रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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प्रथमाननम् १२१
रूपाणामेषामार्युविनाशित्वेन स्थिरत्वं दुर्लभम वासना रूपतया स्थिरत्वं तु
व्यभिचारिष्वतिप्रसक्तमिति वाच्यम, वासना रूपाणाममीषां मुहुर्मुहुरभि
व्यक्तेरेव स्थिरपदार्थत्वात्। व्यभिचारिणां तु नैव, तदभिव्यक्तेर्विद्युदु-
द्योतप्रायतवात्।
यदाहुः -
विरुद्धैरविरुद्धैर्वा भावैर्विच्छिद्यते न यः ।
आत्मभावं नयत्याशु स स्थायी लवणाकरः ॥
चिरं चित्तेऽवतिष्ठन्ते संबध्यन्तेऽनुबन्धिभिः ।
रसत्वं ये प्रपद्यन्ते प्रसिद्धाः स्थायिनोऽत्र ते ॥
स्मृतेः। एवंरूपमेव दृढतरत्वं संस्कारस्य नैयायिकादयोऽप्यङ्गीकुर्वन्ति । विच्छिद्यते =
विनाश्यते । आत्मभावम् = स्वरूपताम्, स च स्वाङ्गत्वसम्पादनद्वारेति बोध्यम् ।
लवणाकर इत्युपमानम् । यथा लवणाकरः स्वसंसृष्टानि प्रवाहान्तरजलानि स्वरूपतं
लवणरूपतां प्रापयति तद्वदयं स्थाय्यपि स्वसंसृष्टान् विरुद्धानविरुद्धवांश्चान्यान् स्वरूपतां
प्रापयति । एतच्च प्रकर्षकृतमेव रत्यादौ । अयं च सन्दर्भः समूहालम्बनात्मक रसपक्षे
सुकरविवरणः । विरुद्धत्वं च भावानां स्वभावभेदान्न त्वनुपकारकत्वात् । अत एव
स्थिर रहते । अब प्रश्न यह है कि ये रत्यादि चित्तवृत्तिविशेषस्वरूप हैं; अतः ये
स्वरूपतः तो स्थिर हो हीं नहीं सकते, क्योंकि योग्य वित्तवृत्तियां अपनी उत्पत्ति के
तृतीय क्षण में विनष्ट हो जातीं अथवा तभी तक स्थिर रहतीं जब तक अन्य वृत्ति
का चित्त में उदय नहीं हो जाता; हां वासना (= संस्कार ) रूप में ये रह सकतीं
हैं, किन्तु संस्कार रूप में तो केवल रत्याद्यात्मक चित्तवृत्तियां ही नहीं अपि तु
व्यभिचारिस्वरूप चित्तवृत्तियां भी स्थिर रहतीं हीं हैं । ऐसी दशा में यदि वासना-
रूप में स्थिर रहने के कारण रत्यादिभावों को स्थायी कहा जाय तब तो व्यभि-
चारिभावों को भी स्थायी क्यों न कहा जाय । इस प्रश्न का उत्तर यही है कि
वासनात्मक रत्यादि की पुनः पुनः अभिव्यक्ति (= उद्बोधक का समवधान होने से,
स्मरण होना) हीं उनकी स्थिरता है। ऐसी स्थिरता वासनात्मक व्यभिचारिभावों
की नहीं, क्योंकि उनकी अभिव्यक्ति तो बिजली की चमक की तरह कभी-कभी एक
दो बार हीं होती है, वारम्वार नहीं । जैसा प्राचीन आचार्यों ने कहा है—
"जो भाव अपने प्रतिकूल और अनुकूल भावों द्वारा कभी विनष्ट न
होने से बारम्बार अभिव्यक्त होता और स्वसंसृष्ट अन्य जलों को स्वाङ्ग बनाकर
स्वाभिन्न-सा बनाने वाले क्षारसमुद्र के समान अन्य भावों को स्वाभिन्न-सा बना
देता वही स्थायी है ।। जो भाव चिर काल तक चित्त में वासना रूप में विद्यमान