रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
२८८ रंगनाथ रामायण
आकाश को भी चूर-चूर कर देनेवाले हैं तथा पृथ्वी को भी टुकड़े-टुकड़े करने की क्षमता
रखते हैं । हे दशकंठ, उनका (क्रोध) शत्रुओं के लिए साक्षात् मृत्यु है । चूंकि, आप सीता
को ले आये, इसलिए वे युद्ध करने के लिए आये हैं, अन्यथा वे शरणागतों के, वज्र के
पिंजड़े के समान, रक्षक हैं, वे शूरों के भी शूर हैं । शरण की याचना किये बिना उनके
क्रोध का अंत नहीं होता । आपके ऊपर क्रोध करने के कारण ही उनकी आँखों में लालिमा
छाई हुई है । वे ही त्रिभुवनों के शासक सूर्यकुल-तिलक (राम) हैं ।
“वह देखिए, उनके भाई और शुद्ध स्वर्ण-वर्णवाले राम के अनुज लक्ष्मण धनुष धारण
किये खड़े हैं, अत्यंत आग्रह के साथ सप्त भुवनों को परास्त करने की शक्ति से संपन्न हैं ।
वे राम के प्राणाधार के समान हैं और उद्दण्ड पराक्रमी हैं । हे असुरेन्द्र, उस राजा राम
के पीछे आपके अनुज हैं, जो आपको युद्ध में परास्त करके लंका पर राज्य करने के
उद्देश्य से राम भूपाल के द्वारा राज्याभिषिक्त होकर बड़े आनंद से फूल रहे हैं । वे परम
धर्मानुसरण करनेवाले तथा नीतिवान् विभीषण हैं । हे देव, लक्ष्मण तथा विभीषण के
निकट ही जो खड़ा है, वह सुग्रीव हैं, जो सर्वमान्य गुणों से संपन्न हो किष्किन्धा का राज्य-
भार वहन कर रहा है । वह महनीय लक्ष्मी से संपन्न होकर स्वर्ण-माला धारण किये हुए हैं ।
वह दिग्तालबाहु तथा अत्यंत भयंकर शौर्य से विलसित हैं । उसकी सेना के बारे में
सुनिए । (कहते हैं कि) शतकोटि सहस्र संख्या का एक शंख होता है । ऐसे लाख शंखों
का एक महावृंद होता है और ऐसे लाख महावृंदों का एक पद्म होता है । एक लाख पद्मों
का महापद्म होता है और लाख महापद्मों का एक खर्व होता है । लाख खर्वों का एक
महाखर्व होता है, लाख महाखर्व एक समुद्र कहलाते हैं और लाख समुद्र महासमुद्र कहलाते हैं ।
लाख महासमुद्र, महदाख्य कहलाते हैं । बालि के अनुज के पास एक करोड़ महदाख्य सेना है ।
अब आप ही स्वयं विचार करके देख लें कि उनकी सेना कितनी बड़ी है । उसकी सेना
का आदि तथा अंत जानना असंभव है । उसके सामर्थ्य की समता और कोई सेना नहीं
कर सकती । वह सेना दुर्वार है । इसलिए हे देव, उस सेना से भिड़कर युद्ध करना असंभव है।”
शुक ने जब इस प्रकार कहा, तब रावण ने एक बार फिर सारी वानर-सेना का
पर्यवेक्षण किया और गर्भ में वडवानल प्रज्वलित होनेवाले समुद्र की भाँति मन-ही-मन
भयभीत हुआ, किन्तु अपने भय को दबाकर, निर्भीक की भाँति क्रोध प्रकट करते हुए कहा--
'अपने स्वामी की इच्छा के विरुद्ध, कोई मंत्री मंत्रणा देकर उसको विचलित करे,
यह कैसी नीति है ? तुम बिना विचार किये, मेरे सामने मेरे विरुद्ध इस प्रकार की बातें
कह रहे हो । क्या, यह तुम्हारे लिए उचित है ?' रावण के इतना कहते ही शुक तथा
सारण भयभीत हो, अपना सिर नीचा किये वहाँ से चले गये ।
३५. राम के माया-धनुष तथा सिर दिखाकर सीता को भयभीत करना
उनके चले जाने के पश्चात् रावण अपने अंतरंग सचिवों के साथ बड़ी देर तक
मंत्रणा करता रहा और फिर उन्हें विदा करके दुर्धर हो, विद्युज्जिह्व नामक एक राक्षस
को बुलाकर कहा-'तुम अपनी माया से राम के सिर तथा धनुष का निर्माण करके शीघ्र
ले आओ ।' वह तुरंत गया और अपनी सारी निपुणता तथा माया से बनावटी सिर तथा
धनुष का निर्माण करके ले आया । रावण ने उसे अच्छा पुरस्कार दिया । वहाँ से रमणीय
अशोकवन में जाकर दनुजेश्वर ने सीता को देखा । उस समय सीता सिर झुकाये अत्यन्त
चिंता में पड़ी, कातर दृष्टि से पृथ्वी को इस प्रकार देख रही थी, मानो वसुंधरा को कोस
रही हों कि हे माता, तुम मुझे इतना अधिक दुख क्यों दे रही हो ? उनकी आँखो मे
अविरल अश्रुधारा इस प्रकार वह रही थी, मानो उनके चित्त का क्रोध भीतर न रह सकने के
कारण धाराओ के रूप में बह रहा हो । उनका शरीर ऐसा धूलि-धूसरित था, मानो पृथ्वी
यह कहती हुई उनसे लिपट गई हो कि हे पुत्री, यह कैसा दुर्भाग्य है कि तुम ऐसी दुरवस्था
को प्राप्त हुई हो । वे इस प्रकार बैठी हुई थी, मानो रावण के क्रूर कर्म ही देवता का
रूप धारण कर यह निश्चय करके बैठा हो कि हे रावण, मै तुम्हारे तथा तुम्हारे राक्षस-
कुल का सर्वनाश करके ही यहाँ से उठूँगा । वे बार-बार ऐसे दीर्घ निःश्वास छोड़ रही थी,
मानो राक्षस-रूपी नीरस वृक्षो को विध्वस्त करने में प्रयत्नशील प्रलय-काल की अग्नि हो ।
अपनी ओर ध्यान दिये बिना बैठी हुई सीता को देखकर, सर्वनाश के लिए
उद्यत रावण ने कहा—'हे जानकी, मूर्ख तथा अविवेकी खरदूषण आदि राक्षसो का वध
करने मात्र से तुम राम के शौर्य का विश्वास करती हो और मेरे शौर्य को कभी अपने
मन में भी नही लाती । जब राम बडे दर्प से अपनी सेना के साथ समुद्र को पार करके,
वानरो के साथ सुवेलाद्रि पर सो रहा था, तब मेरे एक प्रिय सेवक ने उसका वध करके
उसके धनुष तथा सिर ले आया है । राम का प्रिय अनुज, तथा वानर परास्त होकर भाग
गये हैं । इसलिए हे कमलमुखी, तुम अब राघव की आशा छोड़ दो और मेरी तथा मेरी
स्त्रियो के लिए अधीश्वरी बनकर रहो ।'
इस प्रकार कहने के पश्चात् उसने विद्युज्जिह्व को बुलाकर, राम के सिर तथा
धनुष को सीता के सामने लाने की आज्ञा दी । तब उसने कहा—'हे सुंदरी, यह लो, राम
के सिर तथा धनुष ।' इतना कहकर वह उन दोनो को सीता के सामने फेंककर हँसते हुए
चला गया । उसी समय आकाशवाणी हुई—'राम भूपाल युद्धभूमि में असुर (रावण) का
सिर काटेंगे, यह तुम्हारे पति का सिर नहीं है । तुम विचलित मत होओ । तुम्हारे धर्मा-
चरण के प्रभाव से रामचंद्र अवश्य विजयी होंगे ।' (फिर भी) उस चचलाक्षी सीता ने
उस सिर को देखा और राम की आँखें, मुँह, ललाट, मौलि-रत्न की प्रभा, दंत-पंक्ति और
कर्ण-पुटों का सौंदर्य तथा अधरो की कांति का स्मरण करके उस सिर को राम का ही
सिर समझकर मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर ऐसे गिर पडी, मानो पृथ्वी माता ही उस लतांगी
को अपने हृदय पर लिटाकर उन्हें सांत्वना दे रही हो कि 'यह मिथ्या है । तुम्हारे पति का कोई
अहित हो नही सकता । हे सुंदरी, यह माया है, इसकी ओर तुम्हें देखना नही चाहिए ।'
थोड़ी ही देर में सीता सँभल गई और शोकाग्नि से मतप्त होती हुई बोली--'हाय,
हे कैकेयी, कलह को जन्म देकर तुमने इस प्रकार इक्ष्वाकु-वश का सर्वनाश किया है ।
राघवेन्द्र ने तुम्हारा क्या बिगाडा था कि तुमने उन्हें अनावश्यक ही वन में जाने की
आज्ञा दी ? हे पृथ्वीपति, मैने पूर्ण विश्वास किया था कि आपने समुद्र पर सेतु बाँधा है,
और आप अवश्य मुझे छुड़ाकर ले जायेंगे, किन्तु मैं यह नही समझती थी कि भगवान्
३७
२६० रंगनाथ रामायण
मेरी ऐसी गति करेंगे । हे काकुत्स्थ, आपके और मेरे प्राण एक हैं, उस कथन को आप
इस प्रकार मिथ्या साबित कर रहे हैं, क्या, यह आपके लिए उचित है ? हे सूर्यकुल-
तिलक, पति से पहले ही प्राण देने का सौभाग्य मुझे नहीं मिला । आप भले ही जायें,
मैं भी तुरंत ही अपने प्राण आपके पास भेज दूँगी । पृथ्वी मेरी माता है और आप मेरे
पति हैं । क्या, आपके लिए यह उचित है कि आप मुझे पुन वसुधा की गोद में पहुँचा दें।
अग्निदेव के समक्ष आपने मेरे पिता से मुझे ग्रहण किया था । अब इस प्रकार आपका
मुझसे विलग हो जाना, क्या आपके लिए उचित है ? हे राम, न जाने क्यों आपको इस
दशा में देखकर भी मेरा हृदय सतप्त नहीं हो रहा है । मेरा हृदय जब मतप्त नहीं होता,
तो निश्चय ही आपकी यह दशा नहीं हुई होगी ।' इस प्रकार सोचती हुई सीता विलाप-
करने लगी ।
उसी समय द्वारपालों ने आकर दनुजेश्वर से निवेदन किया—'हे देव, किसी अत्यंत
आवश्यक कार्य के उपस्थित होने से आपके मंत्री सभा-स्थल में आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
उनका संदेश लेकर आये हुए प्रहस्त आदि राक्षसवीर द्वार पर खड़े हैं ।' यह सुनकर
रावण तुरंत सभास्थल के लिए रवाना हो गया । उसके जाते ही, वे माया सिर तथा
धनुष भी ऐसे अदृश्य हो गये, मानो रावण की लक्ष्मी भी इसी प्रकार शीघ्र ही अदृश्य
हो जायगी । सभास्थल में पहुँचकर रावण ने जब गुप्तचरों से सुना कि राम शीघ्र ही
आक्रमण करने का यत्न कर रहा है, तब उसने बड़े धैर्य के साथ ढिंढोरे पीटकर नगर में
इन समाचार को प्रकट कराने का आदेश दिया और अपनी सेना को एकत्रित करने के
लिए वेत्रधरों को भेजा ।
यहाँ सरमा सीता को देखकर कहने लगी—'हे माता, तुम ऐसे क्यों प्रलाप करती हो ?
