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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 468, कुल 508 में से

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पृष्ठ 468

४३८ रंगनाथ रामायण
होने के कारण वे उसके अत्याचारो को सहन न कर सके, किंतु उसकी भयंकरता को देखकर
सिर कँपाते हुए विभीषण से कहने लगे--'हे विभीषण, मै अनुमान नही कर पा रहा हूँ
कि यह कौन आ रहा है । पता नही कि रावण की आज्ञा से स्वय अग्निदेव युद्ध करने
के लिए आ रहे है या कोई राक्षस-वीर ही आ रहा है । यह कौन है ? इसका परिचय
मुझे दो ।'
तब विभीषण ने कहा--'हे देव, यह अग्निवर्ण है । यह अपने शरीर से अग्नि-
ज्वालाओ को प्रज्वलित करके पर्वतो को भी भस्म कर सकता है, यह अखड वीर एव महान्
घमंडी है ।' यह सुनकर राम आश्चर्यचकित हुए । फिर भी, उसके भयंकर औद्धत्य को
देखकर उन्होने उस पर वारुणास्त्र चलाया । तब उस अस्त्र ने समस्त आकाश को घने बादलो
से आच्छादित कर दिया और अविराम गति से वर्षा करके उस राक्षस के द्वारा प्रज्वलित
अग्नि-ज्वालाओ को बुझाकर भयकर ध्वनि के साथ उस राक्षस का वध कर डाला ।
युद्ध में अग्निवर्ण को इस प्रकार गिरते हुए देखकर, रावण ने आँखो से अग्निवर्षा
करते हुए, प्रलय-काल के सूर्य की भाँति जलती हुई दृष्टियो से राम को देखकर कहा-'हे
राम, क्या तुम मुझे नही पहचानते ? अपने निष्ठुर वज्र की दुर्वार धारा से कुलपर्वतो
को खंडित करनेवाले इद्र भी यदि वडी उद्धतता से अपने देवताओ के साथ युद्ध में मेरा
सामना करे, तो मै उसे भी परास्त कर दूंगा । तब, मै तुम्हारी क्या परवाह करूँगा ?
क्या, तुम्हारे जैसे क्षुद्र प्राणियो का प्रयत्न मुझे परास्त कर सकेगा ? अब तुम अपनी शूरता प्रकट
करो और अत तक मेरा सामना करते रहो । मैं अपने शस्त्रास्त्रो से तुम्हें गिरा दूंगा और
तुम्हें अपनी शक्ति का परिचय दूंगा ।'
रघुराम उस दुरात्मा का प्रलाप सुनकर हँस पडे और मत्त सिंधुर (हाथी) के चिंघाड
सुननेवाले सिंधुरांतक मत्त सिंह की भाँति चुप हो रहे । तब रामानुज ने क्रुद्ध होकर रावण पर
आक्रमण किया और उस पर भयंकर बाण चलाने लगे । तब रावण ने उन शरो को सहज ही खडित
कर दिया और उनकी परवाह किये बिना भानु पर आक्रमण करने के लिए आनेवाले स्वर्भानु
(राहु) के समान भानुवंशाधीश (राम) पर आक्रमण करके दारुण वज्रधर की समता करनेवाले
बाणो से उन्हें ढक दिया । तब राम ने क्रोधोन्मत्त हो, अगारो को उगलनेवाले निष्ठुर अस्त्रो को
उस राक्षस पर चलाया । तब रावण उन बाणो का सामना करने के लिए युद्ध-भूमि के
मध्य आया ।
१३९. इंद्र का मातलि के द्वारा राम को रथ भेजना
तब इद्र ने राम को देखकर मातलि से कहा--'देवताओ के हित के लिए ही
राघव राक्षसो से घोर युद्ध कर रहे है । किंतु वे पदाति हो पृथ्वी पर खडे है और राक्षस
रथ पर आरूढ है । ये लोकोन्नत (राम) दुखो से पीडित हो उस कुमार्गी के सामने नीचे
खडे है । वेद-पल्लवो पर विहरण करनेवाले, सुखी तथा सपन्न व्यक्ति आज कठोर रणभूमि
पर खडे है । कमला के मन-रूपी रथ पर अत्युन्नत सुख-राशि में डोलनेवाले आज
पृथ्वी पर खडे है । अत, हे मातलि, तुम शीघ्र उनके लिए दिव्य रथ पृथ्वी
पर ले जाओ ।