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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 508 में से

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पृष्ठ 318

२८८ रंगनाथ रामायण
आकाश को भी चूर-चूर कर देनेवाले हैं तथा पृथ्वी को भी टुकड़े-टुकड़े करने की क्षमता
रखते हैं । हे दशकंठ, उनका (क्रोध) शत्रुओं के लिए साक्षात् मृत्यु है । चूंकि, आप सीता
को ले आये, इसलिए वे युद्ध करने के लिए आये हैं, अन्यथा वे शरणागतों के, वज्र के
पिंजड़े के समान, रक्षक हैं, वे शूरों के भी शूर हैं । शरण की याचना किये बिना उनके
क्रोध का अंत नहीं होता । आपके ऊपर क्रोध करने के कारण ही उनकी आँखों में लालिमा
छाई हुई है । वे ही त्रिभुवनों के शासक सूर्यकुल-तिलक (राम) हैं ।
“वह देखिए, उनके भाई और शुद्ध स्वर्ण-वर्णवाले राम के अनुज लक्ष्मण धनुष धारण
किये खड़े हैं, अत्यंत आग्रह के साथ सप्त भुवनों को परास्त करने की शक्ति से संपन्न हैं ।
वे राम के प्राणाधार के समान हैं और उद्दण्ड पराक्रमी हैं । हे असुरेन्द्र, उस राजा राम
के पीछे आपके अनुज हैं, जो आपको युद्ध में परास्त करके लंका पर राज्य करने के
उद्देश्य से राम भूपाल के द्वारा राज्याभिषिक्त होकर बड़े आनंद से फूल रहे हैं । वे परम
धर्मानुसरण करनेवाले तथा नीतिवान् विभीषण हैं । हे देव, लक्ष्मण तथा विभीषण के
निकट ही जो खड़ा है, वह सुग्रीव हैं, जो सर्वमान्य गुणों से संपन्न हो किष्किन्धा का राज्य-
भार वहन कर रहा है । वह महनीय लक्ष्मी से संपन्न होकर स्वर्ण-माला धारण किये हुए हैं ।
वह दिग्तालबाहु तथा अत्यंत भयंकर शौर्य से विलसित हैं । उसकी सेना के बारे में
सुनिए । (कहते हैं कि) शतकोटि सहस्र संख्या का एक शंख होता है । ऐसे लाख शंखों
का एक महावृंद होता है और ऐसे लाख महावृंदों का एक पद्म होता है । एक लाख पद्मों
का महापद्म होता है और लाख महापद्मों का एक खर्व होता है । लाख खर्वों का एक
महाखर्व होता है, लाख महाखर्व एक समुद्र कहलाते हैं और लाख समुद्र महासमुद्र कहलाते हैं ।
लाख महासमुद्र, महदाख्य कहलाते हैं । बालि के अनुज के पास एक करोड़ महदाख्य सेना है ।
अब आप ही स्वयं विचार करके देख लें कि उनकी सेना कितनी बड़ी है । उसकी सेना
का आदि तथा अंत जानना असंभव है । उसके सामर्थ्य की समता और कोई सेना नहीं
कर सकती । वह सेना दुर्वार है । इसलिए हे देव, उस सेना से भिड़कर युद्ध करना असंभव है।”
शुक ने जब इस प्रकार कहा, तब रावण ने एक बार फिर सारी वानर-सेना का
पर्यवेक्षण किया और गर्भ में वडवानल प्रज्वलित होनेवाले समुद्र की भाँति मन-ही-मन
भयभीत हुआ, किन्तु अपने भय को दबाकर, निर्भीक की भाँति क्रोध प्रकट करते हुए कहा--
'अपने स्वामी की इच्छा के विरुद्ध, कोई मंत्री मंत्रणा देकर उसको विचलित करे,
यह कैसी नीति है ? तुम बिना विचार किये, मेरे सामने मेरे विरुद्ध इस प्रकार की बातें
कह रहे हो । क्या, यह तुम्हारे लिए उचित है ?' रावण के इतना कहते ही शुक तथा
सारण भयभीत हो, अपना सिर नीचा किये वहाँ से चले गये ।
३५. राम के माया-धनुष तथा सिर दिखाकर सीता को भयभीत करना
उनके चले जाने के पश्चात् रावण अपने अंतरंग सचिवों के साथ बड़ी देर तक
मंत्रणा करता रहा और फिर उन्हें विदा करके दुर्धर हो, विद्युज्जिह्व नामक एक राक्षस
को बुलाकर कहा-'तुम अपनी माया से राम के सिर तथा धनुष का निर्माण करके शीघ्र
ले आओ ।' वह तुरंत गया और अपनी सारी निपुणता तथा माया से बनावटी सिर तथा