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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 508 में से

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पृष्ठ 323

परिवृत हो विशाल रत्न-सिंहासन पर आरूढ था तथा आयुधो की उज्ज्वल प्रभा से दीप्ति-
मान् होता हुआ, अस्ताद्रि पर विलसित होनेवाले सूर्य की समता करता था । बिजली से
युक्त नील मेघो के समान अपना हर्ष प्रकट करता हुआ वह अद्वितीय रूप से उस कंगूरे
पर शोभायमान हो रहा था । रावण की महिमा के कारण प्रभा-समन्वित उस कंगूरे को
देखकर रामचन्द्र आश्चर्य के साथ (विभीषण) से बोले—'हे विभीषण, प्रलय-काल के सूर्य-मण्डल
के समान भाममान होनेवाला यह कौन है ?' तब विभीषण ने राम से कहा---'हे देव,
वही मेरा अग्रज रावण है, जिसने इन्द्र आदि देवताओ को परास्त करके देव-कामिनियो को
वदी बनाया है और जो तीनो लोको को अपने शौर्य के प्रताप से जीतनेवाले बाहुबल से
सपन्न है ।'
३८. रावण तथा सुग्रीव का द्वंद्व-युद्ध
तब सुग्रीव ने राम से कहा--'हे प्रभो, यह राक्षस मदान्ध हो आपके समक्ष अपने
वैभव का ऐसा प्रदर्शन कर रहा है । मै अभी इस का गर्व भग करता हूँ ।' इतना कहकर
वह अत्यधिक क्रोध से, अलघु शौर्य-सपन्न गरुड के समान, मुकुट-रूपी शृङ्गो तथा विशाल
वक्ष-रूपी सानुओ से युक्त पर्वत-रूपी रावण पर अत्यत वेग से गिरनेवाले वज्र के समान,
सुवेल द्रि से उस रावण की ओर उडा । फिर, देवताओ के शत्रु उस रावण को तृणवत्
मानकर कहा—'हे रावण, सुनो, मै राम का सेवक हूँ । क्या, तुम अपना वैभव हमें दिखाने
का साहस करते हो ।' इतना कहकर उसने बडे दर्प के साथ उसके सभी मुकुटो को नीचे
गिरा दिया । तब नीचे लुढकनेवाली उसकी मुकुट-पक्ति ऐसे दीखने लगी, जैसे पूर्वकाल में
काल-रुद्र के प्रहार से नक्षत्र-पक्ति नीचे गिरने लगी थी । इससे अत्यत श्रुद्ध हो, दशकठ ने
वालि के अनुज को पकडकर नीचे पटक दिया, किन्तु सूर्यपुत्र शीघ्र ही उठकर अपने
प्रचड बाहु-बल का प्रदर्शन करता हुए उस राक्षस को उसके सभी हाथो के साथ पकडकर
इस प्रकार नीचे पटक दिया कि सभी दिशाएँ काँप उठी । इसके पश्चात् सुग्रीव ने उस
राक्षस की कनपटियो, ललाटो और स्कन्धो पर अधाधुध तमाचे लगाये, उसकी पीठ को नखो
से नोच दिया, और उसकी गर्दन को अपने टखनो के बीच दबाकर उसे कंगूरे से दे मारा ।
इस प्रकार, मल्ल-युद्ध करते हुए वे दोनो बहुत थक गये और पृथिवी पर गिरने लगे, किन्तु
दोनो फिर से सँभलकर कगरे पर ही युद्ध करने लगे । अत्यधिक शक्ति से, प्रतिक्षण पैंतरा
बदलते हुए, एक दूसरे को ढकेलते हुए, फिर एक दूसरे के निकट आकर ताल ठोककर
अलग होते हुए और शीघ्र ही एक दूसरे से भिडकर अपनी शक्ति दिखाते हुए, वे एक
दूसरे के वक्षो पर पदाघात करते, लिपटकर अपनी केहुनियो से एक दूसरे के अगो को
दबाते और अपने हाथो से एक दूसरे के सिरो को पकडकर इस तरह टकराते कि रक्त
की धाराएँ निकल पडती, फिर लडखडाते हुए कई प्रकार से कशम-कश करने के पश्चात्
एक दूसरे से हटकर अपने-अपने स्थान पर आ जाते और फूलती हुई साँसो से थोडी देर तक
चुप खडे रहते । इस प्रकार, युद्ध करते हुए दोनो के शरीरो से रक्त की धाराएँ ऐसी बहने
लगीं, मानो पर्वतो से लाल रंग की नदियाँ बह रही हो । तब रावण अपनी माया से
सुग्रीव को बाँधने का यत्न करने लगा । यह देखकर सुग्रीव आकाश की ओर उडा और