रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकांड ४२७
जिसे गुरुसत्त्व-सपन्न (महान् शक्तिशाली) पवनकुमार लिये आ रहा है । सूर्य-सम
तेजस्वी पवनपुत्र की अगवानी करने के लिए आप वानर-वीरो को भेजिए ।' तब रघुराम
की आज्ञा से हनुमान् के स्वागतार्थ वानर गये ।
हनुमान् आकाश से नीचे उतर आया और उस पर्वत को पृथ्वी पर रख दिया ।
फिर, उसने रामचन्द्र के समक्ष उपस्थित होकर उन्हें हाथ जोडकर प्रणाम किया और कहा--
'हे देव, मैने द्रोणाचल पर जाकर ओषधियो के लिए बहुत ढूंढा, किन्तु उनको प्राप्त नही
कर सका, इसलिए मैं उस पर्वत को ही उठा लाया हूँ । आपकी आज्ञा प्राप्त करके यहाँ
से द्रोणाद्रि जाते समय तथा वहाँ से लौटते समय मेरे मार्ग में कई विघ्न उपस्थित हुए,
अत विलंब हो गया । इसे आप मन में नही लाइए ।' तब राम हनुमान् को देखकर बडी
प्रसन्नता से कहने लगे--'हे पवनपुत्र, भला तुम में कोई दोष हो सकता है ? तुम्हारे
कारण ही तो काकुत्स्थ-वशजो के यश तथा गौरव आज स्थिर रह पाये । अपनी अनुपम
शक्ति से तुमने आज देवताओ के लिए भी असाध्य कार्य सपन्न किया है ।'
१३२. संजीवकरणी से लक्ष्मण की मूर्च्छा का दूर होना
तब सुग्रीव ने सुषेण को देखकर कहा- 'तुम दूसरे वानरो के साथ इस पर्वत पर
चढ जाओ और आवश्यक महौषधियो को लाकर लक्ष्मण की मूर्च्छा दूर करो।' तब सुषेण
अन्य वानरो के साथ शीघ्र उस पहाड पर चढ गया । वह अपने साथियो को पर्वत पर
भिन्न-भिन्न स्थलो को दिखाकर कहता था--'यहाँ पर इन्द्र ने अमरो के साथ अमृत-पान
किया था । यहाँ पर विष्णु ने जगत् के कल्याणार्थ अपने चक्र से राहु का सिर काटा था ।'
फिर, वह उस पर्वत से आवश्यक ओषधियो का सचय करके ले आया और लक्ष्मण पर
उनका प्रयोग किया । उन ओषधियो के प्रभाव से लक्ष्मण के शरीर में गडे हुए बाण
निकल आये और लक्ष्मण की चेतना लौट आई । सभी वानर आनन्द के अतिरेक से भरे
रामचन्द्र के समक्ष आ पहुँचे ।
तब राम ने सौमित्र को हृदय से लगा लिया और आंखो से हर्ष के अश्रु बहाते
हुए समीरकुमार को देखकर कहने लगे-'हे पुण्यात्मा, आज तुमने मुझे सौमित्र का दान
दिया । तुम्हारे कारण आज मैं काकुत्स्थ-वशज कमनीय गात्रवाले लक्ष्मण को प्राप्त कर
सका । गिरे हुए मेरे भाई को पुनर्जीवित करके तुमने मेरे प्राण बचाये । मेरा यह भाई
मेरे प्राणो के समान है । तुम मेरे प्राण-बधु हो तथा परम मित्र हो । तुम्हारे द्वारा ही
यह कार्य सपन्न हो सकता था । अन्यो के द्वारा इसकी पूर्ति असम्भव थी। हे वानर-वीर,
उपकार का प्रत्युपकार करना उत्तम है। किन्तु मैं तुम्हारा कोई प्रत्युपकार नही कर सकता,
क्योकि समस्त लोको में तुम्हारे लिए कोई विपत्ति ही नही है ।' इसके पश्चात् राम ने
सुषेण की भी प्रशसा की और उसे हृदय से लगा लिया । मुषेण आनन्द से समुद्र के समान
फूल उठा । उसने राम की अनुमति से रण में गिरे हुए वानरो को पुनर्जीवित किया ।
सभी वानरो ने मन-ही-मन अत्यन्त हर्षित होते हुए राम की अनुमति पाकर उस पर्वत
के समस्त रत्नो से युक्त उज्ज्वल सानुओ तथा शृगो पर विचरण किया, विविध स्थलो
को देखा, परिपक्व फलो को छककर खाया, मधु का जी भरकर पान किया, अमृतोपम जल