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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 462, कुल 508 में से

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पृष्ठ 462

४३२ रंगनाथ रामायण
घिरे हुए चंद्र-मंडल की कांति मलिन पड़ जाती है । उसके वालो में सजे हुए सुरभित
मल्लिका-कुसुम पृथ्वी पर ऐसे गिरने लगे, मानो रावण के कीर्त्ति-कुसुम ही गंध-हीन हो
पृथ्वी पर गिर रहे हों । उसकी माँग में पिरोये हुए मोती भय एव क्रोध से ऐसे गिरने
लगे, मानो रावण की राज्य-लक्ष्मी ही सीमंत-वीथी से च्युत हो रही हो । उसके लाल
मुख-कमल के नील अलक, ऐसे विखर गये, मानो राक्षसो की लक्ष्मी के मुख-कमल के आश्रित
भ्रमर विखरकर उड़ रहे हों । उसके दोनों कर्ण-कुंडल टूटकर पृथ्वी पर ऐसे गिर पड़े,
मानो मंगलप्रद श्रेष्ठ आभूषण रावण की लक्ष्मी के कानों में रहने की इच्छा न रखने से
गिर रहे हों । उसकी आँखों से काजल से युक्त अश्रु ऐसे गिरने लगे, मानो वे दनुजेश्वर
के अपयश की धाराएँ हों । उसके मणिमय आभूषण ऐसे टूटकर गिरने लगे, मानो राक्षस-
राज के लिए अपशकुन सूचित करनेवाली महान् उल्काएँ गिर रही हों । उस रमणी के
वर्म का निर्मल आवरण-रूपी कंचुक के शिथिल होने से उसके उन्नत स्तन-कलश ऐसे
विचलित हो उठे, मानो रावण की इस लोक की तथा परलोक की उन्नति ही विचलित हो
गई हो । उसकी तनु-लता ऐसी कुचल गई, मानो देव-शत्रु रावण की गुण-लता ही कुचल
गई हो । उसकी मेखलावली का बंधन ऐसे खुल गया, मानो पवित्रात्मा राम के द्वारा
राक्षसराज के कर्म-बंधन ऐसे ही कट जायेंगे । उसके चरण-नूपुर निनाद करते हुए एक-
एक करके ऐसे छूटकर गिरने लगे, मानो प्रमद राक्षसराज-पद की सन्धियाँ चटक गई हों
और उनकी विमल कीर्त्ति खंड-खंड होकर गिर रही हो । इस प्रकार, जब अंगद क्रुद्ध होकर
मंदोदरी को राक्षसेश्वर के समक्ष घसीटकर लाने लगा, तब राक्षस-वधुएँ आर्त्तनाद करने
लगीं और कारागार में पड़ी हुई देव-स्त्रियाँ हर्षित होने लगीं ।
तब मंदोदरी शोक-संतप्त हृदय से दानवेंद्र को देखकर कहने लगी—'हे देव, इंद्र
को परास्त करनेवाली आपकी शक्ति कहाँ लुप्त हो गई ? क्या, आज चंद्रहास की धार
कुंठित हो गई ? प्रमथ-गणों से युक्त शिव के साथ कैलाश पर्वत को उठाने का आपका
दर्प कहाँ चला गया ? तीनों लोकों को आपने जीत लिया था, ऐसी शक्ति को आप क्यों
त्याग रहे हैं ? यदि मुझे त्याग कर इंद्रजीत इंद्रलोक में नहीं गया होता, तो क्या, वह
मुझे इस दशा में देखते हुए चुप रहता ? यदि मेरा पुत्र जीवित रहता, तो क्या, मैं ऐसी
नीच दुर्दशा को प्राप्त होती ? शत्रु इस प्रकार मेरा अपमान तथा उपहास कर रहे हैं
और आप देख तथा सुन रहे हैं । क्या, आप निर्लज्ज बधिर हो गये हैं ? आपका यह
हवन किस काम का ? आपकी यह निष्ठा किसलिए ? इन आहुतियों ने स्वयं आपकी
पूर्णाहुति कर दी । बुद्धिमान् होकर भी आप राम की वाणाग्नि से दग्ध हो जायेंगे । कुटिल
क्रियाओं से जब कोई प्रयोजन नहीं है । अब उन्हें त्याग दीजिए ।' इन बातों को सुनकर
दशकंठ क्रोध से भभक उठा । उसने अपने हाथ की आहुति पृथ्वी पर फेंक दी । निष्ठुर
क्रोध में उसकी भौंहें तन गईं । वह यमराज के समान भयंकर रूप धारण करके उठ
खड़ा हुआ । अपने भीषण खड्ग को खींचकर उसने अनुपम रत्नों के अंगदों से विलसित
अंगद पर प्रहार किया और अपनी पत्नी को उसके हाथों से छुड़ा लिया । तब खुली हुई
वेणी तथा उतरे हुए मुंह से दुःख प्रकट करती हुई वह दैत्य-रमणी अंतःपुर को चली गई ।