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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 469, कुल 508 में से

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पृष्ठ 469

युद्धकांड ४३६
तब वायु तथा मन के वेग से जानेवाले अश्वो से युक्त कनक-दंडो में बँधी हुई
पताकाओ से विलसित, महनीय कांतियुक्त मणि-समूहो से जटित, बालसूर्य के समान दीप्त
होनेवाले रथ को लिये हुए मातलि पृथ्वी पर उतर आया और राम के समक्ष खडे होकर
हाथ जोडे हुए राम से निवेदन किया--'हे देव, हे राघव-भूपाल, हे समस्त देवताओ के
आराध्य, हे भक्त-जन-साध्य, इंद्र ने आपके लिए शर, चाप, कवच आदि से युक्त दिव्य
रथ भेजा है । अब आप कौशिक की आज्ञा के अनुसार इस वज्र-कवच को धारण कीजिए
और इस दिव्य रथ पर आरूढ होकर इन आयुधो से उस दुर्मदाध राक्षस का सामना करके
उसपर विजय प्राप्त कीजिए । पूर्वकाल में मेरे सारथी के रूप में रहते हुए इन्द्र ने समस्त
दानवो को जीत लिया था ।' तब राम ने विभीषण से परामर्श करने के पश्चात् उस रथ
की परिक्रमा की और अपने शरीर की उज्ज्वल कांति को चौदहो भुवनो में आकाश तक
व्याप्त हुए वानरो के जय-निनादो के बीच, उस रथ पर ऐसे आरूढ हुए, जैसे कमल-बंधु
(सूर्य) उदयाद्रि पर आरूढ होता है । उस समय समस्त आकाश हिलने लगा और शरत्-
कालीन मेघ एव सध्या के मेघो की समता करनेवाले गरुड, उरग तथा देवताओ के विमानो
से सारा आकाश भर गया । इस दृश्य को देखने के लिए एकत्र सुर, खेचर तथा किन्नर
अत्यत हर्ष तथा भय से अभिभूत हो कहने लगे--'राम-रावण का यह द्वंद्व दो पर्वतो का
द्वंद्व है । ये समुद्रयुगल है, पावकद्वय है, आकाशद्वय हैं । आज ये दोनो आपस में भिड
रहे हैं । यह समान जोडी है । न जाने क्या होगा ।' विजय की आकाक्षा एव विजय की
उत्कट अभिलाषा से राम तथा रावण एक दूसरे से भिड गये । तब समस्त जग कपित हुआ,
पहाड प्रकपित हुए, दोनो ओर की सेनाएँ आकपित हुई, उनकी दृष्टि-रूपी वज्रपात से
बिजलियाँ पिसकर आकाश में बिखर गई, दोनो पक्षो की सेनाओ के सिंहनाद से स्वर्ग
आदि लोक क्षुब्ध हो उठे । वे दोनो प्रवीण धनुर्धर, अन्योन्य विजय की इच्छा रखते हुए
अपने रथो को विविध रीतियो से चलाते हुए, सूर्य तथा अग्नि-सम प्रचड, वज्र के समान
तीक्ष्ण शरो को करो, कठो, पाश्वों, स्कंधो, वक्षो, ललाटो, जाँघो तथा पसलियो पर
चलाकर एक दूसरे को पीडित करने लगे । वे दोनो आपस में भिडते, एक दूसरे पर रोव
जमाते, वाणो से युद्ध करते । उस समय उनकी चाल-ढाल, पराक्रम एव साहस देखकर
आश्चर्य होता था । वे दोनो सफल पराक्रमी वीर जब एक ही समय में वाण चलाने
लगते, तब यह जानना असभव हो जाता कि कब वे तरकस में रखे तीरो को निकालने
के लिए अपने हाथ फैलाते, कब शरो को धनुष पर चढाते, कब धनुष की प्रत्यचा खींचते,
कब लक्ष्य साधते और वाण छोडते । उन दोनो के द्वारा वेग से चलाये जानेवाले भयकर
वाणो को गिनना तो असभव ही हो गया, किंतु यह कहना भी असत्य नही है कि उनके बाण
प्रचंड कोदण्ड-रूपी रवि-मडल से निकलनेवाले चचल किरणो के समान एक के पीछे एक
चलते थे । धनुर्विद्या में पारगत तथा अक्षय तूणीरो से सपन्न वे दोनों वीर एक शर के
पीछे दस शर, दम के बदले सौ शर, सौ के बदले सहस्र शर, सहस्र के बदले दस सहस्र
शर, दम सहस्र के बदले एक लाख शर, एक लाख के बदले एक करोड प्रतिशर चलाने थे
और सभी शर एक ही समय में राम-रावण पर लग जाते थे ।