रावण की बातें सत्य नहीं हैं, उन्हें मिथ्या जानो, क्या तुम इतना भी नहीं जानती
कि तुम्हारे सामने जो सिर फेंका गया था, वह माया का सिर था । इस राक्षस के दुर्वचन
सुनकर मैं सत्य समाचार जानने के लिए गई थी । मेरी बातें सुनो । राम युद्ध करने के
लिए आ रहे हैं । यह समाचार सुनते ही देवताओं का शत्रु (रावण) विचलित हो उठा ।
वह सुनो, ढिंढोरे का शब्द हो रहा है । राक्षसों के भयंकर रथों के दौड़ने की ध्वनि सुनो।
लो, वह सुनो, रथिकों तथा सारथियों के संभाषणों की ध्वनि सुनाई पड़ रही है । इसलिए
हे कुटिल-कुंतले, तुम चिंता मत करो । राम पर किसी प्रकार की विपत्ति नहीं आई है ।'
इसी समय लंका को विदीर्ण करनेवाले गर्जन के साथ आनेवाली वानर-सेनाओं को
देखकर रावण ने चिंताग्रस्त चित्त से अपने मंत्रियों को शीघ्र बुलाकर कहा—'वह देखो,
राघव युद्ध करने के लिए आ रहा है । तुम अब अपनी अमित शक्ति का परिचय देते
हुए शीघ्र जाओ और उन दोनों मानवों को मारकर, वानर-सेना का वध कर डालो ।
जाओ, शीघ्र जाओ ।'
३६ माल्यवान् का हितोपदेश
तब रावण को देखकर नीतिवान् माल्यवान् ने कहा—'हे राजन्, उचित समय में
संधि कर लेना श्रेयदायक होता है और उचित समय पर वैर ठानना शुभ-प्रद होता है ।
जो नीतियुक्त कार्य करता है, उस राजा के राज्य की सतत वृद्धि होती रहती है ।
नीच व्यक्ति से विग्रह और बलवान् से संधि करना विबुध-जनो का उपदेश है । सूर्यवंश-
तिलक हमसे अधिक बलवान् है, देवताओ के कार्य के लिए उन्होने पृथ्वी पर जन्म लिया है।
दैवबल भी उन्ही को प्राप्त है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि वे धर्मात्मा है ।
उन्हें ऋषियो के सतत आशीर्वाद प्राप्त है । तुम तो सदा देवताओ को पीडित तथा ब्राह्मणो
का नाश करते हुए पाप-चिंता में लीन रहते हो । विजय सदा धर्म की ओर ही झुकी
रहती है, अधर्म की ओर नही । उस दिन तुमने ब्रह्मा से अन्य सभी लोगो के हाथो से
न मरने का वर प्राप्त किया था, किन्तु इस प्रकार तुम पर आक्रमण करनेवाले नर तथा
वानरो पर विजय पाने का वर प्राप्त नही किया है । किसी भी रीति से देखा जाय,
उनके हाथो से तुम्हारा नाश निश्चित है। इतना ही क्यो, होनहार की सूचना देनेवाले
कितने ही शकुन दिखाई पड रहे है । विपुल होम-धूम त्रस्त-सा हो गया है । राक्षसो के
तेज का अंत-सा हो रहा है। हमारे गृहो में कई प्रकार की विपत्तियो का जन्म हुआ है ।
इसलिए तुम जान लो कि वे (राम) आदिनारायण है और ऐसा करने के लिए (तुम्हारा
वध करने के लिए) इस संसार में जन्मे है । राम से विग्रह तुम्हें शोभा नही देता ।
इसलिए तुम अपना हठ छोड़ दो । राम का शर औद्धत्य का सहन नही करता ।
अतः हे दानवेन्द्र, सीता को ले जाकर राम को सौंप दो और अपने वंश की
रक्षा करो ।'
तब रावण ने माल्यवान् को रोषपूर्ण नयनो से देखकर कहा--'मै अद्वितीय
प्रताप और दक्षता से संपन्न तथा सतत विजयी होनेवाला हूँ । तू मेरे सामने मेरे शत्रु की
प्रशंसा कर रहा है । अब मै तुझे क्या कहूँ ? तू कभी अपनी कायरता नही छोड़ता ।
भला, मै सीता को क्यो देने लगा ? मुझे किसका भय है कि मै सीता को दे दूँ ?'
उसके उद्धत वचनो को सुनकर माल्यवान् ने कहा--'मेरी बातो का अनादर करके तुम
रामचन्द्र को युद्ध में कैसे जीतते हो, यह मैं भी देखूँगा । हम जायेंगे कहाँ ? (इन्ही
आँखो से) देखेंगे ही।' इस प्रकार क्रोध में आकर माल्यवान्, कुछ और परुष वचन कहते
हुए, वहाँ से चला गया ।
उसके पश्चात् असुरेन्द्र ने पहले, अनुपम पराक्रमी प्रहस्त को पूर्व के द्वार की रक्षा
के लिए भेजा, अक्षीण बली महोदर तथा महापार्श्व को दक्षिण के द्वार पर भेजा, अपने
पुत्र इन्द्रजीत को पश्चिम के द्वार पर नियुक्त किया, उत्तर द्वार की रक्षा के लिए शुक
तथा सारण को नियुक्त किया और नगर के मध्य भाग की रक्षा के लिए विरूपाक्ष को
आज्ञा दी । इस प्रकार, लंका के रक्षण की समुचित व्यवस्था करके रावण अन्तःपुर में
चला गया ।
वहाँ राम ने सुग्रीव विभीषण, अंगद, जाम्बवान्, सुषेण, नील, नल, हनुमान्, गवाक्ष
आदि वानरो को, (उनसे) परामर्श करने के लिए बुलाया और कहा-'अब हम सब प्रकार
के अवगुणो का आगार, तथा देवताओ के शत्रु रावण की लंका का पर्यवेक्षण करें । देखो,
उस एक दुष्ट के कारण उसका सारा वंश नष्ट होनेवाला है ।'
५६२ रंगनाथ रामायण
३७ सुवेलाद्रि पर से राम-लक्ष्मण का लंका को देखना
इतना कहने के पश्चात् राम ने अपने अनुज तथा सुग्रीव आदि वानरों के साथ
सुवेलाचल का आरोहण इस प्रकार किया, मानो कह रहे हों कि गुणवान् आदमी अपने वंश
में इसी प्रकार उन्नति के शिखर पर चढ़ता है । वहाँ से उन्होंने अपने हाथों से नष्ट होने-
वाली उस लंका को देखा । उस नगर के गोपुरों पर जड़ी हुई मणियों की प्रभा इतनी
उज्ज्वल थी, मानों हनुमान् ने जो अग्नि लगाई थी, वह उस दिन तक वैसे ही दीप्त
हो रही हो । बड़े-बड़े कंगूरों से युक्त उस नगर का प्राकार, ऐसा दीख रहा था, मानो
राम के बाणों के प्रहारों से संभ्रमित एवं परितप्त होनेवाले रावण-रूपी मृग को भाग
जाने से रोकने के लिए ही प्रलयकाल के यम-रूपी शिकारी ने चारों ओर से घेरा लगा
दिया हो ।
उस दुर्ग की मीनारों पर दीखनेवाली चित्र-विचित्र ध्वजाएँ तथा तोरण ऐसे दीख
रहे थे, मानो मीनारें-रूपी स्त्रियाँ सूर्य के प्रकाश में उज्ज्वल दीखनेवाले सुंदर तोरण-रूपी
मंगल-सूत्रों से अलंकृत हों, सुंदर ध्वजाएँ-रूपी अपने हाथों को हिलाती हुई (राम का)
स्वागत कर रही हों—'हे राम, रावण का संहार करने के लिए शीघ्र चले आओ ।' उस
दुर्ग की परिखाएँ इतनी विशाल एवं गहरी थीं, मानो रावण-रूपी जंगली भैंसे को पकड़ने
के लिए यम ने अनुकूल खड्डे खोद रखे हों । नगर के उज्ज्वल सौध आकाश का स्पर्श
करते थे और ऐसे दीख रहे थे, मानो रावण ने कैलास पर्वत को उखाड़कर और उसे यहाँ
लाकर सुंदर ढंग से फिर से उसका निर्माण किया हो । उस नगर से तुरही की ऐसी
ध्वनि निकल रही थी, मानो लक्ष्मी राम के स्वागतार्थ आ रही हों । उस नगर में कितने
ही ऐसे उपवन थे, जिनके असंख्य वृक्ष शुकों की बोली से हर्षित होते, भ्रमरों के गुंजन से
आनंदित होते, कोयलों के कल-कूजन से संतुष्ट होते, सुंदर सारिकाओं के संचालन से दीप्त
होते, शाखाओं और मन-रूपी पल्लवों को राग-रंजित करते तथा सतत व्याप्त होनेवाले पुष्पों
के सुगंध-भार से महक रहे थे । उस नगर के कमलाकर कमला (लक्ष्मी) के मन-कमल
के समान थे । ऐसे नगर को आश्चर्य से देखनेवाले राघव को अपने प्रताप का ताप प्रदान
करके भगवान् सूर्य पश्चिम समुद्र में डूबने लगे । तब राम ने उन्हें प्रणाम किया और
सुवेलाद्रि पर ही उन्होंने रात्रि बिताई ।
प्रातःकाल होते ही सभी कपि अत्यधिक हर्ष से विनोद करते हुए उस पर्वत के
जंगल में शीघ्र गति से चले गये और वहाँ अपने भयंकर निनादों से सिंह तथा हाथियों
को भगाने लगे । उनके निनाद राक्षसों की अस्थियों को कँपाते हुए सारी लंका में व्याप्त
हो गये ।
इस ध्वनि को सुनकर रावण यह जानने की इच्छा से कि वह कैसी ध्वनि है, अपने
