रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
४२० रंगनाथ-रामायण
नामक मुनि यहाँ आये और बड़ी आसक्ति से मुझे देखते हुए मन-ही-मन महान्-आनन्द-
का अनुभव करने लगे । फिर भोग की लालसा से प्रेरित तथा काम-पीडा से अभिभूत हो,
इसका भी विचार किये बिना कि कहाँ मेरे जैसा तपोधन तथा पुण्यात्मा मुनि और कहाँ
यह सुन्दरी, मुझ पर अनुरक्त हो गये और निर्लज्ज हो, लोलुप-दृष्टि से मुझे देखने-लगे ।
यह देखकर मैंने उनसे कहा—'हे मुनीन्द्र, कहाँ आप, कहाँ मैं और कहाँ आपकी यह लोलुप
दृष्टि ? आप तपस्वी तथा पुण्यात्मा हैं, आपका यह कार्य आपके तप में विघ्न-डालनेवाला है।'
तब मुनि कामातुर हो, तपस्या का पवित्र संकल्प त्याग कर कहने लगे—'हे सुन्दरी,
यही मेरी तपस्या और पुण्य का फल है, यही मेरे लिए स्वर्ग का सोपान-है,
यही मेरे लिए मोक्ष का साधन है !' तब मैंने उनसे कहा—'हे मुनि, मैं अभी रजस्वला हूँ,
अतः आपको मेरा स्पर्श नहीं करना चाहिए । इन दिनों मैं आपके ही घर में रहूँगी ।
स्नान तथा शुद्धि के पश्चात् आप मुझे प्राप्त कर सकते हैं।' इस प्रकार, मुनि को समझा-
कर मैं उस मुनि के साथ गंधमादन को गई और मुनि के घर में ही निष्ठा से रहने-
लगी । उस दिन रात को रावण सभी दिशाओं पर विजय प्राप्त करके अपनी सेना के
साथ उस पर्वत पर ठहरा । जब मैं पर्वत-शिखर पर गाने लगी, तब मेरा गाना सुनकर
रावण मेरे पास आया और अपना प्रताप, अपना सौन्दर्य, अपनी महत्ता तथा अपना नाम
बताकर मुझे प्रलोभन देने लगा कि 'हे सुन्दरी, तुम अपने रूप-यौवन तथा विलास के साथ
मेरा आलिंगन करो।' मैंने कहा—'मैं विवश हूँ, अतः तुमको मेरा स्पर्श नहीं करना चाहिए।'
तब उस राक्षस ने कहा—'हे सुन्दरी, मेरे लिए रजस्वला स्त्रियाँ तथा परस्त्रियाँ अधिक-
प्रिय हैं, अतः तुम मुझे मत ठुकराओ ।' इस प्रकार मुझे अपने प्रिय वचनों से प्रसन्न करके
उसने मेरे साथ रति-क्रीड़ा की । इससे अतिकाय का जन्म हुआ । मैंने उस पुत्र को दानवेन्द्र-
को सौंप दिया । तीन दिन के पश्चात् शुद्धि-स्नान आदि से निवृत्त होकर मैं मुनीश्वर-
के समक्ष जाकर खडी हो गई । तब उस मुनि ने मुझे देखकर कहा—'मेरे घर में रहती हुई,
तुम मुझे धोखा देकर किसके साथ प्रीति से रति क्रीडा में प्रवृत्त हुई थी ? हे तन्वी,
तुम्हारे यौवन का उपभोग किसने किया ? तुमने-बिना सोचे-समझे ऐसा क्यों किया ?
यदि विवेक के साथ विचार किया जाय, तो तुम्हारी यह करतूत स्त्री-सुलभ ही प्रतीत
होती है । परहित कहाँ और युवतियाँ कहाँ ? शीलाचरण कहाँ और सुंदरियाँ कहाँ ?
कमललोचनियां कहाँ और सत्य कहाँ ? कामिनियाँ कहाँ और करुणा कहाँ ? (काश,—
दोनों बातें एक साथ ही देखी जाती ?) इस प्रकार कहते हुए उस मुनि ने अत्यधिक क्रोध
से निर्दय हो मुझे घोर शाप दिया—'तुम अपने विलास को खोकर इस सरोवर में मकरी
बनकर रहो । जिसने तुम्हारे साथ रति-क्रीड़ा की, वह तुम्हारे इस पाप से अपने पुत्र,
मित्र तथा सेना के साथ भस्म हो जायगा ।'
"मुनि का यह घोर शाप सुनकर मैं विचलित हो उठी और उस पुण्यात्मा के समक्ष
हाथ जोड़कर कहने लगी—'हे मुनिश्रेष्ठ, मैं इस शाप-रूपी समुद्र को किस नौका की सहायता
से पार कर सकूँगी ? इस शाप-रूपी दावानल को मैं किस जल से बुझा सकूँगी ?
हे दयालु, मुझ पर दया दिखाइए।' भयाक्रान्त-हो, इस प्रकार आर्तनाद करनेवाली मुझे देखकर
ज्ञान-दृष्टि से अनुमान करके, उस कृपानिधान ने कहा—'हे सुन्दरी कुछ समय के पश्चात्
हनुमान् राम के कार्यार्थ यहाँ आनेवाला है । उसके द्वारा तुम्हारे शाप की मुक्ति होगी ।'
इतना कहकर वह मुनि गंगा नदी के तट पर चले गये । आज मैं शाप-मुक्त हो गई हूँ ।
अतः मैं जा रही हूँ ।" यो कहती हुई वह कमलाक्षी हनुमान् को आशीर्वाद देकर वहाँ से
स्वर्ग चली गई ।
१२७. कालनेमि का वध
हनुमान् वहाँ से सीधे कालनेमि के सामने उपस्थित हुआ । उस समय वह पापी,
अचल समाधि में निमग्न रहनेवाले (मुनि) की भाँति कुम्भक-क्रिया के द्वारा अपने वक्ष स्थल
को फुलाकर मुख को किंचित् झुकाकर, ध्यान-मग्न रहनेवाले की भाँति आँखें बंद किये हुए
जप-माला को फेरते हुए जप करनेवाले की भाँति ओठ हिलाते हुए बैठा था । हनुमान्
के आते ही उसने आँखें खोलकर, हनुमान् से कहा—'सरोवर निकट ही तो है ? तुमने
इतना विलंब क्यो किया ? देखो कितनी रात बीत गई है । यदि तुम मंत्रोपदेश ग्रहण
करने की इच्छा रखते हो, तो क्या गुरु-पूजा की व्यवस्था कुछ करोगे ?'
तब पवनपुत्र ने कहा—'लो, अब तुम्हारे लिए यही गुरु-पूजा है ।' यो कहकर
उसने अपनी कठोर मुष्टि से उस राक्षस के बाहुमध्य में प्रहार किया । तुरन्त उस दैत्य ने
अपना वह रूप छोड़कर एक पक्षी का रूप ले लिया और हनुमान् पर आक्रमण किया । उसके
आक्रमण करते ही हनुमान् ने उसे कसकर पकड़ लिया और उसके दोनो पंखो को तोड़कर
फेंक दिया । तुरन्त उस राक्षस ने वह रूप भी त्याग दिया और अपनी माया से एक गंभीर
सिंह का रूप धारण किया और आकाश की ओर भयकर दृष्टि को दिखाते हुए गर्जन करके
हनुमान् को धमकाने लगा । किन्तु, हनुमान् निर्भीक हो अपनी मुष्टि से उस कालनेमि के
सिर पर ऐसा प्रहार किया कि उसका सिर फट गया । तुरन्त वह राक्षस सिंह का रूप
भी छोड़कर सुग्रीव के रूप में आया और कहने लगा—'हे पवनपुत्र, यहाँ क्या कर रहे हो ?
चलो, लक्ष्मण के प्राण लौट आये हैं । अब तुम्हें द्रोणाचल जाने की आवश्यकता
नहीं है । अब हमें ओषधि नही चाहिए ।' पहले हनुमान् को भ्रम हुआ कि वह सुग्रीव
ही है, किन्तु ध्यानपूर्वक देखने के पश्चात् निश्चय कर लिया कि वह सुग्रीव नहीं है ।
तब अत्यन्त क्रोध से उसके वक्ष पर ऐसा प्रहार किया कि वह राक्षस मूर्च्छित होकर गिर
पड़ा, किन्तु शीघ्र ही वह दानव सँभल गया और शतशृंगी होकर धनुष से पैने शर
चलाकर हनुमान् को कष्ट पहुँचाने लगा । तब हनुमान् ने भी अपनी मुष्टियो तथा चरणो
के आघात से उसकी सारी शक्ति शिथिल कर दी और उसे आकाश से पृथ्वी की ओर
खींच लिया । उसके पश्चात् उसने राक्षस का सिर ऐंठकर उसे धड से अलग करके पृथ्वी
पर ऐसा फेंक दिया, जैसे मत्त गज मृणाल को तोड़कर फेंक देता है । उसके बाद विजय-
गर्व से सिंहनाद करते हुए हनुमान् तुरन्त द्रोणाचल पर पहुँच गया ।
द्रोणाचल पर पहुँचकर हनुमान् अनेक दिव्य लताओं की आभा से तथा निर्मल
मणिसमूह की कांतिवाले दीप-वृक्षो की दीप्ति से भासमान उस पर्वत पर घूम-घूमकर दिव्य
ओषधियो का अन्वेषण करने लगा । वह किसी लता को देखकर 'यही वह सुगन्धि है, यही
४२२ रंगनाथ रामायण
वह लता है,' ऐसा विचार करके उसके पास पहुँचता, तो वह लता छिप जाती । यह देखकर
हनुमान् मन-ही-मन दुखी हो कहने लगा—'हे पर्वतेश्वर, हे पर्वतराज, हे पुण्यात्मा, अनघ
रघुराम की आज्ञा से दिव्य ओषधि ले जाने के निमित्त मै आया हूँ । हे नगराज, जो कार्य
समस्त लोको के हित में है, उसको सपन्न करने के लिए आये हुए मुझे आप क्यो इस
प्रकार धोखा दे रहे हैं ? आप शीघ्र अपने पास रहनेवाली ओषधि-लताओ को प्रकट कीजिए।
मुझे शीघ्र जाना है । हे ओषधि-लताओ, यह कार्य लोक-हितार्थ है । अत, मै आपसे प्रार्थना
करता हूँ कि आप अपनी सुन्दर आकृति दिखाइए ।' इस प्रकार प्रार्थना करने पर भी
वे लताएँ अपने रूप छिपाये रही । तब हनुमान् ने फिर कहा—'हे नगकुलतिलक, मेरे
आगमन को देखकर आपने मेरा उचित सत्कार नहीं किया, यह उचित नही है ।'
कई बार विनम्र प्रार्थना करने पर भी जब उस पर्वत ने दिव्य ओषधि-लताओ
को नहीं दिखाया, तब हनुमान् अत्यन्त क्रुद्ध हुआ और कहने लगा—'हे नगकुलाधम, मेरे
इतनी प्रार्थना करने भी तुम्हारा मन मेरी ओर द्रवीभूत नहीं हुआ । भला, गुणहीन तथा
कठोर पत्थर में दया कैसे उत्पन्न होगी ?'
