रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधनुष का निर्माण करके ले आया । रावण ने उसे अच्छा पुरस्कार दिया । वहाँ से रमणीय
अशोकवन में जाकर दनुजेश्वर ने सीता को देखा । उस समय सीता सिर झुकाये अत्यन्त
चिंता में पड़ी, कातर दृष्टि से पृथ्वी को इस प्रकार देख रही थी, मानो वसुंधरा को कोस
रही हों कि हे माता, तुम मुझे इतना अधिक दुख क्यों दे रही हो ? उनकी आँखो मे
अविरल अश्रुधारा इस प्रकार वह रही थी, मानो उनके चित्त का क्रोध भीतर न रह सकने के
कारण धाराओ के रूप में बह रहा हो । उनका शरीर ऐसा धूलि-धूसरित था, मानो पृथ्वी
यह कहती हुई उनसे लिपट गई हो कि हे पुत्री, यह कैसा दुर्भाग्य है कि तुम ऐसी दुरवस्था
को प्राप्त हुई हो । वे इस प्रकार बैठी हुई थी, मानो रावण के क्रूर कर्म ही देवता का
रूप धारण कर यह निश्चय करके बैठा हो कि हे रावण, मै तुम्हारे तथा तुम्हारे राक्षस-
कुल का सर्वनाश करके ही यहाँ से उठूँगा । वे बार-बार ऐसे दीर्घ निःश्वास छोड़ रही थी,
मानो राक्षस-रूपी नीरस वृक्षो को विध्वस्त करने में प्रयत्नशील प्रलय-काल की अग्नि हो ।
अपनी ओर ध्यान दिये बिना बैठी हुई सीता को देखकर, सर्वनाश के लिए
उद्यत रावण ने कहा—'हे जानकी, मूर्ख तथा अविवेकी खरदूषण आदि राक्षसो का वध
करने मात्र से तुम राम के शौर्य का विश्वास करती हो और मेरे शौर्य को कभी अपने
मन में भी नही लाती । जब राम बडे दर्प से अपनी सेना के साथ समुद्र को पार करके,
वानरो के साथ सुवेलाद्रि पर सो रहा था, तब मेरे एक प्रिय सेवक ने उसका वध करके
उसके धनुष तथा सिर ले आया है । राम का प्रिय अनुज, तथा वानर परास्त होकर भाग
गये हैं । इसलिए हे कमलमुखी, तुम अब राघव की आशा छोड़ दो और मेरी तथा मेरी
स्त्रियो के लिए अधीश्वरी बनकर रहो ।'
इस प्रकार कहने के पश्चात् उसने विद्युज्जिह्व को बुलाकर, राम के सिर तथा
धनुष को सीता के सामने लाने की आज्ञा दी । तब उसने कहा—'हे सुंदरी, यह लो, राम
के सिर तथा धनुष ।' इतना कहकर वह उन दोनो को सीता के सामने फेंककर हँसते हुए
चला गया । उसी समय आकाशवाणी हुई—'राम भूपाल युद्धभूमि में असुर (रावण) का
सिर काटेंगे, यह तुम्हारे पति का सिर नहीं है । तुम विचलित मत होओ । तुम्हारे धर्मा-
चरण के प्रभाव से रामचंद्र अवश्य विजयी होंगे ।' (फिर भी) उस चचलाक्षी सीता ने
उस सिर को देखा और राम की आँखें, मुँह, ललाट, मौलि-रत्न की प्रभा, दंत-पंक्ति और
कर्ण-पुटों का सौंदर्य तथा अधरो की कांति का स्मरण करके उस सिर को राम का ही
सिर समझकर मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर ऐसे गिर पडी, मानो पृथ्वी माता ही उस लतांगी
को अपने हृदय पर लिटाकर उन्हें सांत्वना दे रही हो कि 'यह मिथ्या है । तुम्हारे पति का कोई
अहित हो नही सकता । हे सुंदरी, यह माया है, इसकी ओर तुम्हें देखना नही चाहिए ।'
थोड़ी ही देर में सीता सँभल गई और शोकाग्नि से मतप्त होती हुई बोली--'हाय,
हे कैकेयी, कलह को जन्म देकर तुमने इस प्रकार इक्ष्वाकु-वश का सर्वनाश किया है ।
राघवेन्द्र ने तुम्हारा क्या बिगाडा था कि तुमने उन्हें अनावश्यक ही वन में जाने की
आज्ञा दी ? हे पृथ्वीपति, मैने पूर्ण विश्वास किया था कि आपने समुद्र पर सेतु बाँधा है,
और आप अवश्य मुझे छुड़ाकर ले जायेंगे, किन्तु मैं यह नही समझती थी कि भगवान्
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