सौध के कंगूरे पर चढ़कर देखने लगा । उस समय उनके साथ उस कंगूरे की शोभा
अत्यंत उज्ज्वल दीख रही थी । परिचारक-गण उनके ऊपर धवल छत्रों की छाया कर
रहा था; धवल चँवर डुला रहा था । ऐरावत के दाँतों के प्रहार का सहन किये हुए उनके
वक्ष पर मणिमय हार डोल रहे थे । इस प्रकार के वैभव से युक्त वह विविध राक्षसों से
परिवृत हो विशाल रत्न-सिंहासन पर आरूढ था तथा आयुधो की उज्ज्वल प्रभा से दीप्ति-
मान् होता हुआ, अस्ताद्रि पर विलसित होनेवाले सूर्य की समता करता था । बिजली से
युक्त नील मेघो के समान अपना हर्ष प्रकट करता हुआ वह अद्वितीय रूप से उस कंगूरे
पर शोभायमान हो रहा था । रावण की महिमा के कारण प्रभा-समन्वित उस कंगूरे को
देखकर रामचन्द्र आश्चर्य के साथ (विभीषण) से बोले—'हे विभीषण, प्रलय-काल के सूर्य-मण्डल
के समान भाममान होनेवाला यह कौन है ?' तब विभीषण ने राम से कहा---'हे देव,
वही मेरा अग्रज रावण है, जिसने इन्द्र आदि देवताओ को परास्त करके देव-कामिनियो को
वदी बनाया है और जो तीनो लोको को अपने शौर्य के प्रताप से जीतनेवाले बाहुबल से
सपन्न है ।'
३८. रावण तथा सुग्रीव का द्वंद्व-युद्ध
तब सुग्रीव ने राम से कहा--'हे प्रभो, यह राक्षस मदान्ध हो आपके समक्ष अपने
वैभव का ऐसा प्रदर्शन कर रहा है । मै अभी इस का गर्व भग करता हूँ ।' इतना कहकर
वह अत्यधिक क्रोध से, अलघु शौर्य-सपन्न गरुड के समान, मुकुट-रूपी शृङ्गो तथा विशाल
वक्ष-रूपी सानुओ से युक्त पर्वत-रूपी रावण पर अत्यत वेग से गिरनेवाले वज्र के समान,
सुवेल द्रि से उस रावण की ओर उडा । फिर, देवताओ के शत्रु उस रावण को तृणवत्
मानकर कहा—'हे रावण, सुनो, मै राम का सेवक हूँ । क्या, तुम अपना वैभव हमें दिखाने
का साहस करते हो ।' इतना कहकर उसने बडे दर्प के साथ उसके सभी मुकुटो को नीचे
गिरा दिया । तब नीचे लुढकनेवाली उसकी मुकुट-पक्ति ऐसे दीखने लगी, जैसे पूर्वकाल में
काल-रुद्र के प्रहार से नक्षत्र-पक्ति नीचे गिरने लगी थी । इससे अत्यत श्रुद्ध हो, दशकठ ने
वालि के अनुज को पकडकर नीचे पटक दिया, किन्तु सूर्यपुत्र शीघ्र ही उठकर अपने
प्रचड बाहु-बल का प्रदर्शन करता हुए उस राक्षस को उसके सभी हाथो के साथ पकडकर
इस प्रकार नीचे पटक दिया कि सभी दिशाएँ काँप उठी । इसके पश्चात् सुग्रीव ने उस
राक्षस की कनपटियो, ललाटो और स्कन्धो पर अधाधुध तमाचे लगाये, उसकी पीठ को नखो
से नोच दिया, और उसकी गर्दन को अपने टखनो के बीच दबाकर उसे कंगूरे से दे मारा ।
इस प्रकार, मल्ल-युद्ध करते हुए वे दोनो बहुत थक गये और पृथिवी पर गिरने लगे, किन्तु
दोनो फिर से सँभलकर कगरे पर ही युद्ध करने लगे । अत्यधिक शक्ति से, प्रतिक्षण पैंतरा
बदलते हुए, एक दूसरे को ढकेलते हुए, फिर एक दूसरे के निकट आकर ताल ठोककर
अलग होते हुए और शीघ्र ही एक दूसरे से भिडकर अपनी शक्ति दिखाते हुए, वे एक
दूसरे के वक्षो पर पदाघात करते, लिपटकर अपनी केहुनियो से एक दूसरे के अगो को
दबाते और अपने हाथो से एक दूसरे के सिरो को पकडकर इस तरह टकराते कि रक्त
की धाराएँ निकल पडती, फिर लडखडाते हुए कई प्रकार से कशम-कश करने के पश्चात्
एक दूसरे से हटकर अपने-अपने स्थान पर आ जाते और फूलती हुई साँसो से थोडी देर तक
चुप खडे रहते । इस प्रकार, युद्ध करते हुए दोनो के शरीरो से रक्त की धाराएँ ऐसी बहने
लगीं, मानो पर्वतो से लाल रंग की नदियाँ बह रही हो । तब रावण अपनी माया से
सुग्रीव को बाँधने का यत्न करने लगा । यह देखकर सुग्रीव आकाश की ओर उडा और
२६४ रंगनाथ रामायण
क्रूर राक्षसो के देखते-देखते राम के पास पहुँच गया और राघव को प्रणाम किया । युद्ध
की धूलि तथा रक्त से पंकिल गात्रवाले सुग्रीव को राम ने बड़े प्रेम के साथ हृदय से लगाया
और स्निग्ध दृष्टियो से देखते हुए कहा—'इन्द्र को परास्त करनेवाले रावण की
शक्ति की अवहेलना करके, ऐसा साहस करना केवल तुम्हें ही शोभा देता है । उसकी वध
करके विभीषण को लका का राजा बनाने की जो प्रतिज्ञा मैंने की है, उसकी रक्षा करने के लिए तुम उसका
वध किये बिना ही लौट आये, यह तुमने बहुत अच्छा किया । मैं तुम पर प्रसन्न हूँ ।
तुम वालि के अनुज हो, तुम उस रावण को अवश्य मार सकते थे, किन्तु उसके वध का
सेहरा, मेरे सिर पर बाँधने, तथा उसे मारने का श्रेय मुझे देने के लिए तुम उसे जीवित
छोड़कर लौट आये ।' तब सुग्रीव ने कहा-- हे देव, उस द्रोही का वैभव देखकर मैं कैसे
चुप रह सकता था ?' सूर्य-पुत्र के इन वचनो को सुनकर राम हर्षित होकर बोले—
'तारको से विलसित तथा दीप्तिमान् रक्त तथा कृष्ण वर्ण के परिवेषण से घिरे हुए
सूर्यमंडल से ज्वालाएँ निकल रही है, बड़े-बड़े जलद राक्षसो का रूप धारण करके रक्त-
वर्षा कर रहे हैं, ऐसा लगता है कि कदाचित् भूकप होनेवाला है । प्रचण्ड वायु के कारण
शैल-शृंग टूटकर गिर रहे हैं और सूर्य के अभिमुख होकर सियार रो रहे हैं । वार-वार
राक्षस-कुल के नाश-सूचक शकुन दिखाई दे रहे हैं । इधर हमारे पक्ष में अगो के फड़कने आदि
के श्रेष्ठ शुभसूचक शकुन दीख रहे हैं । अत, निस्सन्देह हमारी विजय होगी । अब विलब
करना अनुचित है ।'
इसके पश्चात् रामचन्द्र हनुमान् के कंधे पर बैठकर, जाववान्, अगद, सौमित्र, विभीषण
नल आदि महान् पराक्रमी अनुचरो के साथ उस पर्वत से नीचे उतरे । फिर, अनुपम
पराक्रमी रामचंद्र धनुष धारण करके लका की ओर चले । वानर-श्रेष्ठ, उनको मार्ग वताने
हुए आगे-आगे जा रहे थे और पीछे लक्ष्मण आदि चल रहे थे । वानर-सेना उद्धंड वेग
से उनके पीछे-पीछे एक साथ मिलकर जा रही थी । इस प्रकार, सूर्यवंश-तिलक राघव
घोर राक्षस-समूह से सुरक्षित लका के उत्तर द्वार पर जा पहुँचे । यह समाचार सुनते ही
राक्षस संभ्रमित-से हो गये । अविरल बाहुबली नील, द्विविद, मैन्द आदि वीर वानरो के
साथ, विशाल वानर-सेना को लिये हुए पूर्व के द्वार पर जाकर ठहर गया । गज,
गवाक्ष, गवय तथा बाहुबली के साथ वालिपुत्र ने वड़े उत्साह से दक्षिण के द्वार पर पडाव
डाला । अपना विक्रम प्रदर्शित करते हुए, लका-दहन करनेवाले पवन-पुत्र ने सुषेण को
साथ लेकर पश्चिम के द्वार पर घेरा डाला । सूर्य-पुत्र सुग्रीव छत्तीस करोड़ विश्वास-पात्र
तथा महाबलशाली कपि-वीरो के साथ राम के पश्चिम में ठहर गया । शक्तिशाली
भालुओ के साथ अनुपम वली जाववान् ने राम के पूर्व में पड़ाव डाला ।
तदनंतर राम ने लक्ष्मण तथा विभीषण को देखकर कहा—'इनकी (वानर-नायको
की) सहायता के लिए प्रत्येक द्वार पर एक-एक पद्म दुर्वार बलशाली वानर-वीरो की सेना
भेज दो । अनल, नल, हर तथा सपाति के साथ हम तीनो यहीं से शत्रु-राक्षसो से युद्ध
करेंगे । घोर संग्राम के समय में भी हमें यहाँ का और वहाँ का समाचार मिलते रहना
चाहिए । इसके पश्चात् राम ने वानरो को देखकर आज्ञा दी कि तुममें से किसी को
अपना वानर-रूप छोडकर और कोई भी कपट-रूप धारण नही करना चाहिए । राम की
आज्ञा सिर पर धारण किये हुए सभी वानर लका के चारो ओर बडे वेग से फैल गये ।