इतना कहते-कहते हनुमान् की क्रोधाग्नि की ज्वालाएँ उनके रोम-रोम में व्याप्त
हो गई । तुरन्त उसने दस योजन विशाल तथा दस योजन ऊँचा रहनेवाले उस भयंकर पर्वत
को सहज ही उखाड़ लिया, मानो यह बता रहा हो कि मैं राम का सामना करनेवाले रावण-
रूपी पर्वत को भी इसी प्रकार उखाड डालूँगा । उस समय सारी पृथ्वी हिल उठी और
आकाश काँपने लगा ।
इन्द्र के आदेश से उस पर्वत की रक्षा करनेवाले अग्नि-सम तेजस्वी चित्रसेन आदि
तेरह करोड़ गंधर्व अपने बल तथा शौर्य का प्रदर्शन करते हुए हनुमान् से कहने लगे—'यह
देवगण का निवास है । यह मेरु-तुल्य पर्वत है और यह जगत् का जीवन है । इसे
तुम मत ले जाओ । तुम इसे नहीं ले जा सकोगे । इसलिए इसे यही छोड़ जाओ । यदि
नही मानोगे, तो तुम्हारे प्राण नही बचेंगे ।' तब युद्ध में यम की भाँति भयंकर दीखनेवाले
हनुमान् ने क्रुद्ध होकर उनकी ओर देखा और उन्हें अपनी पूँछ-रूपी पाश से बाँधकर,
तेजी से घुमाया और कुछ लोगो को समुद्र में फेंक दिया, कुछ लोगो को मार डाला और
कुछ लोगो को पृथ्वी पर पटककर नष्ट कर दिया । उस महावीर की उद्धत शक्ति देखकर
गधर्वो ने सोचा कि उसको पराजित करना असंभव है । अत, दीन होकर उन्होने हनुमान् के
समक्ष वडी भक्ति के साथ हाथ जोडकर कहा—'हे कपिकुंजर, हे वानरेन्द्र, आप इस पर्वत
को ले जाइए ।' इस प्रकार कहते हुए गंधर्व-वीर आशीर्वाद देकर चले गये, तब पवनपुत्र
उस पर्वत को उठाकर आकाश की ओर उड़ा और अपने भयंकर वेग से भूचर तथा खेचर
को आश्चर्य-चकित करते हुए जाने लगा ।
१२८. भरत का स्वप्न
उसी दिन अर्द्धरात्रि के समय भरत ने स्वप्न में देखा कि राम तथा लक्ष्मण
रण-भूमि में सिर पर तैल लगाये हुए, क्लान्त शरीर तथा बलहीन हो, पक के मध्य में
पडे छटपटाते हुए रुदन कर रहे हैं । यह देखकर भरत चौंककर जाग पड़े और अपने
दुःस्वप्न के कारण व्याकुल होते हुए घर से वाहर निकल आये । वे वार-वार स्वप्न में
देखी हुई राम-लक्ष्मण की दशा की कल्पना करके व्याकुल होते रहे । साथ-ही-साथ, उसी
समय उन्होंने कई और दुःशकुन देखे, तो वे और भी भयभीत हो सोचने लगे, यह कैसा
पाप है ? कैसा अपशकुन है ? न जाने भविष्य में क्या होनेवाला है ? न जाने वन में
राम तथा लक्ष्मण को क्या हो गया है ? न जाने, जानकी की क्या दशा हुई ? चौदह
वर्ष पूरे होने को हैं, किन्तु उनका कोई समाचार नहीं मिल रहा है । सत्यनिष्ठ, उदार,
सदाचारी, कृतार्थ, उन लोगों के लिए मैं अपना सारा पुण्य अर्पण करता हूँ, जिससे
उनपर कोई विपत्ति न आये ।
इस प्रकार सोचकर भरत ने तुरन्त वेदनिष्ठ ब्राह्मणों को बुलाया और वेदविधि से
सब प्रकार के दान-धर्म आदि करके, हवन आदि के द्वारा शान्ति-कर्म कराया ।
उसी समय हनुमान् आकाश-मार्ग से चंचल वाल-सूर्य की भाँति, नदीग्राम के ऊपर
होकर जाते हुए, जटाभार एवं वल्कल धारण किये हुए, राम के समान दिखाई पडनेवाले,
घनश्याम वर्णवाले सूर्यवंशज भरत को देखकर अत्यन्त आश्चर्य-चकित हो सोचने लगे—
'क्या सौमित्र की मृत्यु हो जाने से सीता को भी तजकर रामचन्द्र अकेले यहाँ आ गये हैं?,
क्या मैं इनसे पूछकर जान लूँ ?' फिर, वह कपिकुलोत्तम हनुमान् (भरत से) न पूछने
का निश्चय करके मन-ही-मन सोचने लगा—'रघुराम शरणागतरक्षक, सद्धर्मनिरत तथा
श्रेष्ठ वलशाली हैं । क्या, वे अपने सत्य तथा यश की उपेक्षा करके अपनी धर्मपत्नी तथा
अनुज को त्याग कर सुग्रीव आदि वानर-वीरों को युद्ध-क्षेत्र में ही छोड़ रावण को सजीव
छोड़कर अकेले यहाँ आयेंगे ? ऐसा कभी नहीं हो सकता । एक साधारण मनुष्य की भाँति
सोचकर मैने राम के प्रति अपराध किया है । कदाचित् राम से मिलता-जुलता कोई और
तपस्वी यहाँ रहता होगा ।' इस प्रकार सोचते हुए हनुमान् शीघ्रगति से लका के मार्ग में
जाने लगे ।
उसी समय भरत आकाश-मार्ग से जानेवाले हनुमान् को देखकर सोचने लगे—
'न जाने क्यों यह दुष्ट-ग्रह यहाँ दिखाई पड़ रहा है । इसे अपने भयंकर वाणों से नीचा
गिराना चाहिए ।' ऐसा निश्चय करके शक्तिशाली धनुष-वाण हाथ में लेकर वे वाण चलाने
का उपक्रम करने लगे । उसी समय आकाशवाणी हुई—'हे अनघ, तुम इसके प्रति मित्र-
भाव रखो, यह तुम्हारा हित है, इस पर तुम क्रोध मत करो ।' इस आकाशवाणी को सुन-
कर भरत ने धनुष-वाण नीचे डाल दिया ।
१२९. हनुमान् का माल्यवान् से युद्ध करना
निदान हनुमान् समुद्र के निकट पहुँच गया । इतने में रावण की आज्ञा से माल्यवान् ने
अपने दस करोड़ महाबली तथा पराक्रमी राक्षम-सैनिकों के साथ आकर हनुमान् का
मार्ग रोका । हनुमान् ने द्रोण पर्वत को सावधानी से थामे हुए, उन राक्षसों का सामना
किया । राक्षस-वीर भी वडी भयंकर गति से हनुमान् से भिड गये और परशु, तोमर, चक्र,
शूल, करवाल एवं मुद्गर आदि अस्त्र चलाते हुए हनुमान् को मारने लगे । किन्तु, अनुपम
विक्रमी पवनकुमार ने उनके प्रहारों की परवाह किये बिना, अपनी भयंकर पूँछ में राक्षस-
वीरो को बाँधकर समुद्र में फेंक दिया, उसने कुछ राक्षसो को पद-प्रहार से मार डाला,
कुछ वीरो को अपने भयंकर गर्जन से मार डाला, कुछ राक्षसो का अपनी पूँछ से संहार
किया और अपनी दृष्टि-मात्र से कुछ राक्षसो का वध कर दिया । कुछ राक्षसो को उसने
नीचे गिरा दिया, कुछ राक्षसो को दबा दिया और कुछ को चीर डाला ।
तब माल्यवान् क्रोधोन्मत्त होकर यम के समान भयंकर रूप धारण किये हुए हनुमान्
पर शर-वृष्टि करने लगा । किन्तु, हनुमान् ने उन वाणो को अपनी पूँछ से ही तोड़ डाला
और क्रोध से उसके धनुष को खंड-खंड कर दिया । फिर, उसने अपनी पूँछ से माल्यवान् के
पैरो को बाँधकर ऊपर उठाया और पृथ्वी पर पटक दिया । तब माल्यवान् ने हनुमान् पर
अपना शूल चलाया । उसकी भी उपेक्षा करके खड़े हुए हनुमान् को देखकर उस राक्षस ने
अपनी शक्ति से उसके वक्ष पर भयंकर प्रहार किया । इस आघात से हनुमान् के वक्ष से
रक्त की धारा बहने लगी । हनुमान् थोड़ी देर तक मौन खडा रहा, और फिर अत्यधिक
रोष से उस राक्षस के सिर पर भयंकर पद-प्रहार करके आकाश में जाकर उड़ गया ।
इससे राक्षस का सिर फूट गया और उससे रक्त की धारा बहने लगी । माल्यवान् इस
भयंकर प्रहार से थोड़ी देर तक मूच्छित पडा रहा, किन्तु शीघ्र ही सचेत होकर उसने हनुमान्
पर अपनी गदा फेंकते हुए कहा-'युद्ध में यही गदा तुम्हारा अन्त कर देगी ।' उस गदा
के लगने से भयंकर ज्वालाएँ निकल पडी । यह देखकर माल्यवान् ने कहा-'हे वानर,
इस पर्वत को समुद्र में फेंककर जाओ, तो मैं तुम्हारा वध नहीं करूँगा । पूर्वकाल में समुद्र
के मध्य में गरुड पर आरूढ हो विष्णु स्वयं मुझसे युद्ध करने आया था और मुझे अजेय
जानकर लौट गया था । मेरा प्रताप सारा संसार जानता है, तुम मुझसे युद्ध नही कर सकते ।'
तब हनुमान् ने माल्यवान् को देखकर क्रोध से कहा-'हे वृद्ध राक्षस, मेरे प्रताप से
भीत हुए बिना तुम मुझसे युद्ध करने चले हो ? तुम्हारी शक्ति ही कितनी है ?'
