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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 508 में से

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पृष्ठ 248

२९८ रंगनाथ रामायणं
ढूंढ डाला, किन्तु मानव-रूप में रहनेवाली सीता को कही भी और किसी भी प्रकार से
देख न पाने के कारण अत्यत दुःखी हुआ ।
५: हनुमान् का रावण के उद्यान में जाना
इसके पश्चात् हनुमान् ने नगर के समीप रहनेवाले और सोने की चहारदीवारी से
घिरे हुए एक उद्यान को देखा । धीरे-धीरे वह उस उद्यान के निकट पहुँचा । चारो ओर
भली भांति देखकर वह उसकी दीवार पर चढ़ गया और उस सुंदर उद्यान के भीतर देखने
लगा । वह उद्यान चंदन, पुन्नाग, सहकार, मदार, खर्जूर, कटहल, पीपल, नीबू, विजौरा,
पाटली, बकुल, घनसार, सौवीर, कर्णिकार, कुरवक, जवीर, ताल, तमाल, हिंताल, साल, नारिकेल,
अशोक, सप्तपर्णी, दाड़िम, नारंगी, केतकी और पूगीफल, आदि के वृक्षो से, मल्लिका,
मालती, माधवी, नागवल्ली, एला, लवग आदि लताओ से, पके हुए द्राक्षाफल के गुच्छो से
और पके हुए फलो तथा पुष्पो की सुगंधि से युक्त वायु से परिपूर्ण था । वह (उपवन)
पिक, शुक, नीलकंठ एवं सारिकाओ तथा भ्रमरो मे शोभायमान था । वह सुंदर सरोबरो
से, कुमुद-समूहो से, चंद्रकात-मणियो की वेदिकाओ से, स्वच्छ चाँदनी से तथा सैकत स्थलो
से अत्यत मनोहर था । वह सभी ऋतुओ में विहार करने योग्य था और उसकी शोभा
चैत्ररथ (कुवेर का उपवन) को भी मात करती थी । अमरेन्द्र के नंदन-वन की समता
करनेवाली रावण की उस उद्यान-वाटिका को देखकर हनुमान् आश्चर्यचकित हो गया और
उस उपवन में प्रवेश करके दवे पाँव सरोवरों में, खड्डो में, उनके तटो पर, निकुंजो में,
पेड़ो के नीचे तथा सुरक्षित स्थानो में बडी सावधानी से सीताजी की खोज
करने लगा । उसके पश्चात् उस उपवन के मध्य भाग में स्थित, रात-दिन पहरा देनेवाले
राक्षस-वीरो से रक्षित, गगनचुंबी अट्टालिकाओ से सुशोभित मेरु पर्वत के शिखरो के समान
स्वर्ण-कलशो से शोभायमान, स्वर्ण-स्तंभो तथा श्रेष्ठ रत्नो के वंदनवारो से भासमान एक
विशाल भवन को हनुमान् ने देखा । हनुमान् ने उस भवन में भी सीता को ढूँढा, किन्तु
वहाँ भी उनका पता नही चला ।
तब हनुमान् मन-ही-मन अत्यत दुःखी हुआ और सोचने लगा—'हाय, सूर्यकुल-तिलक
राम ने मुझे एकांत में बुलाकर, बड़े प्रेम से कहा था कि तुम अवश्य सीता का पता लगा
सकोगे और मेरे हाथ में अपनी मुद्रिका दी थी । उनका आदेश स्वीकार करके मैं यहाँ
आया हूँ । किन्तु उस कमल लोचनी का पता कही नही मिल रहा है । उस दुरात्मा
रावण के ले आते समय कदाचित् उस साध्वी ने अपने प्राण त्याग दिये हो या आकाश-
मार्ग से अत्यधिक वेग से आते समय भयभीत हो सीताजी, राक्षस के हाथो से मुक्त होकर
समुद्र में गिर गई हो, अथवा यहाँ के राक्षसो को देखकर भय से प्राण छोड़ दिये हो,
अथवा विरहाग्नि में जलकर भस्म हो गई हो, या राक्षस ने किसी ऐसी माया की रचना
की हो, जिससे सीता किसी को दीख नही पडती हो, या रावण ने उन्हें विदेशो में रख
दिया हो, या उस राक्षस ने उस चंचलाक्षी को दण्ड देकर उसके प्राण ले लिये हो । हाय,
में किस मुँह से लौट जाऊँगा और राम से क्या कहूँगा ? अब में क्या करूँ ? ज्यो ही में
यह कहूँगा कि मैने सीता को नही देखा, त्यो ही राम अपने प्राण त्याग देंगे । अपने भाई