रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 237, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकांड २०७
अब मैं बहुत वृद्ध हो चला हूँ । मेरी अवस्था नब्बे वर्ष की है । अब मैं ऐसा कार्य करने
योग्य नही रहा । तब नील ने कहा—'मै नब्बे योजन की जलधि को पार कर सकता हूँ ।
मारुति अपनी शक्ति का परिचय दिये बिना चुपचाप बैठा रहा । तब अगद ने कहा—
'मै अत्यधिक प्रयत्न से शत योजन पार कर सकता हूँ, किन्तु कदाचित् लौटकर आ नही
सकता ।'
तब जाम्बवान् ने अगद से कहा—'हे अनघ, तुम हमारे नेता हो । तुम इम समुद्र
को पार भी कर सकते हो और लौट भी सकते हो । तुम सुग्रीव के समान इम वानर-
सेना के राजा हो । अत तुम्हारे लिए उचित यही है कि तुम हम से काम लो । इतनी
दीनता क्यो व्यक्त करते हो ? राम के कार्य में सतत तत्पर रहनेवाले, रवि-पुत्र के मत्री,
इस वानर-समूह के लिए प्राण-सम, पवन-कुमार के रहते, भला तुम्हारे लिए कौन-सा कार्य
असाध्य है ? तुम निश्चित रहो ।"
२२. समुद्र लाँघने के लिए हनुमान् को प्रेरित करना
इसके पश्चात् जाम्बवान् ने हनुमान् को बुलाकर बडे स्नेह से कहा—"हे पवन-सुत,
यह क्या उचित है कि अपना काम हम पर छोडकर स्वय चुपचाप बैठे रहो ? ललित
लावण्य-विलास से परिपूर्ण अप्सरा स्त्रियो में श्रेष्ठ 'पुञ्जिक-स्थल' नाम से विख्यात तुम्हारी
माता ने अग्निदेव के शाप से अजना के नाम से वानर-युवती होकर जन्म लिया और
इस पृथ्वी पर केसरी की पत्नी होकर रही । एक दिन जब वह वन में विचरण कर रही थी,
तब वायुदेव उस युवती के मद गमन, सुडौल जघा, भारी नितब, चन्द्र-मुख, सुदर अधर,
क्षीण कटि, उन्नत कुच और विशाल आँखें देखकर उस पर मोहित हो गया । मन्मथ के
बाणो से आहत होकर उसने अजना के वस्त्रो को उडा दिया और उसके समीप पहुँचकर
उसका आलिंगन किया । तब अजना ने क्रुद्ध होकर कहा—'किस दुर्मति ने मेरा शील
बिगाडने का यह साहस किया है ?' तब वायुदेव ने कहा—'हे सुदरी, क्रुद्ध मत होओ ।
मैं पवन हूँ । हे कमलाक्षी, मैने तुम्हारे साथ केवल हृदय-सगम किया है, जिससे तुम्हारा
शील खडित न हो । इससे तुम्हें ऐसा पुत्र उत्पन्न होगा, जो बल, तेज, विक्रम, पौरुष तथा
धैर्य से सपन्न होगा ।' इतना कहकर वायुदेव चले गये । उस नारी-रत्न ने वायुदेव की
विमल कृपा से अत्यन्त हर्ष से तुम्हें जन्म दिया । तुम इस पृथ्वी पर वायु के समान शक्ति-
शाली हो । यही नही, किसी भी आयुध से तुम्हारी मृत्यु नही हो सकती । सभी लोको में
तुम्हारी समता करनेवाला कोई नही है । मै तुम्हारी शक्ति से भली भाँति परिचित हूँ ।
अत, तुम समुद्र को पार करो, सीता के दर्शन करो और यत्नपूर्वक राम का कार्य सपन्न
करके, कपियो के, दशरथ-पुत्रो के तथा वानर-राजा के प्राणो की रक्षा करो । हे जगत्प्राण-
नदन, तुम इस प्रकार उत्तम लोको की गति प्राप्त करो ।"
तब हनुमान् ने कहा—"ऐसा ही हो । मैं तुम्हारी आज्ञा का पालन करूँगा ।
हे वानरो, आज तुम मेरी शक्ति देखो । मै समस्त लोक के हितार्थ समुद्र को पार करूँगा ।
भले ही देवता भी मुझे रोकें, मैं उन्हें भी जीत लूँगा । (आवश्यकता पडे तो) समस्त
लोको का नाश भी कर दूँगा । सब को आश्चर्यचकित करनेवाली अपनी शक्ति से