हनुमान् के इन दर्प-पूर्ण वचनो को सुनकर माल्यवान् का क्रोध और भी बढ़ गया । उसने
अपने भयंकर खड्ग चन्द्रहास को निकालकर उद्धत शक्ति से उसे हनुमान् पर चलाया ।
हनुमान् के वज्रसम शरीर पर लगते ही वह चन्द्रहास चूर-चूर हो गया । उस खड्ग के
प्रहार से हनुमान् ने थोडी देर तक पीड़ा का अनुभव किया, किन्तु शीघ्र ही संभलकर
अपनी भयंकर पूँछ को उस राक्षस के कण्ठ में लपेटकर आकाश में बडे वेग से घुमाकर
फिर समुद्र में फेंक दिया । माल्यवान् समुद्र में गिरकर उसी मार्ग से पाताल में पहुँच गया।
हतशेष राक्षस धैर्य खोकर भाग गये । पर्वत जैसी विशाल विजय को तथा पर्वत को लिये हुए
हनुमान् आगे बढा, तो सभी देवता उसकी प्रशंसा करने लगे ।
१३०. लक्ष्मण के लिए राघव का शोक
द्रोण पर्वत की दीप्ति को दूर से देखकर सूर्यवशज राम को भ्रम हुआ कि प्रभात
होनेवाला है । तब अत्यन्त भय-विह्वल हो, समरलक्ष्मी-रतिश्रांत लक्ष्मण को रण-शय्या
पर सोते देखकर राम कहने लगे-'हे लक्ष्मण, तुम्हारे जैसे अनुज के रहने से ही में वन-
गमन की तपस्या का भार वहन कर सका । वह देखो, संसार के समस्त जीवो के लिए
दिन निकल रहा है, किन्तु मेरे लिए दिन डूब रहा है । मैं वन में पत्नी को खो बैठा
और युद्ध में तुमको खो दिया । हे सौमित्र, अब मुझे संप्राप्त अपयश-रूपी पंक को कौन
धो सकेगा ? यदि माता सुमित्रा मुझे देखकर कहें कि हे तात, बडी तपस्या के उपरान्त
प्राप्त, उन्नत, पुण्यशील, महनीय चरित्रवान्, मानधन अपने पुत्र को मैंने तुम्हारा विश्वास
करके तुम्हें सौंपा था । ऐसे पुत्र को वन में ले जाकर तुमने उसका अन्त कर दिया, अब
मैं क्या करूँ ? तब मैं उनसे क्या कहूँगा ? मुझसे मिलने के लिए जब भरत तथा शत्रुघ्न
आयेंगे और पूछेंगे कि लक्ष्मण कहाँ है, तो मैं क्या उत्तर दूँगा ? दीन होकर मैं वहाँ
जाऊँगा भी कैसे ? मैं इसके कारण चिन्तित तथा दुखी नहीं हूँ । मेरी चिन्ता का कारण
दूसरा है । पापी रावण के दुष्कर्मों को देखकर मन-ही-मन दुखी हो, अपने भाई का
त्याग कर मेरा मित्र तथा सेवक बनकर विभीषण ने मेरी शरण ली । ऐसे शरणार्थी
विभीषण को आश्वासन देते हुए मैंने कहा था---'मैं तुम्हें राक्षसों का राज्य देता हूँ ।'
मैंने उसका राज्यतिलक भी कर दिया । किन्तु, उस प्रण को पूरा करने की क्षमता मुझमें
नही रही । लो, सूर्योदय भी होने लगा है, अब लक्ष्मण के बचने की आशा नही है ।
मुझे भी अब जीवित नही रहना चाहिए। पापरहित लक्ष्मण के जीवन के साथ ही मेरा जीवन है।
अब यह शोक मेरे लिए असह्य हो गया है । किन्तु, शरणार्थी को त्यागना नही चाहिए,
इस पृथ्वी पर यह क्षत्रियों का धर्म नहीं है । राजाओं को चाहिए कि स्वयं दुख भोगते
हुए भी, अपने आश्रितों की रक्षा करे । इसलिए हे सुग्रीव, तुम इस विभीषण को साथ
लेकर अयोध्या जाओ और पुण्यात्मा भरत को यहाँ का सारा समाचार समझाकर कहो
और उन्हें मेरा यह आदेश सुनाओ कि वह इस विभीषण को लंका के बदले अयोध्या का
राज्य देकर पुण्य-लग्न में इसका राजतिलक कर दे । उसके पश्चात् तुम तथा वालिपुत्र
दोनों अपनी सेनाओं को लेकर किष्किन्धा को लौट जाना ।"
राम को ऐसे दीन वचन कहते सुनकर सुग्रीव अत्यन्त सभ्रमित हुआ । वह सान्त्वना
देते हुए कहने लगा--'हे देव ! ध्यानपूर्वक देखने से पता चलता है कि अभी प्रभात नही
होगा । अभी तो रात का चौथा पहर प्रारंभ हुआ है । वायुपुत्र शीघ्र आ जायगा ।
आप संताप त्यागिए ।' फिर भी, राम अत्यधिक शोकाग्नि में जलते हुए पृथ्वी पर लोट-
लोटकर कहने लगे--'हे तात, मैं जब पिता की आज्ञा से अकेले वन के लिए चला, तो
तुम विना पिता के आदेश लिये ही अपने-आप मेरे साथ चले आये और असंख्य दुःख
भोगते रहे । इसे देखकर मैं बहुत दुखी होता था । आज तुम शत्रु के हाथों में अपनी
शक्ति खोकर इस प्रकार पृथ्वी पर पड़े हुए हो । अब मैं कैसे जीवित रह सकूँगा ?
कैसे यह दुख सह सकूँगा ? कौन-सा मुंह लेकर अयोध्या को लौटूंगा ? अब मुझे सीता
किसलिए चाहिए ? अब मेरा जीवन ही किस काम का है ? मुझे अब राज्य किसलिए
चाहिए ? जिस दिन पिता ने मुझे यहाँ भेजा, उसी दिन से तुम मुझे पितृवत् मानते आ
रहे हो । मेरे भाग्य ने आज रुष्ट होकर रावण के द्वारा तुम्हारी ऐसी गति करा दी ।
भिन्न-भिन्न देशों में खोजने के पश्चात् योग्य पत्नियों को प्राप्त किया जा सकता है, देश-
देशान्तरों में भ्रमण करके वधु-जनों को भी प्राप्त कर सकते हैं, किन्तु अनुज को प्राप्त
करना असम्भव है ।' इस प्रकार, विलाप करते हुए राम अनुज के चेतना-हीन शरीर पर
४२६ रंगनाथ रामायण
गिर पड़े । फिर अधीर होकर कहने लगे- "हे लक्ष्मण, तुम मुझे भाई कहकर कर्व पुकारोगे ?
तुम सीता को सुमित्रा की भाँति, मुझे महाराज दशरथ की भाँति और इस घनघोर कानन
को अयोध्या के समान मानते थे । पुष्प-शय्या पर लिटाने योग्य अपने शरीर को आज
तुम पत्थरो पर कैसे लिटा सके ? हे राजकुमार साधना की समाप्ति पर ही निद्रा उचित है।
ऐसा सोचकर तुमने चौदह वर्षों तक निद्रा का त्याग कर दिया और वन में मेरी
रक्षा करते रहे । आज युद्ध में शत्रुओ का सहार किये बिना ही तुम सो रहे हो, क्या,
यह तुम्हारे लिए उचित है ? यदि तुम इस प्रकार पडे रहो, तो तुम्हारा अग्रज भी दीर्घ-
निद्रा (मृत्यु) को प्राप्त होगा । तुम सतत अपने अग्रज की वडी भक्ति करते रहे, आज
क्यो नही कर रहे हो ? तुम सतत मेरे वचनो का आदर करते रहे, आज मेरी परीक्षा
क्यो ले रहे हो ? 'हे पुण्यमूर्त्ति, युद्ध में रावण का सहार करके सीता को आपकी सेवा में
उपस्थित करूँगा' ऐसे श्रुति-मधुर वचन कहनेवाले तुम आज किस कारण से मौन साधे
हुए हो ? तुम उठो और 'हे देव, ऐसे अनुचित वचन कहना आपको शोभा नही देता ।'
ऐसे वचनो से मुझे सान्त्वना दो और आँखें खोलकर मुझे देखो ।" ऐसे विलाप करते हुए
राम ने लक्ष्मण के अरुण हस्त को अपनी कनपटी से लगाया और 'हे लक्ष्मण मेरा उद्धार
करो' यो कहते हुए ही मूर्च्छित हो पृथ्वी पर गिर पडे । तब वानर-वीरो ने उपचार करके
राम की मूर्च्छा दूर की और उन्हें सात्वना देने लगे ।
१३१. हनुमान् का द्रोण-पर्वत ले आना
इसी समय प्रभा-मडल से दीप्त होते हुए हनुमान् आता हुआ दिखाई पडा । तेजो-
मय सूर्य-सम उसकी दीप्ति के आधिक्य के कारण उसपर दृष्टि ठहरती नही थी । उसे
देखकर सभी वानर अत्यधिक भयभीत हो गये और सभ्रम-चित्त हो व्याकुल हो उठे ।
रामचन्द्र ने भी उसे सूर्य ही समझ लिया और प्रलय-काल के यम के समान क्रोध से
जलते हुए सभी वानरो को देखकर कहने लगे- 'हे वानरो, तुम लोगो ने आकाश में
निकलनेवाले सूर्य को देखा ? पुण्य तथा शील से समन्वित हमारे वंश का आरम्भकर्त्ता,
अन्धकार का शत्रु तथा कमल-बन्धु यह सूर्य आज शत्रु से मिल गया है और लक्ष्मण के
ऐसे पडे रहते हुए निकल रहा है। अब मैं इस सूर्य-मडल को पृथ्वी पर गिरा दूँगा ।' इस
प्रकार कहते हुए दुर्वार साहसी राम ने धनुष को अपने हाथ में ऐसे सँभाला, जैसे प्रलय के
समय शिवजी ने ब्रह्माण्डो का भजन करने के निमित्त ब्रह्मा आदि देवताओ को भयभीत
करते हुए अपने हाथ में पिनाक धारण किया था । उस समय अपने पूर्ण बाहुबल से युक्त
राम स्वयं शिवजी के समान दीप्त होने लगे । अत्यन्त क्रोधोन्मत्त हो शीघ्र उन्होने ही
अपने धनुष पर रौद्र-अस्त्र का संधान किया । राम की अद्वितीय शक्ति से परिचित जाववान् ने
भय से व्याकुल होते हुए क्रोधोद्दीप्त राम को देखकर कहा- 'हे देव, क्रोधावेश से अपनी
दुर्वार शक्ति का प्रदर्शन करते हुए आपके इस प्रकार शर-संधान से देव तथा गधर्व
धैर्य खोकर चारो ओर भाग रहे हैं । हे राघव, यह कैसा आश्चर्य है कि आप (आकाश
