रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकाण्ड ४३१
उनके सिर काट डालते थे। वानरो के ऐसे पीडित करने से सारा राक्षस-नगर भयभीत हो,
दीन तथा व्याकुल दीखने लगा । वानरो से प्रपीडित घोडो की हिनहिनाहटो, गजो के
भयंकर चिंघाडो, वृद्धा तथा बालाओ के दीन विलापो तथा कपियो के सिंहनादो के व्याप्त
होने से सारी लंका प्रलय-काल में दीप्त होनेवाली वडवाग्नि की ज्वालाओ से भयभीत
हो गर्जन करनेवाले समुद्र की भाँति, हाहाकार करने लगी ।
इसी समय सूर्योदय हुआ । वानरो ने सब स्थानो में रावण को ढूँढा, किंतु वे
कही भी उसको देख नही सकने के कारण संभ्रमित हो गये । तब विभीषण की चतुर
पत्नी सरमा ने, अपने पति के हित का विचार करके बडी उद्विग्नता से, हाथ के संकेत
से अगद को रावण के रहने का स्थान बताया । तुरत उस वीर ने क्रुद्ध होकर उस गुफा
के मुँह पर स्थित शिला को अपने पदाघात से चूर-चूर कर दिया और अपने महान
पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए, अपने बाहुबल से राक्षसो को भयभीत करते हुए अदर प्रवेश किया
और हवन-कर्म में निश्चल निष्ठा से लगे हुए तथा विविध मंत्र-तंत्रो में लगे रावण
को देखकर, चिल्ला उठा—'मैने रावण को देख लिया । शीघ्र चले आओ ।' यह सुनकर
अनिलकुमार आदि राक्षस बडे वेग से गुफा की रक्षा करनेवाले राक्षसो को मारकर अदर
चले आये । तब उन्होने अकेले हवन करनेवाले रावण को देखा और बडे क्रोध से कहने
लगे—'बिना किसी को साथ लिये यह अकेले फँस गया है । हम इसका हवन कर देंगे ।'
यह कहकर वानरो ने हवनकुड के चारो ओर रहनेवाले कलश-समिधाएँ, हाथी, मुर्गा,
जबूक, अश्व, ऊँट, कुत्ता आदि जानवरो के मस्तक, घी तथा मधु के पात्र आदि होमकुड
में फेंककर सिंहनाद किया । यह देखकर राक्षस भयभीत हुए । फिर, वानर उस पापी
रावण के अगो पर होमकुड के अगारो की वर्षा करने लगे और जलते हुए मशाल उठाकर
राक्षसो पर फेंकने लगे । एक वानर ने रावण के हाथ के स्रुक्-स्रुवा को बलात् खीचकर
उन्ही से रावण पर प्रहार किया । कपियो के इस प्रकार के आक्रमण के कारण रावण
की निष्ठा डोल गई । फिर भी बिना विचलित हुए या बिना क्रुद्ध हुए वह निष्ठा में
ऐसे निमग्न रहा, मानो वह सोया हुआ पर्वत हो ।
१३५. अंगद का मंदोदरी को रावण के पास घसीटकर लाना
तब युद्ध-कला-कुशल, दुर्जय तथा अगदो से अलकृत बाहुओ से विलसित अगद,
शीघ्र रावण के अत पुर में पहुँचा और रानियो के निवास में प्रवेश किया । वहाँ उसने
उमडते हुए दुख से सतप्त होनेवाली मदोदरी को देखा । उसका सूजा हुआ लाल मुख-चंद्र,
उसके कर-पल्लव पर ऐसा टिका हुआ था, जैसे रोहिणी से अलग हुए चद्र को तरुण पल्लव-
शय्या पर पहुँचा दिया गया हो । वह अपने वधुओ के साथ यह सोचकर व्याकुल हो रही थी
कि घोर युद्ध में कुभकर्ण आदि मरे, महावीर तथा घोर विक्रमी पुत्र सब नष्ट हुए;
केवल मेरे पति बच गये है, भला वे क्या रघुराम को जीत सकते है ? वह मन-ही-मन
इन्द्रजीत की मृत्यु का स्मरण करके रो रही थी । रमणीय मणि-मदिर में बैठकर शोक
करनेवाली रमणी मदोदरी की सुदर वेणी को बलात् पकडकर अगद उसे खीचने लगा ।
तब उस मृगनयनी के मुख-चंद्र की काति ऐसे मलिन पड गई, जैसे ग्रहण के समय राहु मे