पूर्व तथा पश्चिम भागो में विकृत लागूलवाले, विकृत आननवाले, विकृत दाँतोवाले और
विकृत शरीरवाले अनुपम विक्रमी वानर दस योजन तक व्याप्त हो गये और वृक्षो तथा
शैलो की सहायता से युद्ध करने के लिए सन्नद्ध हो गये । उनके गर्जन, तर्जन, तथा उनके
हुकार सारी लका में व्याप्त हो ऐसे भय का उत्पादन करने लगे कि दनुज-स्त्रियो के
गर्भ-पात होने लगे । वानर-सेना का यह कोलाहल सुनकर राक्षस-समूह भय से कॉप उठा।
३९ अंगद का दौत्य
अपने मन्त्रियो की सम्मति प्राप्त करने के पश्चात् राम ने अगद को बुलाकर बडे
स्नेह के साथ कहा—'हे अगद तुम हमारा दूत बनकर रावण के पास जाओ और उससे
कहो कि हे रावण, तुमने ब्रह्मा से प्राप्त वरदान के गर्व के कारण मुनियो तथा देवताओ
को दुख दिया है । राम के समक्ष तुम्हारा कोई वश नही चलेगा । रामचन्द्र तुम पर
आक्रमण करने आये है । जिस शक्ति के मद में आकर तुम सीता को उठा लाये, अब युद्ध
में उस शक्ति का प्रदर्शन करो । राम के बाणो के प्रहार से विचलित हुए बिना, शूर के समान
उनका सामना करो । यदि ऐसा करने में तुम्हें भय हो, तो सीता को लाकर सौंप दो और
सुख से रहो । यही तुम्हारे लिए उचित है । राघव ने कृपा करके विभीषण को लका का
राजा बना दिया । वे अवश्य तुम्हारा संहार करेंगे । उनके संहार करने के पहले ही, अपने
सभी सगे-सबन्धियो को एक बार भली भाँति देख लो, लका की ओर निहारो, अपनी प्रिय
पत्नियो का विचार करो । अपने पुत्र, अनुज तथा सगे-सबन्धियो को युद्ध में मारे जाने से
उन्हें बचाने का उपाय सोचो । इसमें कोई सदेह नही है कि तुम अपने बंधु-मित्रो के साथ
मारे जाओगे, तुममें से एक भी नही बचेगा । मरने के पश्चात् जो कार्य करने के लिए
शेष रह जायेंगे, उन्हें अभी पूरा कर लो । अब यही तुम्हारी स्थिति है ।'
राम के इन वचनो को सुनकर वह श्रेष्ठ वानर, मन-ही-मन हर्षित हो दुष्ट राक्षस-
रूपी वन को भस्म करने के लिए उत्पन्न प्रलय-काल की अग्नि के समान, उस इन्द्र के
शत्रु रावण को मारने के लिए आये हुए मृत्यु-दूत के समान, उड़कर रावण की सभा में
पहुँचा । उसे देखकर राक्षसो ने कहा—'देखो, वह फिर आ गया ।' यो कहते हुए वे
आयुधो से युक्त हो अगद पर आक्रमण करने का उपक्रम करने लगे । तब रावण ने अपना
हाथ उठाकर उनका वर्जन करने हुए कहा—'रुको' । फिर उसने अगद को देखकर कहा—
'कहो, तुम कौन हो ?' अगद ने कहा—'हे रावण, क्या तुम यह नही जानते कि मै
राम का दूत हूँ ।' तब रावण ने कहा—'राम कौन है ?' अगद बोला—'अपने अतुल
पराक्रम से जिसने परशुराम को जीता, वही रणकुशल (व्यक्ति) राम है ।' रावण ने
पूछा—'परशुराम कौन है ?' अगद ने उत्तर दिया—'जिसने उद्धत कार्तवीर्य जैसे वीर को
मारा, वह असमान पराक्रमी परशुराम है ।' तब रावण ने पूछा—'वह कार्तवीर्य कौन है ?'
अगद ने कहा—'क्या तुम नही जानते ? जिसने तुम्हें जीतकर बंदी बनाया था, वही वीर
कार्तवीर्य है ।' फिर, रावण ने पूछा—'तुम किसके पुत्र हो ?' अगद ने उत्तर दिया—
२६६ रंगनाथ रामायण
'क्या तुम इतने शीघ्र उस इन्द्र-पुत्र वालि को भूल गये, जिसने तुम्हें समुद्र में डुबो दिया था।
मैं उसी वालि का पुत्र हूँ। मेरा नाम अंगद है। हे असुरेश, तुम युद्ध-भूमि में
मेरे बारे में बहुत कुछ जान जाओगे । क्या, तुम उस काकुत्स्थ-वंशज राम को नहीं जानते,
जिन्होंने मोहित होकर उनके पास जानेवाली शूर्पणखा की नाक और कान काटकर उसके
रक्त में भीगे हुए अपने खड्ग को खर तथा दूषण के अंगों के रक्त में धोया था । तुम
क्यों प्रलाप करते हो ? तुम अब जाओगे कहाँ ? बचोगे कैसे ? गर्वांध हो तीनों लोकों को
झुलसानेवाले तुम्हें राम अवश्य मारेंगे । तुम शूर होकर बिना विचलित हुए उनका सामना
करो, यही उचित है । सुनो, अब लंका पर शासन करना तुम्हारे भाग्य में नहीं है । लंका
का राजा अब विभीषण ही है । तुम इतनी विपत्ति क्यों भोगना चाहते हो ? तुम उदार
मन से सीता को रामचन्द्रजी के पास पहुँचा दो और अपने प्राण बचा लो । अपने से
बलवान् राजाओं से संधि कर लेना इस पृथ्वी पर सभी राजाओं का उचित धर्म है ।'
इन बातों को सुनकर रावण ने क्रुद्ध होकर उस महाबली अंगद को पकड़ने की
आज्ञा दी । कुछ बलवान् राक्षस तुरन्त उसे पकड़ने का प्रयत्न करने लगे । अंगद भी अपनी
शक्ति दिखाने के उद्देश्य से अपने-आप उनके हाथों बंदी बन गया और उसके पश्चात्
अपनी समस्त शक्ति के साथ आकाश की ओर उछलकर ऐसा झटका दिया कि दस सहस्र
राक्षस-वीर नीचे गिरकर चूर-चूर हो गये। इससे संतुष्ट न होकर अंगद ने राक्षसों के उस सभा-
मंडप पर ऐसा पद-प्रहार किया कि वज्रपात से गिरनेवाले हिमाचल के शिखर के समान
वह मंडप टुकड़े-टुकड़े होकर गिर गया । रावण ने फिर से राक्षसों को आज्ञा दी कि
छोड़ो मत, अंगद को अवश्य पकड़ लो । तब राक्षसों ने आकाश की ओर उड़कर अंगद
पर परशु, शूल, करवाल, गदा आदि कई आयुधों का प्रहार करके उसे पीड़ित करने लगे ।
तब अंगद ने अपने मुक्कों से उन राक्षसों पर ऐसा प्रहार किया कि उनकी आँतें निकल
आईं और वे पृथ्वी पर गिर पड़े । तब खर के पुत्र सूकर ने अंगद को देखकर कहा—'ठहरो अंगद,
अब तुम कहाँ जा सकते हो ?' इस प्रकार, घोर गर्जन करते हुए उसने अपना धनुष उठाया
और पाँच तेज बाण अंगद के मस्तक पर चलाये और उसकी बाहुओं पर दस बाण चलाये ।
इससे क्रुद्ध होकर अंगद ने उस असुर पर अपनी मुष्टि से ऐसा प्रहार किया कि उसके
सिर के कई टुकड़े हो गये और वह पृथ्वी पर गिर पड़ा । यह देखकर सभी राक्षस
भय से छटपटाने लगे और रावण भी बड़ी चिंता में पड़ गया ।
तारा-पुत्र अंगद शीघ्र राम के पास पहुँचा, और प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहा—
'हे देव, आपकी आज्ञा के अनुसार मैंने रावण के पास जाकर उसे सारी बातें समझाईं ।
किन्तु, उसने मेरी बातों की अवहेलना कर दी । हे राजन्, आपने नीति के अनुसार उसे
समझाने की चेष्टा की है, किन्तु वह तो आपके बाणों को अपने प्राणों की आहुति
देना चाहता है । वह मरने का दृढ़ निश्चय किये बैठा है । उसका अंत आसन्न है, इसलिए
हे देव, आप युद्ध में उस दशकंठ का वध कर डालिए । हे अनघ, आप (रावण को मार
कर) देवताओं को प्रसन्न कीजिए ।' इस प्रकार उसने लंका में घटी हुई सभी बातों का
वर्णन करके राम को सुनाया। अंगद की शक्ति का परिचय प्राप्त करके राम भी हर्षित हुए।
युद्धकाण्ड २६७
वहाँ सभी राक्षस रावण को देखकर कहने लगे-- 'हे देव, आप इस प्रकार चुप बैठे
रहेंगे, तो कार्य कैसे चलेगा । वह देखिए, राघव कपि-सेना के साथ लंका को घेरे हुए हैं ।
अब आप अपना प्रताप कब दिखायेंगे ? हमें भेजिए । हम युद्ध में राम-लक्ष्मण को जीतकर
आयेंगे ।'
४०. रावण का अपना वैभव प्रदर्शित करना
इन बातों को बड़े चाव से सुनकर रावण ने सोचा कि मैं अपना वैभव रामचन्द्र
को दिखाऊँगा, जिससे सुग्रीव आदि भयभीत हो जायें । इसके पश्चात् उसने उन सभी
वस्तुओं को मँगाया, जिन्हें उसने अपने भयंकर प्रताप के प्रदर्शन से इन्द्र, धनेन्द्र तथा नागेन्द्र
को जीतकर प्राप्त किया था । उसने उज्ज्वल कांतियुक्त पीतांबर धारण किये, चारों ओर