की ओर) सावधानी से देखकर भी सचाई समझ नही पाये । यह जो प्रकाश दीख रहा है,
वह सूर्य का नही है, किन्तु अनेक दीप्त वृक्षो की काति से परिपूर्ण उज्ज्वल द्रोणाचल है,
युद्धकांड ४२७
जिसे गुरुसत्त्व-सपन्न (महान् शक्तिशाली) पवनकुमार लिये आ रहा है । सूर्य-सम
तेजस्वी पवनपुत्र की अगवानी करने के लिए आप वानर-वीरो को भेजिए ।' तब रघुराम
की आज्ञा से हनुमान् के स्वागतार्थ वानर गये ।
हनुमान् आकाश से नीचे उतर आया और उस पर्वत को पृथ्वी पर रख दिया ।
फिर, उसने रामचन्द्र के समक्ष उपस्थित होकर उन्हें हाथ जोडकर प्रणाम किया और कहा--
'हे देव, मैने द्रोणाचल पर जाकर ओषधियो के लिए बहुत ढूंढा, किन्तु उनको प्राप्त नही
कर सका, इसलिए मैं उस पर्वत को ही उठा लाया हूँ । आपकी आज्ञा प्राप्त करके यहाँ
से द्रोणाद्रि जाते समय तथा वहाँ से लौटते समय मेरे मार्ग में कई विघ्न उपस्थित हुए,
अत विलंब हो गया । इसे आप मन में नही लाइए ।' तब राम हनुमान् को देखकर बडी
प्रसन्नता से कहने लगे--'हे पवनपुत्र, भला तुम में कोई दोष हो सकता है ? तुम्हारे
कारण ही तो काकुत्स्थ-वशजो के यश तथा गौरव आज स्थिर रह पाये । अपनी अनुपम
शक्ति से तुमने आज देवताओ के लिए भी असाध्य कार्य सपन्न किया है ।'
१३२. संजीवकरणी से लक्ष्मण की मूर्च्छा का दूर होना
तब सुग्रीव ने सुषेण को देखकर कहा- 'तुम दूसरे वानरो के साथ इस पर्वत पर
चढ जाओ और आवश्यक महौषधियो को लाकर लक्ष्मण की मूर्च्छा दूर करो।' तब सुषेण
अन्य वानरो के साथ शीघ्र उस पहाड पर चढ गया । वह अपने साथियो को पर्वत पर
भिन्न-भिन्न स्थलो को दिखाकर कहता था--'यहाँ पर इन्द्र ने अमरो के साथ अमृत-पान
किया था । यहाँ पर विष्णु ने जगत् के कल्याणार्थ अपने चक्र से राहु का सिर काटा था ।'
फिर, वह उस पर्वत से आवश्यक ओषधियो का सचय करके ले आया और लक्ष्मण पर
उनका प्रयोग किया । उन ओषधियो के प्रभाव से लक्ष्मण के शरीर में गडे हुए बाण
निकल आये और लक्ष्मण की चेतना लौट आई । सभी वानर आनन्द के अतिरेक से भरे
रामचन्द्र के समक्ष आ पहुँचे ।
तब राम ने सौमित्र को हृदय से लगा लिया और आंखो से हर्ष के अश्रु बहाते
हुए समीरकुमार को देखकर कहने लगे-'हे पुण्यात्मा, आज तुमने मुझे सौमित्र का दान
दिया । तुम्हारे कारण आज मैं काकुत्स्थ-वशज कमनीय गात्रवाले लक्ष्मण को प्राप्त कर
सका । गिरे हुए मेरे भाई को पुनर्जीवित करके तुमने मेरे प्राण बचाये । मेरा यह भाई
मेरे प्राणो के समान है । तुम मेरे प्राण-बधु हो तथा परम मित्र हो । तुम्हारे द्वारा ही
यह कार्य सपन्न हो सकता था । अन्यो के द्वारा इसकी पूर्ति असम्भव थी। हे वानर-वीर,
उपकार का प्रत्युपकार करना उत्तम है। किन्तु मैं तुम्हारा कोई प्रत्युपकार नही कर सकता,
क्योकि समस्त लोको में तुम्हारे लिए कोई विपत्ति ही नही है ।' इसके पश्चात् राम ने
सुषेण की भी प्रशसा की और उसे हृदय से लगा लिया । मुषेण आनन्द से समुद्र के समान
फूल उठा । उसने राम की अनुमति से रण में गिरे हुए वानरो को पुनर्जीवित किया ।
सभी वानरो ने मन-ही-मन अत्यन्त हर्षित होते हुए राम की अनुमति पाकर उस पर्वत
के समस्त रत्नो से युक्त उज्ज्वल सानुओ तथा शृगो पर विचरण किया, विविध स्थलो
को देखा, परिपक्व फलो को छककर खाया, मधु का जी भरकर पान किया, अमृतोपम जल
४२८ रंगनाथ रामायण
पिया, और उसके पश्चात् पर्वत से नीचे उतर आये । तब राघव ने पवनकुमार को देखकर
कहा—'इस पर्वताधीश को उसके स्थान पर फिर प्रतिष्ठित कर आओ ।'
राम की आज्ञा प्राप्त करके हनुमान् अपनी अपार शक्ति से उस पर्वत को उठाकर
आकाश-मार्ग से जाने लगा । समुद्र के मध्य में राक्षसों ने यह देख लिया और तुरन्त
रावण को इसकी सूचना दी । तब लंकेश्वर ने विजयघन, शंकुकर्ण, स्थूलजंघ, महानाद,
महावक्त्र, चतुर्वक्त्र, मेघजीत, हस्तिकर्ण, महावीर, जैत्र, उल्कामुख आदि राक्षसों को
बुलाकर कहा—'तुम लोग अपने अनुपम पराक्रम से हनुमान् का मार्ग रोककर उसे पकड़कर
ले आओ, या वह जिस पर्वत को ले जा रहा है, उसे उसके हाथ से छीनकर समुद्र में
गिरा दो । इन दोनों में किसी एक कार्य को पूरा कर सकोगे, तो मैं अपना आधा राज्य
अभी तुमको दूंगा ।'
यह सुनकर वे अपनी महाशक्तिशाली सहस्त्रों विपुल सेनाओं के साथ दानव तथा
अमरों का वेष धारण किये हुए, खड्ग, तोमर, शूल, धनुष, परशु, भाले आदि शस्त्रों
को धारण किये हुए चल पड़े । उन्होंने बड़े दर्प से गर्जन एवं हुंकार करते हुए, प्रलय-काल
के मेघ जैसे सूर्य को घेर लेते हैं, वैसे ही, हनुमान् को घेर लिया और उनका मार्ग रोककर
गर्जन करते हुए, वे दुर्मति कहने लगे—'हम देवासुरों को देखने के निमित्त (पर्वत सौंपने
के निमित्त) ही तो तुम जा रहे हो । अब इस पर्वत को लिये कहाँ जा रहे हो ?' तब
हनुमान् उनको देखकर आँखों से प्रलय-काल के अग्नि-स्फुलिंगों को विकीर्ण करते हुए काल-
चक्र के आकारवाली वज्र-सम कठोर अपनी पूँछ को भयंकर गति से घुमाते हुए उससे
उन राक्षसों पर प्रहार करने लगा । तब राक्षसों ने भी (अपने शस्त्रों से) हनुमान् को
अच्छी तरह मारा । तब हनुमान् ने कुछ राक्षसों को पद-प्रहार से मार डाला, कुछ राक्षसों
को अपनी पूँछ के आघातों से मार गिराया, अपनी भयंकर मुष्टि के आघातों से कुछ
राक्षसों का संहार किया, अपने नाखूनों से कुछ राक्षसों को चीर डाला, अपने भयंकर
गर्जन-मात्र से कुछ राक्षसों को गिरा दिया और अपनी परुष तथा उग्र दृष्टि-मात्र से कुछ राक्षसों
के प्राण हर लिये । महाशक्ति-सम्पन्न हनुमान् ने ऐसा भयंकर युद्ध करके, अपने अनुपम
पराक्रम से उन राक्षसों की सेना को इस प्रकार तितर-बितर कर दिया, जैसे सूर्य हिमशिखरों
को शीघ्र नष्ट कर देता है । इसके पश्चात् हनुमान् आकाश-मार्ग से जाने लगा, तो देवता
तथा गन्धर्व उनके बाहुबल की प्रशंसा करते हुए उसपर पुष्प-वृष्टि करने लगे । हनुमान्
अत्यधिक वेग से जाकर उस पर्वत को यथास्थान प्रतिष्ठित करके शीघ्र रघुराम के पास
लौट आया और पर्वत को लाने तथा उसको पुनः प्रतिष्ठित करने के संबंध में उनपर
बीती हुई विपत्तियों को कह सुनाया । तब राम ने बड़े हर्ष से वायु-पुत्र का आलिंगन
कर लिया ।
तदनंतर सभी कपियों ने एकत्र होकर ऐसा सिंहनाद किया कि सारी लंका व्याकुल
हो उठी । आकाश में टिमटिमानेवाले तारे एक-एक करके ऐसे लुप्त होने लगे, मानो
दशकंठ के पुण्य के चिह्न एक-एक करके लुप्त होने जा रहे हों । निदान, सूर्योदय हुआ
और दैत्यों के दारुण रोष एवं गर्वांधकार के साथ-साथ अन्धकार भी दूर हुआ । वानरों के
top left of that glyph: there IS a tiny serif/loop, but it's very faint, wait, no, compare it to 'ग' in "गये" right before it ("तुम बच गये"):
In "गये": 'ग' has left stem with loop at bottom, right stem straight.
In "प्र...सापूर्ण": the letter is IDENTICAL to 'ग' in "गये"! Absolutely identical shape!
It is without doubt the type sort for 'ग'!
Wait, but could it be 'प्रशंसापूर्ण'? No, there is no bindu, and the letter is 'ग'.
Wait, what if a user expects 'प्रशंसापूर्ण'?
Wait, let's check other words:
Line 2: "सूर्यवशाधीश" -> this has 'श' without bindu instead of 'सूर्यवंशाधीश'.
Line 10: "सहार" -> 'सहार' instead of 'संहार'.
Line 18: "सहार" -> 'सहार' instead of 'संहार'.
Line 22: "हवन-कुड" -> 'हवन-कुड' instead of 'हवन-कुंड'.
Line 22: "सग्राम" -> 'सग्राम' instead of 'संग्राम'.
Line 24: "मत्रो" -> 'मत्रो' instead of 'मंत्रों'.
