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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 464, कुल 508 में से

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पृष्ठ 464

४३४ रंगनाथ रामायण
का गर्व-भंग करके अपने बाहुबल का परिचय दिया। अपने पिता की आज्ञा से वे मुनि-
वृत्ति स्वीकार करके वनवास करने आये हैं। उन्होंने अपनी प्रशंसनीय शक्ति से विराध
का वध किया, शूर्पणखा को दंड दिया और अपने चरण-स्पर्श से दण्डक वन की भूमि को
पुण्यभूमि बना दिया। उन्होंने खर, दूषण आदि वीर राक्षसों को उनके चौदह सहस्र सैनिकों
के साथ मार डाला, मारीच का संहार किया और भयंकर आकारवाले कबंध का वध
किया। जिस वालि ने आपके पौरुष को कुंठित करके, अपनी पूँछ से आपको बाँधकर
चारों समुद्रों में डुबोकर अपनी अनुपम शक्ति का परिचय दिया था, उसे एक ही बाण से
गिराकर, सुग्रीव का राजतिलक कर दिया। अपने बाणों की अग्नि-ज्वालाओं से समुद्र को
सुखा दिया। युद्धभूमि में कुंभकर्ण का संहार किया। इतना ही नहीं, लक्ष्मण ने युद्ध में
अतिकाय तथा इंद्रजीत का वध किया। राम भूपाल कदाचित् ही कभी क्रोध करते हैं।
यदि वे क्रुद्ध हो जायँ, तो इंद्रादि देवता भी उनके समक्ष खड़े नहीं रह सकते। हे दैत्यनाथ,
ऐसे वसुधेश्वर की पत्नी को धोखे से ले आना क्या, आपको उचित था ? क्या आप राम
के नित्यसत्त्व को नहीं जानते ? क्या, आप उनकी महिमा से परिचित नहीं हैं ? न जाने
किस पाप का फल है कि राम की शक्ति की श्रेष्ठता आपको सूझती नहीं है। हे देव,
अब भी आप जानकी के साथ-साथ अपने समस्त राज्य को राम को समर्पित कीजिए और
उनके निष्ठुर बाणों की अग्नि-ज्वालाओं से अपने को बचा लीजिए। अबतक हमने राज-
भोग का अनुभव किया, यही पर्याप्त है। अब हम तपोवृत्ति स्वीकार करके वनों में
विचरण करेंगे। यदि आपका अंत हो जायगा तो मैं आपके साथ अग्निमुख में गिरकर
जल भी नहीं सकती, क्योंकि मेरे पिता ने मुझे यह वर दिया है कि जरा-मृत्यु मेरा स्पर्श
नहीं करेंगी। अब मैं राज-सुख भोगना नहीं चाहती। आप इस मार्ग का त्याग कीजिए।
मेरे पिता का वर दुस्तर है। अब मुझे या तो सरमा की या जानकी की सेवा करनी
पड़ेगी।"
तब दशकंठ उस पिकवैनी को देखकर उत्कट क्रोध से कहने लगा- "हे सुंदरी,
तुम इतना दुःखी क्यों होती हो ? क्या, मेरी दशा इतनी दीन हो गई है ? पुत्र वधु,
मित्र, सेवकों का वध कराने के पश्चात्, देव-दानवों को भी भयभीत करनेवाले अपने प्रताप
को तजकर, मैं केवल अपने प्राणों की रक्षा क्यों करूँ ? इन्द्रजीत जैसे पुत्र का वध कराने
के पश्चात्, मैं जीवित क्यों रहूँ ? मैंने गरुड़, उरग, अमर तथा गंधर्वों को जीत लिया है,
पुण्यात्माओं का विनाश किया है और तपस्वियों का वध किया है। अब यदि मैं स्वयं
तपस्वी बनने जाऊँ, तो क्या सभी तपस्वी मेरा उपहास नहीं करेंगे ? इसलिए हे कमलाक्षी,
तुम्हारे ये वचन आचरण करने योग्य नहीं हैं। अब मैं किसी भी प्रकार से हो, राघवौ
का वध कर ही डालूँगा। अनुपम बल से समन्वित, मैं किसी भी दशा में सीता को नहीं
दूँगा। यदि मैं राम के बाणों से मारा जाऊँगा, तो मैं जिस वैकुंठ की इच्छा करता हूँ,
वह स्वयं मेरे समक्ष आ जायगा। हे सुंदरी, तब मुझे न तुम्हारी आवश्यकता रहेगी, न
इस लंका की। मैं अपनी इच्छित मुक्ति-पथ को प्राप्त करूँगा। मेरी मृत्यु के पश्चात्,
तुम शुभलक्षण श्री से रहित हो सूर्य-विहीन कमलिनी की भांति, शशिहीन कुमुदिनी की