रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 456, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें४२६ रंगनाथ रामायण
गिर पड़े । फिर अधीर होकर कहने लगे- "हे लक्ष्मण, तुम मुझे भाई कहकर कर्व पुकारोगे ?
तुम सीता को सुमित्रा की भाँति, मुझे महाराज दशरथ की भाँति और इस घनघोर कानन
को अयोध्या के समान मानते थे । पुष्प-शय्या पर लिटाने योग्य अपने शरीर को आज
तुम पत्थरो पर कैसे लिटा सके ? हे राजकुमार साधना की समाप्ति पर ही निद्रा उचित है।
ऐसा सोचकर तुमने चौदह वर्षों तक निद्रा का त्याग कर दिया और वन में मेरी
रक्षा करते रहे । आज युद्ध में शत्रुओ का सहार किये बिना ही तुम सो रहे हो, क्या,
यह तुम्हारे लिए उचित है ? यदि तुम इस प्रकार पडे रहो, तो तुम्हारा अग्रज भी दीर्घ-
निद्रा (मृत्यु) को प्राप्त होगा । तुम सतत अपने अग्रज की वडी भक्ति करते रहे, आज
क्यो नही कर रहे हो ? तुम सतत मेरे वचनो का आदर करते रहे, आज मेरी परीक्षा
क्यो ले रहे हो ? 'हे पुण्यमूर्त्ति, युद्ध में रावण का सहार करके सीता को आपकी सेवा में
उपस्थित करूँगा' ऐसे श्रुति-मधुर वचन कहनेवाले तुम आज किस कारण से मौन साधे
हुए हो ? तुम उठो और 'हे देव, ऐसे अनुचित वचन कहना आपको शोभा नही देता ।'
ऐसे वचनो से मुझे सान्त्वना दो और आँखें खोलकर मुझे देखो ।" ऐसे विलाप करते हुए
राम ने लक्ष्मण के अरुण हस्त को अपनी कनपटी से लगाया और 'हे लक्ष्मण मेरा उद्धार
करो' यो कहते हुए ही मूर्च्छित हो पृथ्वी पर गिर पडे । तब वानर-वीरो ने उपचार करके
राम की मूर्च्छा दूर की और उन्हें सात्वना देने लगे ।
१३१. हनुमान् का द्रोण-पर्वत ले आना
इसी समय प्रभा-मडल से दीप्त होते हुए हनुमान् आता हुआ दिखाई पडा । तेजो-
मय सूर्य-सम उसकी दीप्ति के आधिक्य के कारण उसपर दृष्टि ठहरती नही थी । उसे
देखकर सभी वानर अत्यधिक भयभीत हो गये और सभ्रम-चित्त हो व्याकुल हो उठे ।
रामचन्द्र ने भी उसे सूर्य ही समझ लिया और प्रलय-काल के यम के समान क्रोध से
जलते हुए सभी वानरो को देखकर कहने लगे- 'हे वानरो, तुम लोगो ने आकाश में
निकलनेवाले सूर्य को देखा ? पुण्य तथा शील से समन्वित हमारे वंश का आरम्भकर्त्ता,
अन्धकार का शत्रु तथा कमल-बन्धु यह सूर्य आज शत्रु से मिल गया है और लक्ष्मण के
ऐसे पडे रहते हुए निकल रहा है। अब मैं इस सूर्य-मडल को पृथ्वी पर गिरा दूँगा ।' इस
प्रकार कहते हुए दुर्वार साहसी राम ने धनुष को अपने हाथ में ऐसे सँभाला, जैसे प्रलय के
समय शिवजी ने ब्रह्माण्डो का भजन करने के निमित्त ब्रह्मा आदि देवताओ को भयभीत
करते हुए अपने हाथ में पिनाक धारण किया था । उस समय अपने पूर्ण बाहुबल से युक्त
राम स्वयं शिवजी के समान दीप्त होने लगे । अत्यन्त क्रोधोन्मत्त हो शीघ्र उन्होने ही
अपने धनुष पर रौद्र-अस्त्र का संधान किया । राम की अद्वितीय शक्ति से परिचित जाववान् ने
भय से व्याकुल होते हुए क्रोधोद्दीप्त राम को देखकर कहा- 'हे देव, क्रोधावेश से अपनी
दुर्वार शक्ति का प्रदर्शन करते हुए आपके इस प्रकार शर-संधान से देव तथा गधर्व
धैर्य खोकर चारो ओर भाग रहे हैं । हे राघव, यह कैसा आश्चर्य है कि आप (आकाश
की ओर) सावधानी से देखकर भी सचाई समझ नही पाये । यह जो प्रकाश दीख रहा है,
वह सूर्य का नही है, किन्तु अनेक दीप्त वृक्षो की काति से परिपूर्ण उज्ज्वल द्रोणाचल है,