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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 467, कुल 508 में से

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पृष्ठ 467

युद्धकांड ४३७
बृहत्काय अश्व-समूह-रूपी चल एव उत्तुग तरंगें, विविध अश्वो की लार-रूपी उज्ज्वल फेन,
धवल आतपत्र-रूपी हस, असख्य मुकुटो की प्रभा-रूपी वाडवाग्नि-शिखाएँ, बिखरे हुए मास-
खड-रूपी मणियाँ, सतुष्ट निशाचर, प्रेत एव वैतालो का अट्टहास-रूपी भयकर घोष, रघुराम-
चद्र-रूपी चद्र, उनकी हास्य-द्युति-रूपी चद्रिका से युक्त हो रक्तसमुद्र-रूपी समुद्र, उमड
रहा था ।
१३८. वानरों के द्वारा खड्गरोम आदि राक्षसों का वध
तब हनुमान् को असुरेंद्र पर आक्रमण करने के लिए उद्यत होते देखकर पर्वताकार-
वाला अनुपम साहसी, रुचिर खड्ग से सपन्न, खड्गरोम क्रुद्ध हुआ और कहने लगा—'हे
पवनकुमार, उधर कहाँ जा रहे हो ? उधर जाने की क्या आवश्यकता है ? मै तो यहाँ
हूँ ही, इधर आओ।' यह सुनकर पवनपुत्र उसपर कूद पडा और उसके शरीर के रोमो
के पैने खड्ग धाराओ में डूब-सा गया । किंतु किसी तरह वह उनसे बाहर निकला और
भयंकर रूप धारण करके अपनी उन्नत शक्ति को प्रकट करते हुए, कुलपर्वत की समता
करनेवाले एक विशाल पर्वत को उठाकर भयंकर गर्जन करके उसे उस राक्षस पर ऐसा
फेंका कि पृथ्वी काँप उठी । किंतु उसने अपने रोम-खड्ग की धाराओ से उसको खडित
कर दिया और वानर-सेना को काटते हुए हनुमान् पर आक्रमण किया । तब हनुमान् ने
एक विशाल पर्वत को उठाकर उस राक्षस-वीर पर ऐसा प्रहार किया कि वह वज्र के
आघात से आहत शैल की भाँति गिर पडा ।
तब सर्परोम ने भयंकर सर्प की भाँति क्रुद्ध हो, बडे दर्प से अगद पर आक्रमण
किया और अपने रोम-सर्प के समूह से उसे पीडित किया । तब अगद ने प्रलय-काल के
यम की भाँति जलते हुए उस राक्षस पर अपनी हथेली से ऐसा प्रहार किया कि उसका
सिर फूट गया और रक्त की धाराएँ बहने लगीं । फिर भी, रोषाग्नि उगलते हुए उस
राक्षस ने भयंकर रूप धारण करके अगद के अगो पर अपने रोम-सर्पों से आघात किया ।
तब अगद ने अत्यधिक क्रोध से उस राक्षस के सिर पर अपनी भयंकर मुष्टि से प्रहार
किया और उसे नीचे गिराकर पैरो से रौंदते हुए उसका सिर तोडकर फेंक दिया ।
तब वृश्चिकरोम ने भीषण रण-कुशल नील पर आक्रमण किया और विष-ज्वालाओ
को उगलनेवाले अपने रोम-वृश्चिको के प्रयोग से नील को अत्यधिक पीडा पहुँचाई । इसको
सहने में असमर्थ होकर नील ने उस दानव की परवाह किये बिना एक विशाल शाल-वृक्ष
को उसपर फेंका । तब उस राक्षस ने अपने विष-भरे रोम-कटको से उम वृक्ष को तोड
डाला । यह देखकर नील ने क्रोधातुर हो, अपने भयंकर बाहुबल का प्रदर्शन करते हुए
असख्य शाखाओ से युक्त एक विशाल वृक्ष को उखाडा और उसने उम राक्षस के वक्ष स्थल
पर ऐसा प्रहार किया कि उसके प्राण जाते रहे । सभी देवता हर्ष से फूल उठे ।
उसके पश्चात् शत्रुभाजक एव अकुंठित पराक्रमी अग्निवर्ण ने प्रचड क्रोध से विशाल
वनो को दुर्वार गति से जलानेवाली दावाग्नि के समान अपने अगो में अगणित अग्नि-
शिखाओ को दीप्त करके वानर-सैनिको को जलाकर भस्म करते हुए आगे बढा । राम ने
उसे क्रोधपूर्ण दृष्टि से देखा, वानर-वीरो का पराभव होते भी देखा, करुणाद्रचित्त