सौरभ विकीर्ण करनेवाले मृगमद, घनसार आदि सुगंध-मिश्रित मनोज्ञ चंदन का लेप किया,
सरस, मंजुल पारिजात-पुष्प-रचित मालाएँ धारण कीं, पद्मराग आदि बहुरत्न-खचित कंकण,
मुद्रिका, केयूर, भुजाभरण, कंठाभरण आदि धारण किये, अपनी मणियों की प्रभा से
गंडस्थलों को दीप्त करनेवाले कुंडल पहने, सूर्य-मंडल के समान उज्ज्वल तथा अपनी
प्रभा से समस्त दिशाओं को प्रकाशित करनेवाले मुकुट अपने दसों सिरों पर धारण किये,
इन्द्र, अग्नि, यम, नैर्ऋत, वरुण, मरुत्, कुबेर एवं ईशान का दर्प चूर करके, उन पर प्राप्त
विजय की सूचना देनेवाला तोडर अपने पैर में पहना, धनुष बाण, चक्र, परशु, त्रिशूल,
करवाल, पाश, मुद्गर, चंद्रहास आदि बीस आयुध अपने बीसों हाथों में धारण किये, और
परिचारकों के साथ लेकर उत्तर दिशा के बुर्ज की ओर रवाना हुआ । उसके आप्तजन
शूलों से सज्जित हो उसके चारों ओर चलने लगे । भूषण तथा वस्त्रों से अलंकृत होकर
उसके मंत्री उसके दोनों ओर चल रहे थे । कई हजार राक्षस असंख्य स्वर्ण-टोपों से
विलसित अस्सी हजार धवल-छत्र लिये हुए थे । अस्सी हजार कामिनियाँ शेषनाग के फन के
समान दीखनेवाले सुंदर व्यजन (पंखा) लिये हुए चल रही थीं । चंद्र-किरणों के सदृश
दीखनेवाली अस्सी हजार अप्सराएँ दोनों ओर चन्द्रिका की भाँति उज्ज्वल चामर धीरे-धीरे
झुलाती हुई अपने कंकणों का मृदु शिंजन सुना रही थीं । बंदी-मागधों का समूह देवताओं
पर (दानवों की) विजय का स्फूर्तिदायक स्तुति-पाठ कर रहा था । उसके आगे मंद, मध्यम,
उच्च आदि स्वर-भेदों के साथ चंद्रवदनी स्त्रियाँ गीत गा रही थीं । ऐसी ठाट-बाट से
सज्जित हो रावण दुर्ग के उत्तरी बुर्ज पर अपने वैभव का प्रदर्शन करते हुए मणिमय प्रभा-
समन्वित सिंहासन पर आरूढ होकर ऐसा दीख रहा था, मानो पश्चिम पर्वत पर सूर्य-बिंब
दिखाई पड़ रहा हो । राक्षसों के आतपत्रों ने सूर्य को ढक दिया था, इसलिए चारों ओर
अंधकार फैलने लगा ।
उस समय राम माया-मृग के चर्म पर, इन्द्रनील मणि के समान प्रकाशमान अपनी
देह का वाम भाग टेके हुए, वाम-भुजाग्र को अपने कपोल का आधार बनाकर, सूर्य-बिंब के
समान उज्ज्वल सुग्रीव की जाँघों पर, राजसी ठाठ से, अपना अतुल सौंदर्य को प्रकट करते
हुए लेटे थे और अपने प्रिय-भक्त पवन-पुत्र के जाँघों पर पैर पसारकर आराम कर रहे थे ।
पवन-पुत्र उनके चरण कमलों को धीरे-धीरे दबा रहा था । अंगद उनके दक्षिण-हस्त
३८
की अँगुलियों को दोनो हाथो से दबा रहा था । बंदी-मागधो की तरह उनके चारो ओर
नल-नील तथा जांबवान् आदि प्रमुख सेनापति उनकी स्तुति कर रहे थे—'हे सकल
लोकाराध्यचरण, हे जानकी-हृदयांबुज-षट्चरण, हे दीनार्त्तिहरण, हे स्तवनीयकृपाभरण, हे हर-
वद्य नाम, हे सूर्यकुलाब्धिसोम, हे गत्रुनागक, हे रघुराम आदि ।' तब रामचंद्र पूर्णचन्द्र के
समान शोभायमान होनेवाले अपने मदहास-युक्त तथा अविरल करुणामृत से परिपूर्ण मुख-
मंडल में विलसित धवल अरविंद की सुंदरता को भी परास्त करनेवाले नेत्रो की कांति को,
चारो ओर विकीर्ण करते हुए, अपने ललित कटाक्ष-रूपी चंद्रिका की वृष्टि करते हुए,
अपने दोनो हाथो के समीप बैठे हुए, राक्षसो के भेदो के ज्ञाता विभीषण के साथ अत्यन्त
रहस्यपूर्ण वार्त्तालाप कर रहे थे । उस समय उनका मुँह दक्षिण की ओर था । इसलिए
उन्होने रावण को देखकर कहा—'हे विभीषण वहाँ देखो । उस दुर्ग के उन्नत शिखर पर
कोई सिंहासन पर आसीन है । उस पर त
युद्धकांड २६६
तथा व्यजनो से रहित हो, केवल दण्डो को अपने हाथो में थामे खडे रहनेवाले उन
असुर-पक्तियो के मध्य रावण सभ्रमित हो, अपना समस्त गर्व खोकर बडी देर तक बैठा रहा,
क्योकि उसे ऐसा लग रहा था, मानो खडे हुए राक्षस उसे ले जाने के लिए आये हुए
यमदूत हो । रघुराम के धनुर्विद्या-कौशल का वार-वार विचार करके उसका सिर
काँपने लगा, और मन-ही-मन वह उनके (राम के) पटुत्व को स्वीकार करने लगा । फिर,
प्रकट रूप से वह रघुराम की प्रशसा करने लगा ।
४२. रावण का राम की धनुर्विद्या की प्रशंसा करना
उसने कहा—'हे श्यामवर्ण रघुराम, हे नयनाभिराम, हे कोदण्ड-दीक्षा-गुरु, हे वीरा-
वतार, हे शर-संधान-कला-निपुण हे श्रेष्ठ चाप के कर्पण में कृपण, हे दृढबाहु, हे विख्यात
मुष्टि-सपन्न, हे विजित शत्रुओ के भाग्य-विधाता, हे विजय-सपन्न, हे श्रेष्ठ मानव-राजकुमार,
हे नव्य-दिव्य-अस्त्र-सपन्न, हे चचल तथा घोर शरो से पूर्ण अक्षय तूणीरधारी, हे वीराग्र-
गण्य, हे विश्वशरण, हे राम भूपाल, तुम्हारे समान इस ससार में और कौन धनुर्धर हो
सकता है ? त्रिपुरो का नाश करने में (निपुण) अकेले एक शिव ही है और वाणो को
चलाने में निपुण तुम एक ही हो ।' इस प्रकार, रावण अपने दसो मुंहो से रामचन्द्र की
प्रशसा करने लगा ।
यह देखकर (उसके) मंत्रियो ने उस दैत्यनाथ से कहा—'हे दैत्य-पुगव, शत्रुता का
विचार किये बिना, कही शत्रु की ऐसी प्रशसा कोई कर सकता है ? यदि आप ऐसी प्रशसा
करेंगे, तो शत्रु तथा मित्र, यह सोचकर कि आप भयभीत हो गये है, आपको उपेक्षा की
दृष्टि से देखेंगे । यह राजनीति नही है।' तब रावण ने हँसकर उनसे कहा—'धनुर्विद्या
की निपुणता, महान् पराक्रम, सौदर्य तथा बाहुबल आदि गुणो में श्रेष्ठ, कोदण्ड-दीक्षा-गुरु,
राम-भूपाल की समता इन तीनो भुवनो में कौन कर सकता है ? हरिहर तथा ब्रह्मा
भी उसकी समता नही कर सकते । क्या, श्रेष्ठ शूरो की महत्ता को स्वीकार नही करनी
चाहिए ?' इस प्रकार, नीति-पूर्ण वचनो को कहने के पश्चात् दनुजेश्वर वहाँ से चला गया।
तब राक्षस-नेताओ ने कटकर गिरे हुए छत्र-चामर आदि को देखकर अत्यत भयविह्वल हो
वहाँ से चले गये और कई प्रकार से राम के पराक्रम तथा शौर्य की प्रशसा करते हुए
कहने लगे—'राघव करुणा-समुद्र है, इसलिए उनके भयकर बाण ने केवल छत्रो को ही
काटा । यदि वे उसी प्रकार और एक बाण चलायें, तो हमारे सिर भी उडने लगेंगे ।'
४३. वानरों का लंका ध्वंस करना
यहाँ पर राघवेन्द्र ने आगे के कार्य के सबध में अच्छी तरह मन-ही-मन विचार
किया और फिर अपने अनुज विभीषण तथा सूर्य-पुत्र आदि आप्त-वर्ग की सम्मति लेकर
शुभ मुहूर्त्त में वानरो को लका पर आक्रमण करने की आज्ञा दी । वानर-सेना उसी क्षण,
भयकर गर्जन करते हुए—'हे देव, हमारा शौर्य देखिए । आपके लिए हम किस प्रकार
प्राण देते है, देखिए ।' यो कहते हुए पर्वतो तथा वृक्षो को कँपाते हुए, करोडो वानरो ने
एक साथ मिलकर लका के दुर्ग को चारो ओर से घेर लिया ।' 'राम की अयत्न जय
होगी'—ऐसा घोष करते हुए, वानर-वीर अपनी महान् शक्ति को प्रकट करते हुए पर्वतों
तथा वृक्षों को जहाँ-तहाँ से जमा करके परिखा को पाटने लगे । उस समय वे ऐसे दीख
रहे थे, मानो वध्य भूमि पर स्थित वधिक हों ।
तब कुमुद दस करोड़ वानरों की सेना लेकर पूर्व द्वार की ओर गया । बाहुबली
शतबली अस्सी करोड़ की सहायक सेना लेकर आनेवाले राक्षसों के आक्रमण को रोकने के
उद्देश्य से दक्षिण के द्वार पर जाकर ठहर गया । सुषेण दस करोड़ सैनिकों को लेकर
पश्चिम के द्वार पर चला गया । राम, लक्ष्मण, विभीषण तथा सुग्रीव उत्तर के द्वार पर ही