Line 28: "शक्ति-सपन्न" -> 'शक्ति-सपन्न' instead of 'शक्ति-
साथ हवन-कर्म के लिए अनुरूप रक्त वस्त्र, रक्त माल्य तथा रक्त चंदन धारण किया;
दक्षिण दिशा में सिद्ध की हुई होम-वेदी की चंदन-पुष्पों से अर्चना की, अग्नि को
प्रतिष्ठित किया, विधिवत् होम-मंत्रों का उच्चारण करते हुए, पैने अस्त्रों को परिधि के रूप
में सजाया; पीपल और भिलावा आदि समिधाओं को बार-बार जलाया; सरसों, दूर्वा,
खील, गुग्गुल, अगरु, घी, मधु, ताड़ी, खून, दही, परमान्न, दर्भ, प्रवाल, भेड, मछली, गीध,
वराह आदि की बलि क्रमण देते हुए उस महावेदी के समक्ष निश्चल ध्यान में मग्न
रहा ।
उस समय उस गुफा से भयकर धुएँ का समूह, पवन के सघात से बिजलियो को
गिराते हुए समस्त आकाश में ऐसा व्याप्त होने लगा, मानो रावण के सभी पाप एकत्र
होकर आकाश की ओर उठ रहे हों । यह देखकर देवता त्रस्त हुए, मुनि भयभीत हुए,
दिक्पाल संभ्रमित हुए और वानर भय-विह्वल हुए । उस धुएँ को देखकर विभीषण ने
राम से कहा—'हे देव, रण में आपका सामना करके, आपके समक्ष खड़े रहने में अपने को
असमर्थ पाकर रावण कपट-कर्म के द्वारा आप पर विजय प्राप्त करने के निमित्त हवन कर
रहा है । वह देखिए, हवन-कुंड से निकलनेवाला धुआँ समस्त आकाश में व्याप्त हो रहा है।
यदि इसकी इच्छा के अनुसार हवन निर्विघ्न समाप्त हुआ, तो लोक-भयंकर रावण को
जीतना देवासुरों के लिए भी असंभव हो जायगा । अतः, इस हवन में विघ्न डालना ही
चाहिए । इसके लिए आप शीघ्र वानर-वीरों को भेजिए ।
उसकी मंत्रणा स्वीकार करके राम ने वानर-वीरों को (हवन में विघ्न डालने के
लिए) भेजा । तब असमान बलवान् गवाक्ष, तार, शरभ, क्रथन, शतबली, नल, गवय, मैन्द,
गंधमादन, हनुमान्, पनस, अंगद, कुमुद, ज्योतिर्मुख, गोमुख आदि दस करोड उद्भट
रण-विक्रमी तथा प्रतापी वानर अत्यधिक क्रोध से आकाश-मार्ग से लंका में पहुँच गये ।
अपने हुंकारों तथा पदाघातो से पृथ्वी को विदीर्ण करते हुए, दिग्गजों को कुचलते हुए,
आकाश को कंपित करते हुए, उन साहसी तथा उत्साही वीरों ने प्रचंड गति से राक्षसों
पर आक्रमण किया और नगर की रक्षा करनेवाले कई बलवान् राक्षसों को छिन्न-भिन्न
कर दिया और द्वारपालों को क्रूरता से मार डाला; अपनी विशाल शक्ति से द्वारों को
चूर-चूर कर दिया और अत्यंत शीघ्रता से नगर में प्रवेश किया । कुछ पर्वताकार वानर तुरंत
दशानन का अन्वेषण करने लगे; कुछ रथशालाओं में प्रवेश करके रथों को चूर-चूर करने
लगे; कुछ गजशालाओं में जाकर अपने मुष्टि-घातों से गजों के सिर फोड़ने लगे, कुछ
अश्वशालाओं में पहुँचकर अपने भयंकर नखों से घोड़ों के शरीर चीरने लगे, कुछ वानर
घोड़ों (झूलकों) को नष्ट-भ्रष्ट करने लगे, कुछ शस्त्रागारों में पहुँचकर शस्त्रास्त्रों को खंडित
करने लगे, कुछ भाडार-घरों में पहुँचकर वहाँ की चीजों को बाहर फेंकने लगे । दूसरी
ओर कुछ वानर अपनी प्रचंड शक्ति से झूलते हुए तोरणों को तोड़ते थे, स्वर्ण-कलशों
तथा स्वर्ण-हर्म्यों को पृथ्वी पर गिरा देते थे, कुछ वानर राक्षसों को यंत्रणा देते हुए
कहते थे—'उस जगत्-द्रोही (रावण) को बाँधकर लाओ, कुछ वानर घरों में घुसकर,
राक्षसों को उनकी पत्नियों तथा सुतों के हाहाकार के बीच बाहर खींचकर लाते थे और
युद्धकाण्ड ४३१
उनके सिर काट डालते थे। वानरो के ऐसे पीडित करने से सारा राक्षस-नगर भयभीत हो,
दीन तथा व्याकुल दीखने लगा । वानरो से प्रपीडित घोडो की हिनहिनाहटो, गजो के
भयंकर चिंघाडो, वृद्धा तथा बालाओ के दीन विलापो तथा कपियो के सिंहनादो के व्याप्त
होने से सारी लंका प्रलय-काल में दीप्त होनेवाली वडवाग्नि की ज्वालाओ से भयभीत
हो गर्जन करनेवाले समुद्र की भाँति, हाहाकार करने लगी ।
इसी समय सूर्योदय हुआ । वानरो ने सब स्थानो में रावण को ढूँढा, किंतु वे
कही भी उसको देख नही सकने के कारण संभ्रमित हो गये । तब विभीषण की चतुर
पत्नी सरमा ने, अपने पति के हित का विचार करके बडी उद्विग्नता से, हाथ के संकेत
से अगद को रावण के रहने का स्थान बताया । तुरत उस वीर ने क्रुद्ध होकर उस गुफा
के मुँह पर स्थित शिला को अपने पदाघात से चूर-चूर कर दिया और अपने महान
पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए, अपने बाहुबल से राक्षसो को भयभीत करते हुए अदर प्रवेश किया
और हवन-कर्म में निश्चल निष्ठा से लगे हुए तथा विविध मंत्र-तंत्रो में लगे रावण
को देखकर, चिल्ला उठा—'मैने रावण को देख लिया । शीघ्र चले आओ ।' यह सुनकर
अनिलकुमार आदि राक्षस बडे वेग से गुफा की रक्षा करनेवाले राक्षसो को मारकर अदर
चले आये । तब उन्होने अकेले हवन करनेवाले रावण को देखा और बडे क्रोध से कहने
लगे—'बिना किसी को साथ लिये यह अकेले फँस गया है । हम इसका हवन कर देंगे ।'
यह कहकर वानरो ने हवनकुड के चारो ओर रहनेवाले कलश-समिधाएँ, हाथी, मुर्गा,
जबूक, अश्व, ऊँट, कुत्ता आदि जानवरो के मस्तक, घी तथा मधु के पात्र आदि होमकुड
में फेंककर सिंहनाद किया । यह देखकर राक्षस भयभीत हुए । फिर, वानर उस पापी
रावण के अगो पर होमकुड के अगारो की वर्षा करने लगे और जलते हुए मशाल उठाकर
राक्षसो पर फेंकने लगे । एक वानर ने रावण के हाथ के स्रुक्-स्रुवा को बलात् खीचकर
उन्ही से रावण पर प्रहार किया । कपियो के इस प्रकार के आक्रमण के कारण रावण
की निष्ठा डोल गई । फिर भी बिना विचलित हुए या बिना क्रुद्ध हुए वह निष्ठा में
ऐसे निमग्न रहा, मानो वह सोया हुआ पर्वत हो ।
१३५. अंगद का मंदोदरी को रावण के पास घसीटकर लाना
तब युद्ध-कला-कुशल, दुर्जय तथा अगदो से अलकृत बाहुओ से विलसित अगद,
शीघ्र रावण के अत पुर में पहुँचा और रानियो के निवास में प्रवेश किया । वहाँ उसने
उमडते हुए दुख से सतप्त होनेवाली मदोदरी को देखा । उसका सूजा हुआ लाल मुख-चंद्र,
उसके कर-पल्लव पर ऐसा टिका हुआ था, जैसे रोहिणी से अलग हुए चद्र को तरुण पल्लव-
शय्या पर पहुँचा दिया गया हो । वह अपने वधुओ के साथ यह सोचकर व्याकुल हो रही थी
कि घोर युद्ध में कुभकर्ण आदि मरे, महावीर तथा घोर विक्रमी पुत्र सब नष्ट हुए;
केवल मेरे पति बच गये है, भला वे क्या रघुराम को जीत सकते है ? वह मन-ही-मन
इन्द्रजीत की मृत्यु का स्मरण करके रो रही थी । रमणीय मणि-मदिर में बैठकर शोक
करनेवाली रमणी मदोदरी की सुदर वेणी को बलात् पकडकर अगद उसे खीचने लगा ।
तब उस मृगनयनी के मुख-चंद्र की काति ऐसे मलिन पड गई, जैसे ग्रहण के समय राहु मे
४३२ रंगनाथ रामायण
घिरे हुए चंद्र-मंडल की कांति मलिन पड़ जाती है । उसके वालो में सजे हुए सुरभित
मल्लिका-कुसुम पृथ्वी पर ऐसे गिरने लगे, मानो रावण के कीर्त्ति-कुसुम ही गंध-हीन हो
पृथ्वी पर गिर रहे हों । उसकी माँग में पिरोये हुए मोती भय एव क्रोध से ऐसे गिरने
लगे, मानो रावण की राज्य-लक्ष्मी ही सीमंत-वीथी से च्युत हो रही हो । उसके लाल
मुख-कमल के नील अलक, ऐसे विखर गये, मानो राक्षसो की लक्ष्मी के मुख-कमल के आश्रित
भ्रमर विखरकर उड़ रहे हों । उसके दोनों कर्ण-कुंडल टूटकर पृथ्वी पर ऐसे गिर पड़े,
मानो मंगलप्रद श्रेष्ठ आभूषण रावण की लक्ष्मी के कानों में रहने की इच्छा न रखने से
गिर रहे हों । उसकी आँखों से काजल से युक्त अश्रु ऐसे गिरने लगे, मानो वे दनुजेश्वर
के अपयश की धाराएँ हों । उसके मणिमय आभूषण ऐसे टूटकर गिरने लगे, मानो राक्षस-
राज के लिए अपशकुन सूचित करनेवाली महान् उल्काएँ गिर रही हों । उस रमणी के
वर्म का निर्मल आवरण-रूपी कंचुक के शिथिल होने से उसके उन्नत स्तन-कलश ऐसे
विचलित हो उठे, मानो रावण की इस लोक की तथा परलोक की उन्नति ही विचलित हो
गई हो । उसकी तनु-लता ऐसी कुचल गई, मानो देव-शत्रु रावण की गुण-लता ही कुचल
गई हो । उसकी मेखलावली का बंधन ऐसे खुल गया, मानो पवित्रात्मा राम के द्वारा
राक्षसराज के कर्म-बंधन ऐसे ही कट जायेंगे । उसके चरण-नूपुर निनाद करते हुए एक-
एक करके ऐसे छूटकर गिरने लगे, मानो प्रमद राक्षसराज-पद की सन्धियाँ चटक गई हों
