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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 460, कुल 508 में से

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पृष्ठ 460

साथ हवन-कर्म के लिए अनुरूप रक्त वस्त्र, रक्त माल्य तथा रक्त चंदन धारण किया;
दक्षिण दिशा में सिद्ध की हुई होम-वेदी की चंदन-पुष्पों से अर्चना की, अग्नि को
प्रतिष्ठित किया, विधिवत् होम-मंत्रों का उच्चारण करते हुए, पैने अस्त्रों को परिधि के रूप
में सजाया; पीपल और भिलावा आदि समिधाओं को बार-बार जलाया; सरसों, दूर्वा,
खील, गुग्गुल, अगरु, घी, मधु, ताड़ी, खून, दही, परमान्न, दर्भ, प्रवाल, भेड, मछली, गीध,
वराह आदि की बलि क्रमण देते हुए उस महावेदी के समक्ष निश्चल ध्यान में मग्न
रहा ।
उस समय उस गुफा से भयकर धुएँ का समूह, पवन के सघात से बिजलियो को
गिराते हुए समस्त आकाश में ऐसा व्याप्त होने लगा, मानो रावण के सभी पाप एकत्र
होकर आकाश की ओर उठ रहे हों । यह देखकर देवता त्रस्त हुए, मुनि भयभीत हुए,
दिक्पाल संभ्रमित हुए और वानर भय-विह्वल हुए । उस धुएँ को देखकर विभीषण ने
राम से कहा—'हे देव, रण में आपका सामना करके, आपके समक्ष खड़े रहने में अपने को
असमर्थ पाकर रावण कपट-कर्म के द्वारा आप पर विजय प्राप्त करने के निमित्त हवन कर
रहा है । वह देखिए, हवन-कुंड से निकलनेवाला धुआँ समस्त आकाश में व्याप्त हो रहा है।
यदि इसकी इच्छा के अनुसार हवन निर्विघ्न समाप्त हुआ, तो लोक-भयंकर रावण को
जीतना देवासुरों के लिए भी असंभव हो जायगा । अतः, इस हवन में विघ्न डालना ही
चाहिए । इसके लिए आप शीघ्र वानर-वीरों को भेजिए ।
उसकी मंत्रणा स्वीकार करके राम ने वानर-वीरों को (हवन में विघ्न डालने के
लिए) भेजा । तब असमान बलवान् गवाक्ष, तार, शरभ, क्रथन, शतबली, नल, गवय, मैन्द,
गंधमादन, हनुमान्, पनस, अंगद, कुमुद, ज्योतिर्मुख, गोमुख आदि दस करोड उद्भट
रण-विक्रमी तथा प्रतापी वानर अत्यधिक क्रोध से आकाश-मार्ग से लंका में पहुँच गये ।
अपने हुंकारों तथा पदाघातो से पृथ्वी को विदीर्ण करते हुए, दिग्गजों को कुचलते हुए,
आकाश को कंपित करते हुए, उन साहसी तथा उत्साही वीरों ने प्रचंड गति से राक्षसों
पर आक्रमण किया और नगर की रक्षा करनेवाले कई बलवान् राक्षसों को छिन्न-भिन्न
कर दिया और द्वारपालों को क्रूरता से मार डाला; अपनी विशाल शक्ति से द्वारों को
चूर-चूर कर दिया और अत्यंत शीघ्रता से नगर में प्रवेश किया । कुछ पर्वताकार वानर तुरंत
दशानन का अन्वेषण करने लगे; कुछ रथशालाओं में प्रवेश करके रथों को चूर-चूर करने
लगे; कुछ गजशालाओं में जाकर अपने मुष्टि-घातों से गजों के सिर फोड़ने लगे, कुछ
अश्वशालाओं में पहुँचकर अपने भयंकर नखों से घोड़ों के शरीर चीरने लगे, कुछ वानर
घोड़ों (झूलकों) को नष्ट-भ्रष्ट करने लगे, कुछ शस्त्रागारों में पहुँचकर शस्त्रास्त्रों को खंडित
करने लगे, कुछ भाडार-घरों में पहुँचकर वहाँ की चीजों को बाहर फेंकने लगे । दूसरी
ओर कुछ वानर अपनी प्रचंड शक्ति से झूलते हुए तोरणों को तोड़ते थे, स्वर्ण-कलशों
तथा स्वर्ण-हर्म्यों को पृथ्वी पर गिरा देते थे, कुछ वानर राक्षसों को यंत्रणा देते हुए
कहते थे—'उस जगत्-द्रोही (रावण) को बाँधकर लाओ, कुछ वानर घरों में घुसकर,
राक्षसों को उनकी पत्नियों तथा सुतों के हाहाकार के बीच बाहर खींचकर लाते थे और