिक भ्रमात्मक साक्षात्कार नहीं, अपि तु अनुमित्यात्मक है। इसका
कारण यह है कि अलौकिकसन्निकर्षजन्य प्रत्यक्ष का लौकिक अनुभव की सामग्री
बाधक होती। इसी लिए 'पर्वतो वह्निमान्' इत्यादि स्थलों में व्याप्तिस्मरणरूप
ज्ञान को अलौकिक सन्निकर्ष मानकर नैयायिक वह्नि का अलौकिक प्रत्यक्ष नहीं,
अपि तु अनुमिति हीं मानते। अतः जहाँ 'सुरभि चन्दनम्' आदि में सुरभि अंश का
अलौकिक प्रत्यक्ष मान्य है वहाँ अनुमितिसामग्री का फल के आधार पर अभाव
मानना चाहिए। हां, लौकिक-प्रत्यक्ष की सामग्री अन्य परोक्षज्ञान की सामग्री से
प्रबल अवश्य है। इसी लिए कहीं यदि किसी विषय के प्रत्यक्ष और अनुमित्यादि
की भी सामग्रियां समानकाल में उपस्थित होतीं तो वहाँ उस विषय का प्रत्यक्षज्ञान
हीं होता, अनुमित्यादिस्वरूप परोक्षज्ञान नहीं। अत एव न्यायदर्शन के प्रत्यक्ष सूत्र
की तात्पर्यटीका में वाचस्पति मिश्र ने अपने आचार्य की उक्ति उद्धृत की है—
शब्दजत्वेन शब्दं चेत् प्रत्यक्षं चाक्षुषत्वतः ।
स्पष्टग्रहणसम्बन्धाद् युक्तमैन्द्रियकं हि तत् ॥
किन्तु यह बाध्यबाधकभाव विरोध होने पर हीं होता है, अन्यथा नहीं। विरोध
समानविषयता होने पर हीं सम्भव है, इसके बिना नहीं। अतः 'पर्वतो वह्निमान्'