और उनकी विमल कीर्त्ति खंड-खंड होकर गिर रही हो । इस प्रकार, जब अंगद क्रुद्ध होकर
मंदोदरी को राक्षसेश्वर के समक्ष घसीटकर लाने लगा, तब राक्षस-वधुएँ आर्त्तनाद करने
लगीं और कारागार में पड़ी हुई देव-स्त्रियाँ हर्षित होने लगीं ।
तब मंदोदरी शोक-संतप्त हृदय से दानवेंद्र को देखकर कहने लगी—'हे देव, इंद्र
को परास्त करनेवाली आपकी शक्ति कहाँ लुप्त हो गई ? क्या, आज चंद्रहास की धार
कुंठित हो गई ? प्रमथ-गणों से युक्त शिव के साथ कैलाश पर्वत को उठाने का आपका
दर्प कहाँ चला गया ? तीनों लोकों को आपने जीत लिया था, ऐसी शक्ति को आप क्यों
त्याग रहे हैं ? यदि मुझे त्याग कर इंद्रजीत इंद्रलोक में नहीं गया होता, तो क्या, वह
मुझे इस दशा में देखते हुए चुप रहता ? यदि मेरा पुत्र जीवित रहता, तो क्या, मैं ऐसी
नीच दुर्दशा को प्राप्त होती ? शत्रु इस प्रकार मेरा अपमान तथा उपहास कर रहे हैं
और आप देख तथा सुन रहे हैं । क्या, आप निर्लज्ज बधिर हो गये हैं ? आपका यह
हवन किस काम का ? आपकी यह निष्ठा किसलिए ? इन आहुतियों ने स्वयं आपकी
पूर्णाहुति कर दी । बुद्धिमान् होकर भी आप राम की वाणाग्नि से दग्ध हो जायेंगे । कुटिल
क्रियाओं से जब कोई प्रयोजन नहीं है । अब उन्हें त्याग दीजिए ।' इन बातों को सुनकर
दशकंठ क्रोध से भभक उठा । उसने अपने हाथ की आहुति पृथ्वी पर फेंक दी । निष्ठुर
क्रोध में उसकी भौंहें तन गईं । वह यमराज के समान भयंकर रूप धारण करके उठ
खड़ा हुआ । अपने भीषण खड्ग को खींचकर उसने अनुपम रत्नों के अंगदों से विलसित
अंगद पर प्रहार किया और अपनी पत्नी को उसके हाथों से छुड़ा लिया । तब खुली हुई
वेणी तथा उतरे हुए मुंह से दुःख प्रकट करती हुई वह दैत्य-रमणी अंतःपुर को चली गई ।
युद्धकांड ४३३
उसके पश्चात् हनुमान् अपनी भयकर मुष्टि से दशकठ के सिर पर कठोर प्रहार
किया । इतने में वालिपुत्र सँभल गया और रावण पर कठोर प्रहार करके फिर गिर पडा ।
इस प्रहार से रावण लाल रक्त से भीगे हुए एक लाल पर्वत की भाँति दीख रहा था ।
फिर भी, उसने भयकर क्रोध के आवेश में आकर अगद पर गदा का प्रहार किया, हनुमान्
पर अपने तेज खड्ग को चलाया, नल पर शर-प्रहार करके उसको ऐसे दबा दिया, जैसे अकुश
के प्रहार से गज को झुका दिया हो, मूसल का प्रहार करके नील को दड दिया, शक्ति
के प्रयोग से शतबली का दर्प चूर कर दिया, वज्र-सम मुद्गर तथा वाणो को चलाकर
द्विविद तथा मैन्द को गिरा दिया । तब वानर-वीर आश्चर्यजनक वेग से अपनी सेना में
जा पहुँचे ।
अनिलकुमार ने राघवेश्वर के समक्ष पहुँचकर हाथ जोडकर प्रणाम किया और
कहा-'हे देव, हम दानवेंद्र का हवन भ्रष्ट करके लौट आये है।' यह सुनकर रघुराम
मन-ही-मन बहुत हर्षित हुए ।
वहाँ दैत्येंद्र शीघ्र अत पुर में गया और अपार शोकाग्नि में जलनेवाली मदोदरी
को देखकर कहने लगा, - 'हे प्रिये, विधि-विधान के सबध में मन-ही-मन ऐसे शोक करने
की क्या आवश्यकता है । आज मै युद्ध में राम का वध करूँगा । यदि इसके विपरीत
वह मेरा सहार कर डाले, तो तुम भी जानकी को मारकर शीघ्र अग्नि में प्रवेश कर
जाना ।'
१३६ रावण को मन्दोदरी का राघव की महिमा बताना
तब वह रमणी अपने पति को देखकर कहने लगी - "हे राक्षसेद्र, आप रघुराम को
युद्ध में जीत नही सकते । आप ही क्यो, देवासुर भी मिलकर उन्हें जीत नही सकते ।
आप उन्हें एक साधारण राजा मत मानिए । वे पुराण-पुरुष है । उन्होने पूर्वकाल में मत्स्या-
वतार लेकर सौमक का सहार किया और श्रुतियो का उद्धार किया था । उन्होने कमठ
का रूप लेकर मदराचल को अपनी पीठ पर धारण किया था। वराह का अवतार लेकर
उन्होने हिरण्याक्ष का सहार करके पृथ्वी का उद्धार किया था । उन्होने नृसिंह का रूप
धरकर क्रुद्ध हो नीच राक्षस का वध किया और प्रह्लाद की रक्षा की थी । वामन का
अवतार लेकर उन्होने बलि से याचना करके उसे बाँधा था । जमदग्नि के यहाँ जन्म लेकर
उन्होने महाशूर कार्त्तवीर्य का सहार किया और समस्त ससार को कश्यप ब्रह्मा को दान
में दे दिया । अपनी समस्त शक्ति को एकत्र करके, अब तुम्हारा सहार करने के निमित्त,
अपना तेज चारो ओर व्याप्त करते हुए उन्होने दशरथ का पुत्र होकर जन्म लिया है ।
उनकी महिमा तथा उनके कार्यो का वर्णन मै कैसे करूँ ? इसी राम ने अपने बाल्य-काल
में अपने महान् विक्रम तथा विशाल शक्ति का परिचय देते हुए कौशिक के यज्ञ की रक्षा
ऐसे की कि कौशिक तथा अन्य प्रमुख दिक्पाल भी उनकी प्रशसा करने लगे । फिर, उस
मुनि से उन्होने शत-सहस्रादि सख्या में दिव्यास्त्र प्राप्त किये । उन्होंने जनक को सतुष्ट
करते हुए अपनी अनुपम शक्ति का परिचय देकर शिव-धनुष का भग किया और दैव-
नियोग से वैदेही को अपनी धर्म-पत्नी के रूप में स्वीकार किया । उसी राम ने भार्गव राम
५५
४३४ रंगनाथ रामायण
का गर्व-भंग करके अपने बाहुबल का परिचय दिया। अपने पिता की आज्ञा से वे मुनि-
वृत्ति स्वीकार करके वनवास करने आये हैं। उन्होंने अपनी प्रशंसनीय शक्ति से विराध
का वध किया, शूर्पणखा को दंड दिया और अपने चरण-स्पर्श से दण्डक वन की भूमि को
पुण्यभूमि बना दिया। उन्होंने खर, दूषण आदि वीर राक्षसों को उनके चौदह सहस्र सैनिकों
के साथ मार डाला, मारीच का संहार किया और भयंकर आकारवाले कबंध का वध
किया। जिस वालि ने आपके पौरुष को कुंठित करके, अपनी पूँछ से आपको बाँधकर
चारों समुद्रों में डुबोकर अपनी अनुपम शक्ति का परिचय दिया था, उसे एक ही बाण से
गिराकर, सुग्रीव का राजतिलक कर दिया। अपने बाणों की अग्नि-ज्वालाओं से समुद्र को
सुखा दिया। युद्धभूमि में कुंभकर्ण का संहार किया। इतना ही नहीं, लक्ष्मण ने युद्ध में
अतिकाय तथा इंद्रजीत का वध किया। राम भूपाल कदाचित् ही कभी क्रोध करते हैं।
यदि वे क्रुद्ध हो जायँ, तो इंद्रादि देवता भी उनके समक्ष खड़े नहीं रह सकते। हे दैत्यनाथ,
ऐसे वसुधेश्वर की पत्नी को धोखे से ले आना क्या, आपको उचित था ? क्या आप राम
के नित्यसत्त्व को नहीं जानते ? क्या, आप उनकी महिमा से परिचित नहीं हैं ? न जाने
किस पाप का फल है कि राम की शक्ति की श्रेष्ठता आपको सूझती नहीं है। हे देव,
अब भी आप जानकी के साथ-साथ अपने समस्त राज्य को राम को समर्पित कीजिए और
उनके निष्ठुर बाणों की अग्नि-ज्वालाओं से अपने को बचा लीजिए। अबतक हमने राज-
भोग का अनुभव किया, यही पर्याप्त है। अब हम तपोवृत्ति स्वीकार करके वनों में
विचरण करेंगे। यदि आपका अंत हो जायगा तो मैं आपके साथ अग्निमुख में गिरकर
जल भी नहीं सकती, क्योंकि मेरे पिता ने मुझे यह वर दिया है कि जरा-मृत्यु मेरा स्पर्श
नहीं करेंगी। अब मैं राज-सुख भोगना नहीं चाहती। आप इस मार्ग का त्याग कीजिए।
मेरे पिता का वर दुस्तर है। अब मुझे या तो सरमा की या जानकी की सेवा करनी
पड़ेगी।"
तब दशकंठ उस पिकवैनी को देखकर उत्कट क्रोध से कहने लगा- "हे सुंदरी,
तुम इतना दुःखी क्यों होती हो ? क्या, मेरी दशा इतनी दीन हो गई है ? पुत्र वधु,
मित्र, सेवकों का वध कराने के पश्चात्, देव-दानवों को भी भयभीत करनेवाले अपने प्रताप
को तजकर, मैं केवल अपने प्राणों की रक्षा क्यों करूँ ? इन्द्रजीत जैसे पुत्र का वध कराने
के पश्चात्, मैं जीवित क्यों रहूँ ? मैंने गरुड़, उरग, अमर तथा गंधर्वों को जीत लिया है,
पुण्यात्माओं का विनाश किया है और तपस्वियों का वध किया है। अब यदि मैं स्वयं
तपस्वी बनने जाऊँ, तो क्या सभी तपस्वी मेरा उपहास नहीं करेंगे ? इसलिए हे कमलाक्षी,
तुम्हारे ये वचन आचरण करने योग्य नहीं हैं। अब मैं किसी भी प्रकार से हो, राघवौ
का वध कर ही डालूँगा। अनुपम बल से समन्वित, मैं किसी भी दशा में सीता को नहीं
दूँगा। यदि मैं राम के बाणों से मारा जाऊँगा, तो मैं जिस वैकुंठ की इच्छा करता हूँ,
वह स्वयं मेरे समक्ष आ जायगा। हे सुंदरी, तब मुझे न तुम्हारी आवश्यकता रहेगी, न
इस लंका की। मैं अपनी इच्छित मुक्ति-पथ को प्राप्त करूँगा। मेरी मृत्यु के पश्चात्,