रहे । गज, गवय, गंधमादन तथा शरभ, दुर्ग के चारों ओर बार-बार भ्रमण करते हुए
वानरों को दुर्ग पर चढ़ जाने के लिए उत्साहित कर रहे थे । तब वानर उद्धत गति से
एक दूसरे से स्पर्धा करते हुए, एक दूसरे को धक्का देते हुए, दुर्ग पर ऐसे चढ़ गये कि,
मालूम नहीं होता था कि कौन बुर्ज है, और कौन कंगूरा । फिर, स्तूपों पर चढ़कर
वे भयंकर गर्जन करते हुए, अपनी पूँछों का फंदा बनाकर पत्थरों को किले के भीतर फेंकने लगे ।
फिर बड़े-बड़े वृक्षों को तने से उखाड़कर बड़े वेग से उन्हें अंदर फेंककर किले के
भीतर स्थित घरों को तोड़ने लगे । फिर उन्होंने भीतर के कितने ही भवनों, मंडपों और
कंगूरों को अपने पादाघात से चूर-चूर कर दिया, बड़े-बड़े पहाड़ों को फेंककर दुर्ग को
गिराने और उसके नीचे दबकर मरनेवाले राक्षसों को देखकर हँसने लगे । वानर, राक्षसों
को ललकारते हुए बड़ी-बड़ी शिलाओं को किले के ऊपर फेंककर उसकी ऊँची दीवारों को
गिरा देते । दुर्ग के वहिर्द्वारों, राक्षसों, उनके आयुधों, पताकाओं, ध्वजाओं तथा छत्रों को
गिरते हुए देखकर वानर-वीर दिशाओं को कंपित करनेवाले भयंकर गर्जन करते और
अत्यधिक मात्सर्य से पुन पर्वतों को लाकर दुर्ग पर फेंकने लगते । उनके कठोर प्रहारों के
कारण लंकापुर की ऊँची अट्टालिकाएँ गिरने लगीं, वीथियाँ नष्ट होने लगीं, दीवारें गिरने
लगीं, ऊँचे सौध टूटकर गिरने लगे, घर चूर-चूर होने लगे, और असंख्य मंदिर नष्ट-भ्रष्ट
हो गये । सारा दृश्य राक्षसों के नाश की सूचना देनेवाले अपशकुन के समान बड़ा भयावह
दीख पड़ता था ।
४४. राक्षसों तथा वानरों का भीषण संग्राम
तब भयभीत हो राक्षस कहने लगे—'हमने ऐसा उत्पात कभी नहीं देखा ।' फिर,
वे विकट अट्टहास करते हुए, भयंकर गर्जन करने लगे । उसके पश्चात् सभी राक्षस एक
साथ एकत्रित हो, बड़े क्रोध से वानरों पर शूल फेंके, खड्ग चलाये, और गदाओं से प्रहार किये ।
वे वानरों के समूह में घुस गये और उनपर प्रहार करने, परशुओं से उन्हें मारने
और भाले चुभोकर उन्हें परिखाओं में गिराने लगे । फिर बड़ी-बड़ी शिला-यंत्रों के द्वारा
गोले फेंककर दुर्ग की दीवारों के ऊपर चढ़नेवाले वानरों को आगे बढ़ने से रोकते तथा
भयंकर गर्जन करते । उनके गर्जनों की ध्वनि तथा कपियों के विकट गर्जनों की ध्वनियों
के कारण पृथ्वी तथा सभी दिशाएँ कंपित हो गईं । व्याकुल होकर दिग्गज चिंघाड़ने लगे ।
भय से कंपित होने से पृथ्वी में दरारें पड़ गईं । अदहन के समान समुद्र का पानी खौलने
लगा । सारा संसार तप्त हो गया और भूत भयभीत हो गये । कुल-पर्वत गोलियों के समान
उछल-उछलकर गिरने लगे । शेषनाग विष उगलने लगा, कूर्म और पर्वत एक दूसरे मे
टकरा गये ।
तब रावण ने (कपि-सेना से) घिरी हुई भयंकर राक्षस-सेना को अपने पास बुलाया
और उसे उत्साहित करते हुए कहने लगा—'कपि-सेना का पीछा करके उसे किले के बाहर
भगा दो ।' तुरंत दुर्ग के चारो द्वारो से राक्षस-सेना इस प्रकार बाहर निकली, जैसे प्रलय-
काल में रुद्र के मुख से ज्वालाएँ निकलती है । उस समय, भेरी, डका, पटह, शंख, तुरही
आदि वाद्यो के भयंकर निनादो, घोडो की हिनहिनाहट, बलिष्ठ हाथियो की चिंघाड, रथो
के चक्रो की ध्वनि तथा मन को विचलित करनेवाले सैनिको के सिंहनादो के कारण समस्त
ब्रह्माण्ड कंपित होने लगा और सभी देवता भयभीत हो गये ।
वानर-सेना तुरंत राक्षस-सेना से भिड गई । द्वंद्व-युद्ध होने लगा । इन्द्रजीत ने
अगद पर गदा का ऐसा घोर प्रहार किया, जैसे इन्द्र ने दुर्वार गति से अपने वज्रायुध को
कुल-पर्वत पर चलाया था । अगद ने भी इन्द्रजीत की समता करनेवाला अपना युद्ध-कौशल
प्रकट करते हुए एक विशाल पर्वत-शृंग को उठाकर फेंका और इन्द्रजीत के रथ, सारथी
तथा रथ के अश्वो को चूर-चूर कर दिया । प्रजघ ने दुर्वार गति से सपाति पर तीन अस्त्र
चलाये । उसके आघात को बचाकर सपाति ने अश्वकर्ण वृक्ष को उस पर फेंका । अतिकाय ने
विनत तथा रभ नामक वानरो को घेरकर उन पर शरवृष्टि की । किन्तु उन दोनो ने
बडे-बडे पर्वतो को फेंककर उसकी सेना का ध्वस कर दिया । महोदर ने सुपेण को घेरकर
उसके विशाल वक्ष तथा प्रशस्त ललाट पर क्रमश पाँच तथा तीन वाण चलाये । तब सिंह-
गर्जन करते हुए उसने एक बडा पहाड उठाकर उस पर ऐसा फेंका कि महोदर का रथ
अश्व तथा सारथी के साथ चूर-चूर हो गया । जाववान् ने एक विशाल वृक्ष घुमाकर
मकराक्ष पर फेंका, किन्तु उसने उसको बीच में ही काटकर, जाववान् के ललाट, वक्ष तथा
कंधो पर कई वाण मारे । इससे क्रुद्ध होकर जाववान् ने उस पर एक विशाल पर्वत फेंका ।
देखते-देखते मकराक्ष का रथ सारथी तथा अश्वो के साथ नष्ट-भ्रष्ट हो गया । विद्युज्जिह्व ने
शतबली को घेर लिया और उसके वक्ष पर शरवृष्टि की, किन्तु शतवली ने अत्यत
वेग से उस पर एक बडा वृक्ष फेंका । गज को कई राक्षसो का सहार करते हुए देखकर
प्रमद ने क्रोध से उस बली वानर के वक्ष पर अपना शूल चलाया । तब गज ने एक साल-
वृक्ष से उस राक्षस पर ऐसा प्रहार किया कि वह राक्षस वही ढेर हो गया । (उसे मरते
देख) सभी वानरो ने हर्षनाद किया । कुम्भकर्ण का ज्येष्ठ पुत्र कुंभ नामक वीर वानरो को
पकड-पकडकर निगलने लगा, तो उसे देखकर धूम्र ने एक वृक्ष से मारा । क्रूर देवांतक ने
गवाक्ष के विशाल वक्ष पर पाँच शर चलाकर उसे अत्यंत पीडित किया, तो उसने बडे
वेग से एक साल-वृक्ष उस पर फेंका । तब उस राक्षस ने सात वाणो से उस वृक्ष के खड-
खड कर दिये और गवाक्ष पर नौ अस्त्र चलाये । तब गवाक्ष ने एक पहाड उस राक्षस पर
फेंकते हुए कहा—'लो, इसे सँभालो ।' मारण ने ऋषभ पर एक मूसल चलाया, तो ऋषभ ने
उसके वक्ष पर एक बडा वृक्ष फेंका । इससे उसके धनुष-बाण टूट गये और वह मूच्छित हो गया ।
पहाड जैसे हाथी पर आसीन हो जब त्रिशिर ने गन्ध के सिर पर तोमर चलाया,
३०२ रंगनाथ रामायण
तब उसने क्रोध में आकर उस राक्षस पर सप्त-पर्ण वृक्ष का ऐसा प्रहार किया, जैसे इन्द्र ने
कुल-पर्वत पर (वज्र से) प्रहार किया था और उस राक्षस के हाथी को गिरा दिया ।
नरांतक ने द्रुत गति से पनस पर तीव्र बाणों की वर्षा की, तो पनस ने भी अपनी भयंकर
शक्ति प्रकट करते हुए उस पर वृक्षों की वर्षा कर दी। अकंपन ने एक बड़े लट्ठ से कुमुद
पर प्रहार किया, तो कुमुद ने झुककर उस प्रहार से अपने को बचा लिया और उस अकंपन पर
मुष्टि का ऐसा प्रहार किया कि अकंपन मूच्छित हो गया । जब धूम्राक्ष ने क्रुद्ध होकर केसरी
पर बाणों की घोर वर्षा की, तब उसने धूम्राक्ष पर पर्वतों की वर्षा की और उसे गिरा दिया।
महापार्श्व ने बड़े रोष से महाबाहुबली गंधमादन पर आक्रमण किया, तो उसने पर्वतों, वृक्षों
तथा अपने दाँतों के प्रयोग से उस राक्षस को पीड़ित किया । शुक ने वेगदर्शी के वक्ष पर
अस्त्र चलाये, तो वेगदर्शी ने अपने दुर्वार विक्रम से उसके रथ को अपने पैरो से कुचलकर
चूर-चूर कर दिया । जब तपन ने नल का सामना किया, तब नले ने अपना शरीर इतना
बढ़ाया कि देखनेवाले संभ्रमित हो गये और फिर विशाल पर्वत को उस राक्षस पर फेंका ।
