रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 321, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो नीतियुक्त कार्य करता है, उस राजा के राज्य की सतत वृद्धि होती रहती है ।
नीच व्यक्ति से विग्रह और बलवान् से संधि करना विबुध-जनो का उपदेश है । सूर्यवंश-
तिलक हमसे अधिक बलवान् है, देवताओ के कार्य के लिए उन्होने पृथ्वी पर जन्म लिया है।
दैवबल भी उन्ही को प्राप्त है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि वे धर्मात्मा है ।
उन्हें ऋषियो के सतत आशीर्वाद प्राप्त है । तुम तो सदा देवताओ को पीडित तथा ब्राह्मणो
का नाश करते हुए पाप-चिंता में लीन रहते हो । विजय सदा धर्म की ओर ही झुकी
रहती है, अधर्म की ओर नही । उस दिन तुमने ब्रह्मा से अन्य सभी लोगो के हाथो से
न मरने का वर प्राप्त किया था, किन्तु इस प्रकार तुम पर आक्रमण करनेवाले नर तथा
वानरो पर विजय पाने का वर प्राप्त नही किया है । किसी भी रीति से देखा जाय,
उनके हाथो से तुम्हारा नाश निश्चित है। इतना ही क्यो, होनहार की सूचना देनेवाले
कितने ही शकुन दिखाई पड रहे है । विपुल होम-धूम त्रस्त-सा हो गया है । राक्षसो के
तेज का अंत-सा हो रहा है। हमारे गृहो में कई प्रकार की विपत्तियो का जन्म हुआ है ।
इसलिए तुम जान लो कि वे (राम) आदिनारायण है और ऐसा करने के लिए (तुम्हारा
वध करने के लिए) इस संसार में जन्मे है । राम से विग्रह तुम्हें शोभा नही देता ।
इसलिए तुम अपना हठ छोड़ दो । राम का शर औद्धत्य का सहन नही करता ।
अतः हे दानवेन्द्र, सीता को ले जाकर राम को सौंप दो और अपने वंश की
रक्षा करो ।'
तब रावण ने माल्यवान् को रोषपूर्ण नयनो से देखकर कहा--'मै अद्वितीय
प्रताप और दक्षता से संपन्न तथा सतत विजयी होनेवाला हूँ । तू मेरे सामने मेरे शत्रु की
प्रशंसा कर रहा है । अब मै तुझे क्या कहूँ ? तू कभी अपनी कायरता नही छोड़ता ।
भला, मै सीता को क्यो देने लगा ? मुझे किसका भय है कि मै सीता को दे दूँ ?'
उसके उद्धत वचनो को सुनकर माल्यवान् ने कहा--'मेरी बातो का अनादर करके तुम
रामचन्द्र को युद्ध में कैसे जीतते हो, यह मैं भी देखूँगा । हम जायेंगे कहाँ ? (इन्ही
आँखो से) देखेंगे ही।' इस प्रकार क्रोध में आकर माल्यवान्, कुछ और परुष वचन कहते
हुए, वहाँ से चला गया ।
उसके पश्चात् असुरेन्द्र ने पहले, अनुपम पराक्रमी प्रहस्त को पूर्व के द्वार की रक्षा
के लिए भेजा, अक्षीण बली महोदर तथा महापार्श्व को दक्षिण के द्वार पर भेजा, अपने
पुत्र इन्द्रजीत को पश्चिम के द्वार पर नियुक्त किया, उत्तर द्वार की रक्षा के लिए शुक
तथा सारण को नियुक्त किया और नगर के मध्य भाग की रक्षा के लिए विरूपाक्ष को
आज्ञा दी । इस प्रकार, लंका के रक्षण की समुचित व्यवस्था करके रावण अन्तःपुर में
चला गया ।
वहाँ राम ने सुग्रीव विभीषण, अंगद, जाम्बवान्, सुषेण, नील, नल, हनुमान्, गवाक्ष
आदि वानरो को, (उनसे) परामर्श करने के लिए बुलाया और कहा-'अब हम सब प्रकार
के अवगुणो का आगार, तथा देवताओ के शत्रु रावण की लंका का पर्यवेक्षण करें । देखो,
उस एक दुष्ट के कारण उसका सारा वंश नष्ट होनेवाला है ।'