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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 508 में से

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पृष्ठ 320

२६० रंगनाथ रामायण
मेरी ऐसी गति करेंगे । हे काकुत्स्थ, आपके और मेरे प्राण एक हैं, उस कथन को आप
इस प्रकार मिथ्या साबित कर रहे हैं, क्या, यह आपके लिए उचित है ? हे सूर्यकुल-
तिलक, पति से पहले ही प्राण देने का सौभाग्य मुझे नहीं मिला । आप भले ही जायें,
मैं भी तुरंत ही अपने प्राण आपके पास भेज दूँगी । पृथ्वी मेरी माता है और आप मेरे
पति हैं । क्या, आपके लिए यह उचित है कि आप मुझे पुन वसुधा की गोद में पहुँचा दें।
अग्निदेव के समक्ष आपने मेरे पिता से मुझे ग्रहण किया था । अब इस प्रकार आपका
मुझसे विलग हो जाना, क्या आपके लिए उचित है ? हे राम, न जाने क्यों आपको इस
दशा में देखकर भी मेरा हृदय सतप्त नहीं हो रहा है । मेरा हृदय जब मतप्त नहीं होता,
तो निश्चय ही आपकी यह दशा नहीं हुई होगी ।' इस प्रकार सोचती हुई सीता विलाप-
करने लगी ।
उसी समय द्वारपालों ने आकर दनुजेश्वर से निवेदन किया—'हे देव, किसी अत्यंत
आवश्यक कार्य के उपस्थित होने से आपके मंत्री सभा-स्थल में आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
उनका संदेश लेकर आये हुए प्रहस्त आदि राक्षसवीर द्वार पर खड़े हैं ।' यह सुनकर
रावण तुरंत सभास्थल के लिए रवाना हो गया । उसके जाते ही, वे माया सिर तथा
धनुष भी ऐसे अदृश्य हो गये, मानो रावण की लक्ष्मी भी इसी प्रकार शीघ्र ही अदृश्य
हो जायगी । सभास्थल में पहुँचकर रावण ने जब गुप्तचरों से सुना कि राम शीघ्र ही
आक्रमण करने का यत्न कर रहा है, तब उसने बड़े धैर्य के साथ ढिंढोरे पीटकर नगर में
इन समाचार को प्रकट कराने का आदेश दिया और अपनी सेना को एकत्रित करने के
लिए वेत्रधरों को भेजा ।
यहाँ सरमा सीता को देखकर कहने लगी—'हे माता, तुम ऐसे क्यों प्रलाप करती हो ?
रावण की बातें सत्य नहीं हैं, उन्हें मिथ्या जानो, क्या तुम इतना भी नहीं जानती
कि तुम्हारे सामने जो सिर फेंका गया था, वह माया का सिर था । इस राक्षस के दुर्वचन
सुनकर मैं सत्य समाचार जानने के लिए गई थी । मेरी बातें सुनो । राम युद्ध करने के
लिए आ रहे हैं । यह समाचार सुनते ही देवताओं का शत्रु (रावण) विचलित हो उठा ।
वह सुनो, ढिंढोरे का शब्द हो रहा है । राक्षसों के भयंकर रथों के दौड़ने की ध्वनि सुनो।
लो, वह सुनो, रथिकों तथा सारथियों के संभाषणों की ध्वनि सुनाई पड़ रही है । इसलिए
हे कुटिल-कुंतले, तुम चिंता मत करो । राम पर किसी प्रकार की विपत्ति नहीं आई है ।'
इसी समय लंका को विदीर्ण करनेवाले गर्जन के साथ आनेवाली वानर-सेनाओं को
देखकर रावण ने चिंताग्रस्त चित्त से अपने मंत्रियों को शीघ्र बुलाकर कहा—'वह देखो,
राघव युद्ध करने के लिए आ रहा है । तुम अब अपनी अमित शक्ति का परिचय देते
हुए शीघ्र जाओ और उन दोनों मानवों को मारकर, वानर-सेना का वध कर डालो ।
जाओ, शीघ्र जाओ ।'
३६ माल्यवान् का हितोपदेश
तब रावण को देखकर नीतिवान् माल्यवान् ने कहा—'हे राजन्, उचित समय में
संधि कर लेना श्रेयदायक होता है और उचित समय पर वैर ठानना शुभ-प्रद होता है ।