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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 508 में से

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पृष्ठ 322

५६२ रंगनाथ रामायण
३७ सुवेलाद्रि पर से राम-लक्ष्मण का लंका को देखना
इतना कहने के पश्चात् राम ने अपने अनुज तथा सुग्रीव आदि वानरों के साथ
सुवेलाचल का आरोहण इस प्रकार किया, मानो कह रहे हों कि गुणवान् आदमी अपने वंश
में इसी प्रकार उन्नति के शिखर पर चढ़ता है । वहाँ से उन्होंने अपने हाथों से नष्ट होने-
वाली उस लंका को देखा । उस नगर के गोपुरों पर जड़ी हुई मणियों की प्रभा इतनी
उज्ज्वल थी, मानों हनुमान् ने जो अग्नि लगाई थी, वह उस दिन तक वैसे ही दीप्त
हो रही हो । बड़े-बड़े कंगूरों से युक्त उस नगर का प्राकार, ऐसा दीख रहा था, मानो
राम के बाणों के प्रहारों से संभ्रमित एवं परितप्त होनेवाले रावण-रूपी मृग को भाग
जाने से रोकने के लिए ही प्रलयकाल के यम-रूपी शिकारी ने चारों ओर से घेरा लगा
दिया हो ।
उस दुर्ग की मीनारों पर दीखनेवाली चित्र-विचित्र ध्वजाएँ तथा तोरण ऐसे दीख
रहे थे, मानो मीनारें-रूपी स्त्रियाँ सूर्य के प्रकाश में उज्ज्वल दीखनेवाले सुंदर तोरण-रूपी
मंगल-सूत्रों से अलंकृत हों, सुंदर ध्वजाएँ-रूपी अपने हाथों को हिलाती हुई (राम का)
स्वागत कर रही हों—'हे राम, रावण का संहार करने के लिए शीघ्र चले आओ ।' उस
दुर्ग की परिखाएँ इतनी विशाल एवं गहरी थीं, मानो रावण-रूपी जंगली भैंसे को पकड़ने
के लिए यम ने अनुकूल खड्डे खोद रखे हों । नगर के उज्ज्वल सौध आकाश का स्पर्श
करते थे और ऐसे दीख रहे थे, मानो रावण ने कैलास पर्वत को उखाड़कर और उसे यहाँ
लाकर सुंदर ढंग से फिर से उसका निर्माण किया हो । उस नगर से तुरही की ऐसी
ध्वनि निकल रही थी, मानो लक्ष्मी राम के स्वागतार्थ आ रही हों । उस नगर में कितने
ही ऐसे उपवन थे, जिनके असंख्य वृक्ष शुकों की बोली से हर्षित होते, भ्रमरों के गुंजन से
आनंदित होते, कोयलों के कल-कूजन से संतुष्ट होते, सुंदर सारिकाओं के संचालन से दीप्त
होते, शाखाओं और मन-रूपी पल्लवों को राग-रंजित करते तथा सतत व्याप्त होनेवाले पुष्पों
के सुगंध-भार से महक रहे थे । उस नगर के कमलाकर कमला (लक्ष्मी) के मन-कमल
के समान थे । ऐसे नगर को आश्चर्य से देखनेवाले राघव को अपने प्रताप का ताप प्रदान
करके भगवान् सूर्य पश्चिम समुद्र में डूबने लगे । तब राम ने उन्हें प्रणाम किया और
सुवेलाद्रि पर ही उन्होंने रात्रि बिताई ।
प्रातःकाल होते ही सभी कपि अत्यधिक हर्ष से विनोद करते हुए उस पर्वत के
जंगल में शीघ्र गति से चले गये और वहाँ अपने भयंकर निनादों से सिंह तथा हाथियों
को भगाने लगे । उनके निनाद राक्षसों की अस्थियों को कँपाते हुए सारी लंका में व्याप्त
हो गये ।
इस ध्वनि को सुनकर रावण यह जानने की इच्छा से कि वह कैसी ध्वनि है, अपने
सौध के कंगूरे पर चढ़कर देखने लगा । उस समय उनके साथ उस कंगूरे की शोभा
अत्यंत उज्ज्वल दीख रही थी । परिचारक-गण उनके ऊपर धवल छत्रों की छाया कर
रहा था; धवल चँवर डुला रहा था । ऐरावत के दाँतों के प्रहार का सहन किये हुए उनके
वक्ष पर मणिमय हार डोल रहे थे । इस प्रकार के वैभव से युक्त वह विविध राक्षसों से