तुम शुभलक्षण श्री से रहित हो सूर्य-विहीन कमलिनी की भांति, शशिहीन कुमुदिनी की
युद्धकांड ४३५
भाँति रहना ।" यह सुनकर मदोदरी लज्जा से अभिभूत हो प्रत्युत्तर देने से भयभीत होती
हुई चुप हो गई ।
१३७. रावण का तृतीय युद्ध के लिए प्रस्थान
उसके पश्चात्, रावण अत्यधिक उत्साह एवं हर्ष से युद्ध की तैयारियाँ करने लगा ।
उसने आदित्य को त्रस्त करते हुए तथा ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करते हुए रण-भेरी का निनाद
कराया और सेना को एकत्र करने के लिए भटो को भेजा । फिर, उसने अपनी विशाल
भुजाओ को रत्न, केयूर तथा कंकणो से अलंकृत किया, इद्र आदि देवताओ को जीतने के
उपलक्ष्य में स्मारक-स्वरूप एक वीर-कंकण पहना, अपने सभी करो में भयंकर चंद्रहास,
धनुष, बाण, गदा तथा चक्रो को धारण किया और अपने नेत्रो से क्रोधाग्नि की कांति
को चारो ओर व्याप्त करते हुए वाहर निकला। फिर, वह अच्छी तरह निर्मित सोलह
चक्रवाले दो करोड़ क्षुद्र घंटिकाओ के निनाद से भयोत्पादक तथा एक सहस्र घोड़े जुते हुए
रथ पर इस प्रकार आरूढ हुआ, मानो राम के शरो से मृत होकर वैकुंठ के रथ पर आरूढ
हो रहा हो । महान् बलशाली तथा रथ-कला-निपुण कालकेतु उस रथ को चलाने लगा ।
रावण के ऊपर अनेक चंद्रिका-सम उज्ज्वल छत्र तने हुए थे । रावण के श्रेष्ठ साहस का
परिचय देनेवाले, राहु के मस्तक से अंकित तीन ध्वजाएँ, आकाश का स्पर्श करती हुई ऐसे
फड़फड़ा रही थी, मानो सूर्य-मंडल एवं चंद्र-मंडल को निगलने के लिए उद्यत राहुत्रय हो ।
(सेना की) भेरी, मृदंग आदि के गंभीर निनादो से समुद्र उमडने लगे और उनके उमडने
के प्रयत्न के फलस्वरूप पृथ्वी कांप उठी । रावण के साथ ही साथ, गज, अश्व, रथ एवं बल-
शाली तथा उद्भट भटो का समूह भी निकला और सभी दिशाओ में व्याप्त हो गया ।
उस सेना के साथ ही प्रलय-काल के आदित्यो की भाँति अद्भुत शौर्य के साथ खड्गरोम,
वृश्चिकरोम, सर्परोम तथा अग्निवर्ण नामक राक्षस भी युद्ध के लिए निकल पड़े । तब
सारे समुद्र क्षुब्ध हुए, समस्त लोक भयभीत हुआ, दिग्गज धँस गये और सभी कुलपर्वत
कांप उठे ।
इस प्रकार की युद्ध-सज्जा के साथ जब रावण निकला, तब आकाश में देवता उसे
देखकर आपस में कहने लगे--"रावण जिस समय इंद्र के ऊपर आक्रमण करने के लिए
क्रोध से निकल पड़ा था, उस दिन भी उसकी युद्ध-सज्जा तथा क्रोध आज के समान नही थे ।
आज अवश्य वह अपनी सारी शक्ति के साथ लक्ष्मण से युक्त राघव पर आक्रमण
करेगा । ऐसा सोचते हुए रत्नमय विमानो में आरूढ हो सभी देवता एकटक हो रण की
गति देखने लगे । वानर-सेना-रूपी अरण्य को जलाने के लिए आनेवाले दावानल की भाँति
अत्यधिक वेग से आक्रमण करनेवाली राक्षसो की सहस्रो सेनाओ को देखकर वानर-वीरो ने
अंगद के साथ अट्टहास करते हुए बड़े उत्साह से सिंह-गर्जन किया । फिर, विशाल वृक्षो,
भारी पर्वतो तथा गिरि-शृंगो को उठाये हुए पर्वताकार वानर-सैनिको ने राक्षस-सेना पर
इस प्रकार आक्रमण किया, जैसे दक्षिण समुद्र तथा उत्तर समुद्र एक दूसरे से टकरा गये हों।
तब दानवो ने क्रोध से जलते हुए दहाडो, धमकियो तथा हुंकारो के निनादो से आकाश
को भरते हुए अपने मदमत्त गजो के समूह को उनके ऊपर चलाते हुए बहुत वेग से जाने-
वाले अश्वो को, उनपर दौड़ाते हुए रथो को अवाधुध चलाते हुए, पैदल सेना से उन पर
भयकर आक्रमण कराते हुए, उनका सामना किया । फिर, उन्होने करवाल, मूसल, मुद्गर,
परशु, तोमर, शर तथा चक्रो से वानरो पर प्रहार किया और उन्हें काटा, चुभोया, रौंदा
तथा पृथ्वी पर गिराकर नाना विधि से उनका सहार किया । इस भयकर आक्रमण से
क्रुद्ध होकर वानर-वीरो ने उद्धत रण-कौगल प्रदर्शित करते हुए निकट ही रहनेवाले पर्वतो,
असख्य गिरि-शृगो, वृक्षो तथा शिलाओ को उठाकर राक्षसो पर फेंका । फिर, घोड़ो पर
कूदकर घुडसवारो को पदाघातो से नीचे गिराते भयकर रूप धरकर गज-समूहो पर पिल
पड़ते और पहाडो से उन पर प्रहार करके महावतो को मारते, और हाथियो के कुभ-स्थल
पर ऐसा प्रहार करते कि हाथी पृथ्वी पर गिर पड़ते । फिर वे अश्वो, सारथियो तथा
रथिको के साथ रथो को एकदम ऊपर उठा लेते और उसे रण-मध्य में फेंककर उसको चूर-चूर कर
देते । सारी पृथ्वी उस समय काँप उठती। इतना ही नही, वे पदचर सेना पर पर्वतो तथा
वृक्ष-समूहो से भयकर प्रहार करते, उन्हें दाँतो से काटते, हथेलियो से मारते, पैरो से कुचलते,
नखो से नोचते, पूँछो से अच्छी तरह पीटते और अपने हाथ के मुक्को से उनपर प्रहार करते ।
पनस, नील, अगद आदि प्रमुख वानर इससे संतुष्ट न होकर दुर्वार गति से आकाश
की ओर उड़कर और वहाँ से राक्षस-सेना पर पहाडो की ऐसी वर्षा करते, जैसे प्रलय के
समय बिजलियो की वर्षा होती है । इस प्रकार की शैल तथा पाषाणो की वर्षा से राक्षस-
सेना में हाथी गिरे, महावत जहाँ के तहाँ मरे, अश्व पृथ्वी पर लोटने लगे और उनपर
अश्वारोही गिरने लगे, रथ पिस गये, सारथी समाप्त हो गये, शव रौंदे गये, मास-खंड बिखर
गये, मुकुट पृथ्वी पर लोटने लगे, मस्तक फूटने लगे, रक्त की धारा बहने लगी, शरीर
छिन्न-भिन्न होने लगे, अँतडियाँ छितराने लगी और खड्ग टूटने लगे । उस समय वह रण,
विविध भोग-विलसित पर्जन्य* ( मेघ-इन्द्र ) की सपत्ति की भाँति महान् अभ्र-मातग*
( ऐरावत-श्वेत गज ) के मद से सिंचित था, अति रौद्र रुद्र-विहार ( कैलास
पर्वत-श्मशान ) की भाँति आहत गज एवं असुरो से युक्त हो पिशाचो के लिए आनद-
दायक था । अक्षीण राम-कटाक्ष के समान प्रेक्षण-दृष्ट-विभीषण* ( देखने में भयकर, देखकर
सतुष्ट विभीषण) था, कलियुगात के भयंकर काल के समान बल-रहित एव विध्वस्तधर्मा*
(धर्म-भ्रष्ट, नीति-भ्रष्ट) था, रात्रि के उपरात विकसित कमलिनी * (सरोवर-कमलिनी)
की भाँति शिलीमुखो* ( बाण-भ्रमर ) से आश्रित पुण्डरीक * (कमल-श्वेतच्छत्र) समूह के
समान था, उदार व्यक्ति के सुदर एव शुभप्रद सदन की भाँति आरक्त * ( अनुरक्त, रक्त
से सीचे), मार्गणो * ( बाण-याचक ) से परिपूर्ण था, शाश्वत-पुण्यमूल नदी के पति
(समुद्र) की भाँति हरि-शक्ति-निर्मथित * (सांप से मथित, वानरो से मथित) हो भयकर
दीखता था और निर्मल वेद-विहित यज्ञ की भाँति देव-लोक के चित्त को प्रसन्न करनेवाला था ।
ऐसे भयकर रण में रक्त-सिक्त हो, अँतड़ियाँ-रूपी प्रवालसमूह, रथ-रूपी नावें,
टूटकर गिरे हुए रथ-चक्र-रूपी कच्छप-समूह, शव-रूपी मगर, कटकर गिरी हुई भुजाएँ-रूपी
साँप, आयुधो का चूर्ण-रूपी रेत, गज-समूह-रूपी विशाल पर्वत, दष्ट्र-रूपी तिमि-तिमिगल,
*चिह्नित शब्द श्लिष्ट हैं।—ले०
युद्धकांड ४३७
बृहत्काय अश्व-समूह-रूपी चल एव उत्तुग तरंगें, विविध अश्वो की लार-रूपी उज्ज्वल फेन,
धवल आतपत्र-रूपी हस, असख्य मुकुटो की प्रभा-रूपी वाडवाग्नि-शिखाएँ, बिखरे हुए मास-
खड-रूपी मणियाँ, सतुष्ट निशाचर, प्रेत एव वैतालो का अट्टहास-रूपी भयकर घोष, रघुराम-
चद्र-रूपी चद्र, उनकी हास्य-द्युति-रूपी चद्रिका से युक्त हो रक्तसमुद्र-रूपी समुद्र, उमड
रहा था ।
१३८. वानरों के द्वारा खड्गरोम आदि राक्षसों का वध
तब हनुमान् को असुरेंद्र पर आक्रमण करने के लिए उद्यत होते देखकर पर्वताकार-
वाला अनुपम साहसी, रुचिर खड्ग से सपन्न, खड्गरोम क्रुद्ध हुआ और कहने लगा—'हे
पवनकुमार, उधर कहाँ जा रहे हो ? उधर जाने की क्या आवश्यकता है ? मै तो यहाँ
हूँ ही, इधर आओ।' यह सुनकर पवनपुत्र उसपर कूद पडा और उसके शरीर के रोमो
के पैने खड्ग धाराओ में डूब-सा गया । किंतु किसी तरह वह उनसे बाहर निकला और
भयंकर रूप धारण करके अपनी उन्नत शक्ति को प्रकट करते हुए, कुलपर्वत की समता
करनेवाले एक विशाल पर्वत को उठाकर भयंकर गर्जन करके उसे उस राक्षस पर ऐसा
फेंका कि पृथ्वी काँप उठी । किंतु उसने अपने रोम-खड्ग की धाराओ से उसको खडित
कर दिया और वानर-सेना को काटते हुए हनुमान् पर आक्रमण किया । तब हनुमान् ने
एक विशाल पर्वत को उठाकर उस राक्षस-वीर पर ऐसा प्रहार किया कि वह वज्र के
