रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 465, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकांड ४३५
भाँति रहना ।" यह सुनकर मदोदरी लज्जा से अभिभूत हो प्रत्युत्तर देने से भयभीत होती
हुई चुप हो गई ।
१३७. रावण का तृतीय युद्ध के लिए प्रस्थान
उसके पश्चात्, रावण अत्यधिक उत्साह एवं हर्ष से युद्ध की तैयारियाँ करने लगा ।
उसने आदित्य को त्रस्त करते हुए तथा ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करते हुए रण-भेरी का निनाद
कराया और सेना को एकत्र करने के लिए भटो को भेजा । फिर, उसने अपनी विशाल
भुजाओ को रत्न, केयूर तथा कंकणो से अलंकृत किया, इद्र आदि देवताओ को जीतने के
उपलक्ष्य में स्मारक-स्वरूप एक वीर-कंकण पहना, अपने सभी करो में भयंकर चंद्रहास,
धनुष, बाण, गदा तथा चक्रो को धारण किया और अपने नेत्रो से क्रोधाग्नि की कांति
को चारो ओर व्याप्त करते हुए वाहर निकला। फिर, वह अच्छी तरह निर्मित सोलह
चक्रवाले दो करोड़ क्षुद्र घंटिकाओ के निनाद से भयोत्पादक तथा एक सहस्र घोड़े जुते हुए
रथ पर इस प्रकार आरूढ हुआ, मानो राम के शरो से मृत होकर वैकुंठ के रथ पर आरूढ
हो रहा हो । महान् बलशाली तथा रथ-कला-निपुण कालकेतु उस रथ को चलाने लगा ।
रावण के ऊपर अनेक चंद्रिका-सम उज्ज्वल छत्र तने हुए थे । रावण के श्रेष्ठ साहस का
परिचय देनेवाले, राहु के मस्तक से अंकित तीन ध्वजाएँ, आकाश का स्पर्श करती हुई ऐसे
फड़फड़ा रही थी, मानो सूर्य-मंडल एवं चंद्र-मंडल को निगलने के लिए उद्यत राहुत्रय हो ।
(सेना की) भेरी, मृदंग आदि के गंभीर निनादो से समुद्र उमडने लगे और उनके उमडने
के प्रयत्न के फलस्वरूप पृथ्वी कांप उठी । रावण के साथ ही साथ, गज, अश्व, रथ एवं बल-
शाली तथा उद्भट भटो का समूह भी निकला और सभी दिशाओ में व्याप्त हो गया ।
उस सेना के साथ ही प्रलय-काल के आदित्यो की भाँति अद्भुत शौर्य के साथ खड्गरोम,
वृश्चिकरोम, सर्परोम तथा अग्निवर्ण नामक राक्षस भी युद्ध के लिए निकल पड़े । तब
सारे समुद्र क्षुब्ध हुए, समस्त लोक भयभीत हुआ, दिग्गज धँस गये और सभी कुलपर्वत
कांप उठे ।
इस प्रकार की युद्ध-सज्जा के साथ जब रावण निकला, तब आकाश में देवता उसे
देखकर आपस में कहने लगे--"रावण जिस समय इंद्र के ऊपर आक्रमण करने के लिए
क्रोध से निकल पड़ा था, उस दिन भी उसकी युद्ध-सज्जा तथा क्रोध आज के समान नही थे ।
आज अवश्य वह अपनी सारी शक्ति के साथ लक्ष्मण से युक्त राघव पर आक्रमण
करेगा । ऐसा सोचते हुए रत्नमय विमानो में आरूढ हो सभी देवता एकटक हो रण की
गति देखने लगे । वानर-सेना-रूपी अरण्य को जलाने के लिए आनेवाले दावानल की भाँति
अत्यधिक वेग से आक्रमण करनेवाली राक्षसो की सहस्रो सेनाओ को देखकर वानर-वीरो ने
अंगद के साथ अट्टहास करते हुए बड़े उत्साह से सिंह-गर्जन किया । फिर, विशाल वृक्षो,
भारी पर्वतो तथा गिरि-शृंगो को उठाये हुए पर्वताकार वानर-सैनिको ने राक्षस-सेना पर
इस प्रकार आक्रमण किया, जैसे दक्षिण समुद्र तथा उत्तर समुद्र एक दूसरे से टकरा गये हों।
तब दानवो ने क्रोध से जलते हुए दहाडो, धमकियो तथा हुंकारो के निनादो से आकाश
को भरते हुए अपने मदमत्त गजो के समूह को उनके ऊपर चलाते हुए बहुत वेग से जाने-