तपन ने नल पर तेज बाण चलाये, तो नल ने एक ताल-वृक्ष से उस पर प्रहार किया ।
जंबुमाली ने अपनी गुरुतर शक्ति से हनुमान् पर घोर प्रहार किया, तो हनुमान् क्रुद्ध हो
उसके रथ पर कूदा और जंबुमाली के सिर पर अपनी हथेली का ऐसा प्रहार किया कि
उसका सिर फूट गया । मित्रघ्न ने विभीषण पर शरवृष्टि की, तो विभीषण के शरीर से
रक्त के फौव्वारे छूटने लगे । तब उग्र क्रोध से विभीषण ने उस पर गदा चलाई, तो
मित्रघ्न मूच्छित होकर गिर पड़ा । प्रहस्त नामक राक्षस को वानरों को पकड़कर निगलते
देख सुग्रीव की आँखें क्रोध से लाल हो गईं । उसने तुरंत एक सप्त-पर्ण वृक्ष से उस पर
प्रहार किया और उसे गिरा दिया । वज्रमुष्टि नामक राक्षस पर मैन्द ने अपनी मुष्टि से
प्रहार किया, तो वह राक्षस पृथ्वी पर ऐसा गिरा, मानो लंका का बुर्ज ही गिर पड़ा हो ।
अशनिप्रभू नामक राक्षस को द्विविद ने एक पर्वत के प्रहार से ऐसा गिरा दिया कि स्वर्ग
के देवता हर्ष-ध्वनियाँ करने लगे । विशाल बाहुबली निकुंभ ने अपने प्रताप का प्रदर्शन
करते हुए अपने दिव्य अस्त्रों से नील को ऐसा ढक लिया, जैसे काले-काले मेघ सूर्य को
आच्छादित कर लेते हैं । तब नील ने इसकी उपेक्षा करते हुए सहज ही निकुंभ के रथ के
चक्र को निकालकर उसे बड़े वेग से ऐसे चलाया कि सारथी का सिर भूमि पर लोटने लगा
और निकुंभ स्वयं भयाक्रांत होकर देखता रह गया । विरूपाक्ष सौमित्र पर शर-वृष्टि करने
लगा, तो सौमित्र ने उसकी उपेक्षा करके एक ऐसा बाण उस राक्षस पर चलाया कि उसकी
शक्ति जाती रही और वह मूच्छित हो पृथ्वी पर लुढ़क गया । उस समय सप्तघ्न, रश्मिकेतु,
अग्निकेतु तथा कोपाग्निकेतु नामक चार भयंकर प्रतापी राक्षस बार-बार गर्जन तथा धनुष
का घोर टंकार करते हुए उमड़कर आनेवाले मेघों के समान शर-वृष्टि करने लगे । तब
सूर्य-वंश-तिलक राम ने सहज ही चार बाणों से उन चारों राक्षसों के सिर उड़ा दिये ।
४५. युद्ध-भूमि का वर्णन
इस प्रकार घोर द्वंद्व-युद्ध के अविराम गति से चलते रहने से, सारी युद्ध-भूमि में
टूटे हुए असंख्य धनुष, खंडित शर, चूर-चूर हुई गदाएँ, खंडित करवाले, टूटे हुए भाले तथा
मुद्गर, धूलि के समान बने हुए परिघ तथा खड्ग, खड-खड बने हुए चक्र तथा शूल, चूर्ण
के समान बने हुए लट्ठ, खंडित रथ-चक्र, छटपटाते हुए अश्व, गिरकर मिट्टी चाटनेवाले
सारथी, सभी दिशाओ में बिखरकर पडे हुए आभूषण, टूटकर गिरे हुए रत्न, कटे हुए हाथ
तथा मरकर गिरे हुए असुर भयोत्पादक ढंग से स्थान-स्थान पर पड़े हुए दिखाई दे रहे थे ।
वह युद्ध-क्षेत्र राम के वशीभूत उस क्षुब्ध-समुद्र की समता करता था, जिसका गर्व
राम ने अपने दुर्दमनीय शरो के प्रहार से भग्न कर दिया था और फलस्वरूप उसके
समस्त जल के सूख जाने से जल में निवास करनेवाले वृहदाकार मीन, मकर तथा उरग
छटपटाने लगे थे । उस युद्ध-भूमि में घड इस प्रकार हिल रहे थे, मानो कह रहे हो कि
जो रावण गर्वांध होकर सीता को ले आया है, उसकी धड पर सिर कैसे रह सकेगा ?
(कट-कटकर मरे हुए लोगो की) मज्जा रूपी कीचड, केश-समूह-रूपी सैंवार, खोपडी-रूपी
सीप, खंडित होकर गिरे हुए शिला-
कोई कह रहा था 'छोडो मत, मारो', तो कोई कहता था, 'सिर काट लो, सिर काट लो ।
कोई पूछ रहा था--'कहाँ है ?' तो कोई कहता था--'यहाँ आने दो, यहाँ ।' इस प्रकार,
की विविध ध्वनियो के साथ हुकार तथा अट्टहास की ध्वनि करते हुए जब राक्षस तथा
वानर युद्ध करने लगे, तब सारा आकाश धूलि से व्याप्त हो गया । क्रमश अधकार वढ
जाने मे राक्षस-सैनिक भ्रम से अपने ही पक्ष के लोगो पर अस्त्र चलाकर मार डालते थे ।
वानर भी अत्यधिक क्रोध से उन पापी राक्षसो से जूझकर रथियो को मार डालते थे,
सारथियो को चीर डालते थे, रथ के अश्वो को नष्ट-भ्रष्ट कर देते थे और रथो को
ऊपर उठाकर पृथ्वी पर ऐसे पटकते थे कि उनके टुकडे-टुकडे हो जाते थे । फिर, वे गजो
पर बैठे योद्धाओ का गर्व तोड़कर, मत्त गजो को पैरो से पकड़कर उन्हें ऊपर उठाकर, नीचे
पटककर मार डालते । तितर-वितर होकर दौडनेवाले अश्वो को पकड़कर ऊपर उठाते,
और उन्हें वेग से घुमाकर नीचे ऐसे पटक देते थे कि खून बहने लगता । पदचर-सैनिको
को ऐसा मारते कि उनकी रीढें, वक्ष, पसलियाँ, भुजाएँ, मुँह, दाँत, सिर तथा भेजा
छिन्न-भिन्न होकर चारो ओर बिखर जाते । रथो के सतत सचलन से उत्पन्न तथा अश्वो
के खुरो से उठी हुई धूलि आकाश की ओर इस प्रकार उड रही थी, मानो राक्षसो के
मन की कालिमा चारो ओर व्याप्त हो गई हो । धूलि के अधकार से मिलकर आकाश
भर में व्याप्त होने से वह रात्रि राक्षसो तथा वानरो के प्राणो को हरनेवाली प्रलय-काल
की रात्रि के समान दीख रही थी ।
अपने लिए रात्रि अनुकूल होने से सभी राक्षसो ने अपने गर्जनो से त्रिकूटाचल को
गुजायमान करते हुए युद्ध-सन्नद्ध होकर एक साथ राम को घेर लिया और उन पर बाण-
वृष्टि करने लगे । तब राम ने अग्नि-बाण चलाकर अधकार को दूर कर दिया और अपने
साथ युद्ध करनेवाले महोदर, महापार्श्व, सारण, शुक, वज्रदत तथा महाकाय पर वडे वेग
से बाण चलाये । उनसे पीडित हो वे छहों भय-त्रस्त राक्षस भाग खड़े हुए । बचे हुए
अन्य राक्षस-सैनिक राम के तीव्र शरो मे नष्ट हो गये ।
४६. इन्द्रजीत का माया-युद्ध
अगद के हाथो ने फेंके हुए गिरि-शृग के कठोर प्रहार से रथ, सारथी तथा अश्वो
को खोकर इंद्रजीत शीघ्र यज्ञ-शाला की ओर गया । राक्षस आवश्यक हवन-सामग्री ले
आये । तब उसने, रक्तवर्ण के अधोवस्त्र, उत्तरीय तथा शिरोवस्त्र तथा पुष्प-मालाएँ पहनी ।
फिर, उसने अग्नि के योग्य परिस्तरण (होमकुड के चारो ओर रखे जानेवाले कुश) के
रूप में भाले, भयंकर शस्त्र तथा शर रखे और क्रमशः काले वकरे के कठ के रक्त तथा
ताल की समिधाओ से होम करने लगा । तब अग्नि, बिना धुआँ छोडे विजय की सूचना
देनेवाली अपनी चचल शिखाओ को व्याप्त करते हुए जलने लगी और इंद्रजीत से प्रस्तुत
आहुतियां को ग्रहण किया । इस प्रकार, इन्द्रजीत ने अत्यत भक्ति से यथाविधि हवन पूरा
किया और अग्निदेव से चार घोडो तथा विविध शस्त्रास्त्रो से युक्त एक स्वर्ण-रथ प्राप्त किया ।
इसके पश्चात् वह उस रथ पर आरूढ होकर, ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करनेवाले
अपने भयंकर गर्जनो से इन्द्रादि देवताओ को भयभीत करते हुए राक्षस-सेनाओ के पास
आया और अदृश्य होकर, आकाश से ही, राम-लक्ष्मण पर घोर अस्त्रो की वर्षा करने लगा ।
राम तथा लक्ष्मण ने भी असख्य शर आकाश की ओर चलाये, किन्तु उनमें मे एक भी
इन्द्रजीत को नही लगा । वह राक्षस आकाश में अदृश्य रहकर वडे गर्व से सभी दिशाओ
में घूमते हुए श्रेष्ठ वानर-वीरो का सहज ही नाश करने लगा । सूर्य-किरणो के समान
आकाश से आनेवाले उसके क्रूर अस्त्र, वानरो तथा रामचन्द्र को दिखाई पडते थे, किन्तु
उसके रथ की ध्वनि, घोडो के खुरो की ध्वनि, धनुष का टकार, सारथी की बातें, कोडे
की ध्वनि, रथिक (इद्रजीत) का गर्जन तथा उसका रूप, रथ तथा उसकी ध्वजाएँ कही
भी दिखाई नही देती थी । यह विचित्र युद्ध उस कपि-सेना को ऐसा लग रहा था, मानो
