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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 458, कुल 508 में से

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पृष्ठ 458

४२८ रंगनाथ रामायण
पिया, और उसके पश्चात् पर्वत से नीचे उतर आये । तब राघव ने पवनकुमार को देखकर
कहा—'इस पर्वताधीश को उसके स्थान पर फिर प्रतिष्ठित कर आओ ।'
राम की आज्ञा प्राप्त करके हनुमान् अपनी अपार शक्ति से उस पर्वत को उठाकर
आकाश-मार्ग से जाने लगा । समुद्र के मध्य में राक्षसों ने यह देख लिया और तुरन्त
रावण को इसकी सूचना दी । तब लंकेश्वर ने विजयघन, शंकुकर्ण, स्थूलजंघ, महानाद,
महावक्त्र, चतुर्वक्त्र, मेघजीत, हस्तिकर्ण, महावीर, जैत्र, उल्कामुख आदि राक्षसों को
बुलाकर कहा—'तुम लोग अपने अनुपम पराक्रम से हनुमान् का मार्ग रोककर उसे पकड़कर
ले आओ, या वह जिस पर्वत को ले जा रहा है, उसे उसके हाथ से छीनकर समुद्र में
गिरा दो । इन दोनों में किसी एक कार्य को पूरा कर सकोगे, तो मैं अपना आधा राज्य
अभी तुमको दूंगा ।'
यह सुनकर वे अपनी महाशक्तिशाली सहस्त्रों विपुल सेनाओं के साथ दानव तथा
अमरों का वेष धारण किये हुए, खड्ग, तोमर, शूल, धनुष, परशु, भाले आदि शस्त्रों
को धारण किये हुए चल पड़े । उन्होंने बड़े दर्प से गर्जन एवं हुंकार करते हुए, प्रलय-काल
के मेघ जैसे सूर्य को घेर लेते हैं, वैसे ही, हनुमान् को घेर लिया और उनका मार्ग रोककर
गर्जन करते हुए, वे दुर्मति कहने लगे—'हम देवासुरों को देखने के निमित्त (पर्वत सौंपने
के निमित्त) ही तो तुम जा रहे हो । अब इस पर्वत को लिये कहाँ जा रहे हो ?' तब
हनुमान् उनको देखकर आँखों से प्रलय-काल के अग्नि-स्फुलिंगों को विकीर्ण करते हुए काल-
चक्र के आकारवाली वज्र-सम कठोर अपनी पूँछ को भयंकर गति से घुमाते हुए उससे
उन राक्षसों पर प्रहार करने लगा । तब राक्षसों ने भी (अपने शस्त्रों से) हनुमान् को
अच्छी तरह मारा । तब हनुमान् ने कुछ राक्षसों को पद-प्रहार से मार डाला, कुछ राक्षसों
को अपनी पूँछ के आघातों से मार गिराया, अपनी भयंकर मुष्टि के आघातों से कुछ
राक्षसों का संहार किया, अपने नाखूनों से कुछ राक्षसों को चीर डाला, अपने भयंकर
गर्जन-मात्र से कुछ राक्षसों को गिरा दिया और अपनी परुष तथा उग्र दृष्टि-मात्र से कुछ राक्षसों
के प्राण हर लिये । महाशक्ति-सम्पन्न हनुमान् ने ऐसा भयंकर युद्ध करके, अपने अनुपम
पराक्रम से उन राक्षसों की सेना को इस प्रकार तितर-बितर कर दिया, जैसे सूर्य हिमशिखरों
को शीघ्र नष्ट कर देता है । इसके पश्चात् हनुमान् आकाश-मार्ग से जाने लगा, तो देवता
तथा गन्धर्व उनके बाहुबल की प्रशंसा करते हुए उसपर पुष्प-वृष्टि करने लगे । हनुमान्
अत्यधिक वेग से जाकर उस पर्वत को यथास्थान प्रतिष्ठित करके शीघ्र रघुराम के पास
लौट आया और पर्वत को लाने तथा उसको पुनः प्रतिष्ठित करने के संबंध में उनपर
बीती हुई विपत्तियों को कह सुनाया । तब राम ने बड़े हर्ष से वायु-पुत्र का आलिंगन
कर लिया ।
तदनंतर सभी कपियों ने एकत्र होकर ऐसा सिंहनाद किया कि सारी लंका व्याकुल
हो उठी । आकाश में टिमटिमानेवाले तारे एक-एक करके ऐसे लुप्त होने लगे, मानो
दशकंठ के पुण्य के चिह्न एक-एक करके लुप्त होने जा रहे हों । निदान, सूर्योदय हुआ
और दैत्यों के दारुण रोष एवं गर्वांधकार के साथ-साथ अन्धकार भी दूर हुआ । वानरों के