रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 466, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंवाले अश्वो को, उनपर दौड़ाते हुए रथो को अवाधुध चलाते हुए, पैदल सेना से उन पर
भयकर आक्रमण कराते हुए, उनका सामना किया । फिर, उन्होने करवाल, मूसल, मुद्गर,
परशु, तोमर, शर तथा चक्रो से वानरो पर प्रहार किया और उन्हें काटा, चुभोया, रौंदा
तथा पृथ्वी पर गिराकर नाना विधि से उनका सहार किया । इस भयकर आक्रमण से
क्रुद्ध होकर वानर-वीरो ने उद्धत रण-कौगल प्रदर्शित करते हुए निकट ही रहनेवाले पर्वतो,
असख्य गिरि-शृगो, वृक्षो तथा शिलाओ को उठाकर राक्षसो पर फेंका । फिर, घोड़ो पर
कूदकर घुडसवारो को पदाघातो से नीचे गिराते भयकर रूप धरकर गज-समूहो पर पिल
पड़ते और पहाडो से उन पर प्रहार करके महावतो को मारते, और हाथियो के कुभ-स्थल
पर ऐसा प्रहार करते कि हाथी पृथ्वी पर गिर पड़ते । फिर वे अश्वो, सारथियो तथा
रथिको के साथ रथो को एकदम ऊपर उठा लेते और उसे रण-मध्य में फेंककर उसको चूर-चूर कर
देते । सारी पृथ्वी उस समय काँप उठती। इतना ही नही, वे पदचर सेना पर पर्वतो तथा
वृक्ष-समूहो से भयकर प्रहार करते, उन्हें दाँतो से काटते, हथेलियो से मारते, पैरो से कुचलते,
नखो से नोचते, पूँछो से अच्छी तरह पीटते और अपने हाथ के मुक्को से उनपर प्रहार करते ।
पनस, नील, अगद आदि प्रमुख वानर इससे संतुष्ट न होकर दुर्वार गति से आकाश
की ओर उड़कर और वहाँ से राक्षस-सेना पर पहाडो की ऐसी वर्षा करते, जैसे प्रलय के
समय बिजलियो की वर्षा होती है । इस प्रकार की शैल तथा पाषाणो की वर्षा से राक्षस-
सेना में हाथी गिरे, महावत जहाँ के तहाँ मरे, अश्व पृथ्वी पर लोटने लगे और उनपर
अश्वारोही गिरने लगे, रथ पिस गये, सारथी समाप्त हो गये, शव रौंदे गये, मास-खंड बिखर
गये, मुकुट पृथ्वी पर लोटने लगे, मस्तक फूटने लगे, रक्त की धारा बहने लगी, शरीर
छिन्न-भिन्न होने लगे, अँतडियाँ छितराने लगी और खड्ग टूटने लगे । उस समय वह रण,
विविध भोग-विलसित पर्जन्य* ( मेघ-इन्द्र ) की सपत्ति की भाँति महान् अभ्र-मातग*
( ऐरावत-श्वेत गज ) के मद से सिंचित था, अति रौद्र रुद्र-विहार ( कैलास
पर्वत-श्मशान ) की भाँति आहत गज एवं असुरो से युक्त हो पिशाचो के लिए आनद-
दायक था । अक्षीण राम-कटाक्ष के समान प्रेक्षण-दृष्ट-विभीषण* ( देखने में भयकर, देखकर
सतुष्ट विभीषण) था, कलियुगात के भयंकर काल के समान बल-रहित एव विध्वस्तधर्मा*
(धर्म-भ्रष्ट, नीति-भ्रष्ट) था, रात्रि के उपरात विकसित कमलिनी * (सरोवर-कमलिनी)
की भाँति शिलीमुखो* ( बाण-भ्रमर ) से आश्रित पुण्डरीक * (कमल-श्वेतच्छत्र) समूह के
समान था, उदार व्यक्ति के सुदर एव शुभप्रद सदन की भाँति आरक्त * ( अनुरक्त, रक्त
से सीचे), मार्गणो * ( बाण-याचक ) से परिपूर्ण था, शाश्वत-पुण्यमूल नदी के पति
(समुद्र) की भाँति हरि-शक्ति-निर्मथित * (सांप से मथित, वानरो से मथित) हो भयकर
दीखता था और निर्मल वेद-विहित यज्ञ की भाँति देव-लोक के चित्त को प्रसन्न करनेवाला था ।
ऐसे भयकर रण में रक्त-सिक्त हो, अँतड़ियाँ-रूपी प्रवालसमूह, रथ-रूपी नावें,
टूटकर गिरे हुए रथ-चक्र-रूपी कच्छप-समूह, शव-रूपी मगर, कटकर गिरी हुई भुजाएँ-रूपी
साँप, आयुधो का चूर्ण-रूपी रेत, गज-समूह-रूपी विशाल पर्वत, दष्ट्र-रूपी तिमि-तिमिगल,
*चिह्नित शब्द श्लिष्ट हैं।—ले०