वालि का सहार करनेवाले राम पर क्रुद्ध होकर इन्द्र अपने पुत्र के वध का प्रतिशोध लेने
के उद्देश्य से भयकर बाणो की वर्षा कर रहा हो । कपि-सैनिको के अगो को खडित होते
हुए देखकर रामचन्द्र से लक्ष्मण बोले-- 'हे देव, आकाश में छिपकर युद्ध करनेवाले इस
राक्षस के
३०६ रंगनाथ रामायण
ओर से उसके घर आते थे । यह देखकर इन्द्रजीत ने उन दोनों सूर्यवंशियों को नागपाश
से ऐसे बाँध दिया, मानो कह रहा हो कि सर्प के साथ रहना तुम्हारे लिए पहले से ही
सहज रहा है, अब भी उनके साथ ही रहो । राम-लक्ष्मण ने भी (इन्द्रजीत को प्राप्त)
ब्रह्मा के वर का सम्मान करने का निश्चय किया और वे आदिनारायण के वंशज, उस
राक्षस-राजकुमार के द्वारा प्रयुक्त नाग-पाश से बँध गये । 'ये आज राम का रूप धारण
किये हुए हैं, किन्तु विचार कर देखा जाय, तो इन्हीं ने वामन का रूप धारण करके तीन
पग भूमि माँगी थी और कृतघ्न हो बलि को बाँधा था । भला उसका फल, मनुष्य का जन्म
लेने के पश्चात् मिले बिना कैसे रहेगा'—इस प्रकार के लोक-कथन के अनुकूल ही रामचन्द्र
अपने द्वारा उत्पन्न माया से आप बँध गये ।
माया के बंधनों में बँधे हुए राम सुध-बुध सोये-से पड़े रहे । यह देखकर देवता
दिग्भ्रांत हुए और वानर खिन्न हुए । तब दुःखी सुग्रीव को देखकर विभीषण ने कहा—
'हे सुग्रीव, ऐसे क्यों दुःखी हो रहे हो ? चाहे कैसा भी व्यक्ति क्यों न हो, उसके जीवन में
विपत्तियाँ तो आती ही हैं । यदि सूर्यवंशज नाग-पाश से बँधे हुए हैं, तो क्या हुआ ?' यों
कहकर उसने अपनी माया की दृष्टि से रावण के पुत्र को आकाश-वीथी में देखा और जल
को अभिमंत्रित करके उससे राम-लक्ष्मण की आँखों को पोंछकर, उन्हें मेघनाद को दिखाया ।
उसके बाद सुग्रीव ने तुरन्त एक विशाल पर्वत को उखाड़कर इंद्रजीत पर फेंका, किन्तु उसने उसे बीच
में ही खंड-खंड कर दिया और तीव्र शर-वृष्टि से सुग्रीव को ऐसे त्रस्त एवं व्याकुल कर
दिया कि सुग्रीव को समर में पीठ दिखानी पड़ी । जो राक्षस सुग्रीव के प्रताप से भयभीत थे,
वे इसे देखकर बहुत हर्षित हुए । इंद्रजीत इस विजय से अत्यधिक मोद-मग्न हो, अपने
सैनिकों के साथ लंका में वापस चला गया और रावण से कहने लगा—'मैंने सर्प-बाणों से
कपियों का नाश किया और इक्ष्वाकु-वंशजों को व्याकुल कर दिया है ।'
अपने पुत्र की वीरता पर मन-ही-मन हर्षित होते हुए रावण ने शीघ्र ही त्रिजटा
को बुलाकर कहा—'राम को प्राप्त करने का दृढ़ विश्वास अपने मन में धारण किये रहने
में भूमिसुता मेरा तिरस्कार कर रही है । आज इन्द्रजीत के हाथों में राम की जो दुर्गति
हुई है, उसे सीता को दिखाओ । सीता को शीघ्र पुष्पक-विमान पर बैठाकर ले जाओ और
राम की दशा दिखा लाओ, जिससे वह राम की आशा छोड़कर मुझे स्वीकार करे ।'
४७. नाग-पाशबद्ध दाशरथियों को देख सीता का दुःखी होना
रावण की आज्ञा मानकर त्रिजटा दानवियों के साथ सीता को पुष्पक-विमान पर
बैठाकर ले आई और युद्ध-क्षेत्र में गिरे हुए वानरों तथा राम-लक्ष्मणों को दिखाया । वह
कमल-लोचनी उनकी दशा देखकर अत्यंत दुःखी होकर अविरत अश्रुधारा बहाती हुई विलाप
करने लगी। वे कहने लगी—"हाय राम, आपकी धनुर्विद्या कहाँ लुप्त हो गई ? आपमें ही स्थित हरि
तथा हर आदि देवों को भी भयभीत करनेवाली आपकी बाण-शक्ति आज कैसे नष्ट
हो गई ? इस संसार में आप ही अकेले परशुराम की भी उपेक्षा करने की शक्ति रखते हैं।
सभी मुनि तथा नाग, आपकी सहायता के लिए सतत तत्पर रहते हैं । हाय, ऐसे
नाग आज आपको बाँधनेवाले पाश बन गये हैं ! सामुद्रिकों ने मुझे देखकर कहा था कि
युद्धकांड ३०७
तुम्हारे शरीर में सब प्रकार के शुभ चिह्न हैं, तुम्हारे चरणतलो में रेखाएँ तथा कमल हैं;
इसलिए पति के साथ तुम्हारा राजतिलक होगा, तुम्हें योग्य पुत्र उत्पन्न होंगे और तुम
चिरसुहागिन रहोगी। हे सूर्यवंशतिलक, उनकी सभी बातें आज मिथ्या हो गईं ।
उन्होने मुझे देखकर यह भी कहा था कि 'तुम्हारे (सीता के) चिकुर भ्रमर-समूह के
समान नीले तथा सुदर हैं, कटि क्षीण है, एक दूसरे से मिलनेवाली टेढ़ी भौहें हैं, बिजली
की-सी कांति से युक्त दाँत हैं, विकृतिहीन स्थूल तथा वर्तुलाकार जाँघें हैं, हाथ, ललाट,
नेत्र, मुँह तथा चरण सुंदर लक्षणो से समन्वित हैं, कांतियुक्त तथा स्निग्ध नखो से युक्त
सुदर अगुलियाँ हैं, वर्तुलाकार, विवर्द्धित तथा सूक्ष्म अग्रभाग से युक्त दो कुच हैं, स्निग्ध
एव विशाल वक्ष तथा पार्श्वभाग हैं, नाभि गंभीर तथा सुदर है तथा तुम्हारा शरीर दिव्य
तथा कमनीय काति से समन्वित है, अत तुम्हारे समान भाग्यशालिनी कोई नही है।' हे राजन्,
मेरा वह भाग्य आज ऐसा फूट गया है ? आर्यो की यह उक्ति कि ऐसे षोडश लक्षणो से
सम्पन्न रमणी अत्यत भाग्यशालिनी होगी, आज मिथ्या सावित हुई । हे राजन्, यह सब
मेरे दुर्भाग्य का फल है। आर्यों का कथन है कि जिस कन्या के, लाल कमल की-सी सुंदर
हथेलियाँ हो, पल्लव के समान अरुण कान्तिवाले चरण हो, क्षीण कटि हो, मदहास से
युक्त मुख-कमल हो, वह चिर सौभाग्यवती होती है। यह कथन भी झूठ ही साबित हुआ ।
हे राजन्, मेरी साधना का यही परिणाम हुआ । मुझे चुराकर ले आनेवाले भयकर राक्षस
की खोज करके मेरा पता आपने जान लिया, समुद्र को बाँधकर कपि-सेना के साथ इस
पार चले भी आये, पर हाय, एक 'गोपद' में आप डूब गये ! हे राजन्, भयंकर याम्य शर,
वरुणास्त्र, आग्नेयास्त्र तथा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना आप भूल तो नही गये ? कोई भी
शत्रु, आपके दृष्टि-पथ में पड़ जाने मात्र से वह प्राणो से हाथ धो बैठता था, अब आपकी
ऐसी दशा हो गई है ! दैव-योग से ही ऐसा हुआ है, अन्यथा किसकी शक्ति है कि आपका
सामना करे । यदि मेघनाद अपनी माया के बल से युद्ध में आपको ऐसे भयकर पाशो से
बाँध सका, तो स्पष्ट है कि विधि-विधान का अतिक्रमण करना किसी के लिए संभव नही है।
हे नाथ, हे वीर, हे रामचन्द्र, मै अपने लिए नही रोती, आपके लिए नही रोती, आपके
लिए अपने प्राण त्यागनेवाले काकुत्स्थ-वशज लक्ष्मण के लिए भी मै दुःखी नहीं होती, मेरे
दुःख को देख द्रवीभूत हृदय से शोक करनेवाली अपनी माँ के लिए भी दुःखी नही होती,
किन्तु सतत केवल आपका ही ध्यान अपने मन में धारण किये रहनेवाली माता कौसल्या
के लिए विलाप करती हूँ । कब चौदह वर्ष समाप्त होगे, कब राम अयोध्या में आयेंगे-
ऐसी प्रतीक्षा करनेवाली आपकी माता की आशाएँ आज मिट्टी में मिल गईं ।"
इस प्रकार, विलाप करनेवाली जानकी को सांत्वना देते हुए अत्यन्त दयार्द्र चित्त से
त्रिजटा सीता से बोली- 'हे कमल-लोचनी, राम पर कोई विपत्ति आ नहीं सकती । आप
क्यो इस प्रकार शोक कर रही है ? यदि वानर-सेना ऐसी निर्वल है, तो ये इतना बड़ा
कार्य-भार उठाते ही कैसे ? वहाँ देखिए, वानर, बड़ी सावधानी से आपके प्रभु की रक्षा
वंगे कर रहे हैं ? हे भूपुत्री, आप निश्चित रहिए । यदि ऐसा नही होता (यदि राम पर
कोई विपत्ति आनेवाली है), तो वह पुष्पक-विमान पृथ्वी पर गिरे बिना कैसे रहता ?