सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 463, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 463

युद्धकांड ४३३
उसके पश्चात् हनुमान् अपनी भयकर मुष्टि से दशकठ के सिर पर कठोर प्रहार
किया । इतने में वालिपुत्र सँभल गया और रावण पर कठोर प्रहार करके फिर गिर पडा ।
इस प्रहार से रावण लाल रक्त से भीगे हुए एक लाल पर्वत की भाँति दीख रहा था ।
फिर भी, उसने भयकर क्रोध के आवेश में आकर अगद पर गदा का प्रहार किया, हनुमान्
पर अपने तेज खड्ग को चलाया, नल पर शर-प्रहार करके उसको ऐसे दबा दिया, जैसे अकुश
के प्रहार से गज को झुका दिया हो, मूसल का प्रहार करके नील को दड दिया, शक्ति
के प्रयोग से शतबली का दर्प चूर कर दिया, वज्र-सम मुद्गर तथा वाणो को चलाकर
द्विविद तथा मैन्द को गिरा दिया । तब वानर-वीर आश्चर्यजनक वेग से अपनी सेना में
जा पहुँचे ।
अनिलकुमार ने राघवेश्वर के समक्ष पहुँचकर हाथ जोडकर प्रणाम किया और
कहा-'हे देव, हम दानवेंद्र का हवन भ्रष्ट करके लौट आये है।' यह सुनकर रघुराम
मन-ही-मन बहुत हर्षित हुए ।
वहाँ दैत्येंद्र शीघ्र अत पुर में गया और अपार शोकाग्नि में जलनेवाली मदोदरी
को देखकर कहने लगा, - 'हे प्रिये, विधि-विधान के सबध में मन-ही-मन ऐसे शोक करने
की क्या आवश्यकता है । आज मै युद्ध में राम का वध करूँगा । यदि इसके विपरीत
वह मेरा सहार कर डाले, तो तुम भी जानकी को मारकर शीघ्र अग्नि में प्रवेश कर
जाना ।'
१३६ रावण को मन्दोदरी का राघव की महिमा बताना
तब वह रमणी अपने पति को देखकर कहने लगी - "हे राक्षसेद्र, आप रघुराम को
युद्ध में जीत नही सकते । आप ही क्यो, देवासुर भी मिलकर उन्हें जीत नही सकते ।
आप उन्हें एक साधारण राजा मत मानिए । वे पुराण-पुरुष है । उन्होने पूर्वकाल में मत्स्या-
वतार लेकर सौमक का सहार किया और श्रुतियो का उद्धार किया था । उन्होने कमठ
का रूप लेकर मदराचल को अपनी पीठ पर धारण किया था। वराह का अवतार लेकर
उन्होने हिरण्याक्ष का सहार करके पृथ्वी का उद्धार किया था । उन्होने नृसिंह का रूप
धरकर क्रुद्ध हो नीच राक्षस का वध किया और प्रह्लाद की रक्षा की थी । वामन का
अवतार लेकर उन्होने बलि से याचना करके उसे बाँधा था । जमदग्नि के यहाँ जन्म लेकर
उन्होने महाशूर कार्त्तवीर्य का सहार किया और समस्त ससार को कश्यप ब्रह्मा को दान
में दे दिया । अपनी समस्त शक्ति को एकत्र करके, अब तुम्हारा सहार करने के निमित्त,
अपना तेज चारो ओर व्याप्त करते हुए उन्होने दशरथ का पुत्र होकर जन्म लिया है ।
उनकी महिमा तथा उनके कार्यो का वर्णन मै कैसे करूँ ? इसी राम ने अपने बाल्य-काल
में अपने महान् विक्रम तथा विशाल शक्ति का परिचय देते हुए कौशिक के यज्ञ की रक्षा
ऐसे की कि कौशिक तथा अन्य प्रमुख दिक्पाल भी उनकी प्रशसा करने लगे । फिर, उस
मुनि से उन्होने शत-सहस्रादि सख्या में दिव्यास्त्र प्राप्त किये । उन्होंने जनक को सतुष्ट
करते हुए अपनी अनुपम शक्ति का परिचय देकर शिव-धनुष का भग किया और दैव-
नियोग से वैदेही को अपनी धर्म-पत्नी के रूप में स्वीकार किया । उसी राम ने भार्गव राम
५५