आघात से आहत शैल की भाँति गिर पडा ।
तब सर्परोम ने भयंकर सर्प की भाँति क्रुद्ध हो, बडे दर्प से अगद पर आक्रमण
किया और अपने रोम-सर्प के समूह से उसे पीडित किया । तब अगद ने प्रलय-काल के
यम की भाँति जलते हुए उस राक्षस पर अपनी हथेली से ऐसा प्रहार किया कि उसका
सिर फूट गया और रक्त की धाराएँ बहने लगीं । फिर भी, रोषाग्नि उगलते हुए उस
राक्षस ने भयंकर रूप धारण करके अगद के अगो पर अपने रोम-सर्पों से आघात किया ।
तब अगद ने अत्यधिक क्रोध से उस राक्षस के सिर पर अपनी भयंकर मुष्टि से प्रहार
किया और उसे नीचे गिराकर पैरो से रौंदते हुए उसका सिर तोडकर फेंक दिया ।
तब वृश्चिकरोम ने भीषण रण-कुशल नील पर आक्रमण किया और विष-ज्वालाओ
को उगलनेवाले अपने रोम-वृश्चिको के प्रयोग से नील को अत्यधिक पीडा पहुँचाई । इसको
सहने में असमर्थ होकर नील ने उस दानव की परवाह किये बिना एक विशाल शाल-वृक्ष
को उसपर फेंका । तब उस राक्षस ने अपने विष-भरे रोम-कटको से उम वृक्ष को तोड
डाला । यह देखकर नील ने क्रोधातुर हो, अपने भयंकर बाहुबल का प्रदर्शन करते हुए
असख्य शाखाओ से युक्त एक विशाल वृक्ष को उखाडा और उसने उम राक्षस के वक्ष स्थल
पर ऐसा प्रहार किया कि उसके प्राण जाते रहे । सभी देवता हर्ष से फूल उठे ।
उसके पश्चात् शत्रुभाजक एव अकुंठित पराक्रमी अग्निवर्ण ने प्रचड क्रोध से विशाल
वनो को दुर्वार गति से जलानेवाली दावाग्नि के समान अपने अगो में अगणित अग्नि-
शिखाओ को दीप्त करके वानर-सैनिको को जलाकर भस्म करते हुए आगे बढा । राम ने
उसे क्रोधपूर्ण दृष्टि से देखा, वानर-वीरो का पराभव होते भी देखा, करुणाद्रचित्त
४३८ रंगनाथ रामायण
होने के कारण वे उसके अत्याचारो को सहन न कर सके, किंतु उसकी भयंकरता को देखकर
सिर कँपाते हुए विभीषण से कहने लगे--'हे विभीषण, मै अनुमान नही कर पा रहा हूँ
कि यह कौन आ रहा है । पता नही कि रावण की आज्ञा से स्वय अग्निदेव युद्ध करने
के लिए आ रहे है या कोई राक्षस-वीर ही आ रहा है । यह कौन है ? इसका परिचय
मुझे दो ।'
तब विभीषण ने कहा--'हे देव, यह अग्निवर्ण है । यह अपने शरीर से अग्नि-
ज्वालाओ को प्रज्वलित करके पर्वतो को भी भस्म कर सकता है, यह अखड वीर एव महान्
घमंडी है ।' यह सुनकर राम आश्चर्यचकित हुए । फिर भी, उसके भयंकर औद्धत्य को
देखकर उन्होने उस पर वारुणास्त्र चलाया । तब उस अस्त्र ने समस्त आकाश को घने बादलो
से आच्छादित कर दिया और अविराम गति से वर्षा करके उस राक्षस के द्वारा प्रज्वलित
अग्नि-ज्वालाओ को बुझाकर भयकर ध्वनि के साथ उस राक्षस का वध कर डाला ।
युद्ध में अग्निवर्ण को इस प्रकार गिरते हुए देखकर, रावण ने आँखो से अग्निवर्षा
करते हुए, प्रलय-काल के सूर्य की भाँति जलती हुई दृष्टियो से राम को देखकर कहा-'हे
राम, क्या तुम मुझे नही पहचानते ? अपने निष्ठुर वज्र की दुर्वार धारा से कुलपर्वतो
को खंडित करनेवाले इद्र भी यदि वडी उद्धतता से अपने देवताओ के साथ युद्ध में मेरा
सामना करे, तो मै उसे भी परास्त कर दूंगा । तब, मै तुम्हारी क्या परवाह करूँगा ?
क्या, तुम्हारे जैसे क्षुद्र प्राणियो का प्रयत्न मुझे परास्त कर सकेगा ? अब तुम अपनी शूरता प्रकट
करो और अत तक मेरा सामना करते रहो । मैं अपने शस्त्रास्त्रो से तुम्हें गिरा दूंगा और
तुम्हें अपनी शक्ति का परिचय दूंगा ।'
रघुराम उस दुरात्मा का प्रलाप सुनकर हँस पडे और मत्त सिंधुर (हाथी) के चिंघाड
सुननेवाले सिंधुरांतक मत्त सिंह की भाँति चुप हो रहे । तब रामानुज ने क्रुद्ध होकर रावण पर
आक्रमण किया और उस पर भयंकर बाण चलाने लगे । तब रावण ने उन शरो को सहज ही खडित
कर दिया और उनकी परवाह किये बिना भानु पर आक्रमण करने के लिए आनेवाले स्वर्भानु
(राहु) के समान भानुवंशाधीश (राम) पर आक्रमण करके दारुण वज्रधर की समता करनेवाले
बाणो से उन्हें ढक दिया । तब राम ने क्रोधोन्मत्त हो, अगारो को उगलनेवाले निष्ठुर अस्त्रो को
उस राक्षस पर चलाया । तब रावण उन बाणो का सामना करने के लिए युद्ध-भूमि के
मध्य आया ।
१३९. इंद्र का मातलि के द्वारा राम को रथ भेजना
तब इद्र ने राम को देखकर मातलि से कहा--'देवताओ के हित के लिए ही
राघव राक्षसो से घोर युद्ध कर रहे है । किंतु वे पदाति हो पृथ्वी पर खडे है और राक्षस
रथ पर आरूढ है । ये लोकोन्नत (राम) दुखो से पीडित हो उस कुमार्गी के सामने नीचे
खडे है । वेद-पल्लवो पर विहरण करनेवाले, सुखी तथा सपन्न व्यक्ति आज कठोर रणभूमि
पर खडे है । कमला के मन-रूपी रथ पर अत्युन्नत सुख-राशि में डोलनेवाले आज
पृथ्वी पर खडे है । अत, हे मातलि, तुम शीघ्र उनके लिए दिव्य रथ पृथ्वी
पर ले जाओ ।
युद्धकांड ४३६
तब वायु तथा मन के वेग से जानेवाले अश्वो से युक्त कनक-दंडो में बँधी हुई
पताकाओ से विलसित, महनीय कांतियुक्त मणि-समूहो से जटित, बालसूर्य के समान दीप्त
होनेवाले रथ को लिये हुए मातलि पृथ्वी पर उतर आया और राम के समक्ष खडे होकर
हाथ जोडे हुए राम से निवेदन किया--'हे देव, हे राघव-भूपाल, हे समस्त देवताओ के
आराध्य, हे भक्त-जन-साध्य, इंद्र ने आपके लिए शर, चाप, कवच आदि से युक्त दिव्य
रथ भेजा है । अब आप कौशिक की आज्ञा के अनुसार इस वज्र-कवच को धारण कीजिए
और इस दिव्य रथ पर आरूढ होकर इन आयुधो से उस दुर्मदाध राक्षस का सामना करके
उसपर विजय प्राप्त कीजिए । पूर्वकाल में मेरे सारथी के रूप में रहते हुए इन्द्र ने समस्त
दानवो को जीत लिया था ।' तब राम ने विभीषण से परामर्श करने के पश्चात् उस रथ
की परिक्रमा की और अपने शरीर की उज्ज्वल कांति को चौदहो भुवनो में आकाश तक
व्याप्त हुए वानरो के जय-निनादो के बीच, उस रथ पर ऐसे आरूढ हुए, जैसे कमल-बंधु
(सूर्य) उदयाद्रि पर आरूढ होता है । उस समय समस्त आकाश हिलने लगा और शरत्-
कालीन मेघ एव सध्या के मेघो की समता करनेवाले गरुड, उरग तथा देवताओ के विमानो
से सारा आकाश भर गया । इस दृश्य को देखने के लिए एकत्र सुर, खेचर तथा किन्नर
अत्यत हर्ष तथा भय से अभिभूत हो कहने लगे--'राम-रावण का यह द्वंद्व दो पर्वतो का
द्वंद्व है । ये समुद्रयुगल है, पावकद्वय है, आकाशद्वय हैं । आज ये दोनो आपस में भिड
रहे हैं । यह समान जोडी है । न जाने क्या होगा ।' विजय की आकाक्षा एव विजय की
उत्कट अभिलाषा से राम तथा रावण एक दूसरे से भिड गये । तब समस्त जग कपित हुआ,
पहाड प्रकपित हुए, दोनो ओर की सेनाएँ आकपित हुई, उनकी दृष्टि-रूपी वज्रपात से
बिजलियाँ पिसकर आकाश में बिखर गई, दोनो पक्षो की सेनाओ के सिंहनाद से स्वर्ग
आदि लोक क्षुब्ध हो उठे । वे दोनो प्रवीण धनुर्धर, अन्योन्य विजय की इच्छा रखते हुए
अपने रथो को विविध रीतियो से चलाते हुए, सूर्य तथा अग्नि-सम प्रचड, वज्र के समान
तीक्ष्ण शरो को करो, कठो, पाश्वों, स्कंधो, वक्षो, ललाटो, जाँघो तथा पसलियो पर
चलाकर एक दूसरे को पीडित करने लगे । वे दोनो आपस में भिडते, एक दूसरे पर रोव
जमाते, वाणो से युद्ध करते । उस समय उनकी चाल-ढाल, पराक्रम एव साहस देखकर
आश्चर्य होता था । वे दोनो सफल पराक्रमी वीर जब एक ही समय में वाण चलाने
लगते, तब यह जानना असभव हो जाता कि कब वे तरकस में रखे तीरो को निकालने
के लिए अपने हाथ फैलाते, कब शरो को धनुष पर चढाते, कब धनुष की प्रत्यचा खींचते,
कब लक्ष्य साधते और वाण छोडते । उन दोनो के द्वारा वेग से चलाये जानेवाले भयकर
वाणो को गिनना तो असभव ही हो गया, किंतु यह कहना भी असत्य नही है कि उनके बाण
प्रचंड कोदण्ड-रूपी रवि-मडल से निकलनेवाले चचल किरणो के समान एक के पीछे एक
चलते थे । धनुर्विद्या में पारगत तथा अक्षय तूणीरो से सपन्न वे दोनों वीर एक शर के
पीछे दस शर, दम के बदले सौ शर, सौ के बदले सहस्र शर, सहस्र के बदले दस सहस्र
शर, दम सहस्र के बदले एक लाख शर, एक लाख के बदले एक करोड प्रतिशर चलाने थे
और सभी शर एक ही समय में राम-रावण पर लग जाते थे ।