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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 508 में से

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पृष्ठ 252

२२२ रंगनाथ रामायण
हे सुंदरी, तुम मुझे अपनाकर राज्य-सुख क्यों नहीं भोगती ? चाहे इन्द्र हो, यम हो,
वरुण हो या कुबेर हो; अग्नि, नैऋत, वायु या ईशान ही क्यों न हो, कोई भी मेरी लंका
को जीत नहीं सकता । क्या किसी मानव के लिए लंका की ओर दृष्टि डालना भी संभव है ?
अब राम कहाँ है ? वह यहाँ कैसे आयेगा ? आकर लंका में प्रवेश करेगा किस ढंग से ?
प्रवेश करके भी बिना भयकंपित हुए मेरा सामना करेगा कैसे ? सामना करके भी मेरे
साथ लड़ेगा कैसे ? लड़ेगा भी, तो मेरी शक्ति को किस प्रकार सहन कर सकेगा ?
सहन करेगा भी, तो कबतक कर सकेगा ? इसलिए, ये सब बातें असंभव हैं । उन
बातों को छोड़ दो ।' रावण इस प्रकार राम की निंदा करते हुए कर्णकटु शब्द
कहता रहा ।
८ सीता का रावण की निंदा करना
तब सीता ने अत्यंत क्रुद्ध होकर एक तिनका ऐसा तोड़ा, मानो वे इसकी घोषणा
कर रही हों कि तुम अवश्य राम के हाथो से नाश को प्राप्त होगे । फिर वे उस तृण
को हाथ में लेकर उसे संबोधित करके कहने लगीं—'हे पापी, मेरे पति को धोखा देकर
तुम मुझे अपनी लंका नगरी में ले आये हो । इसे बहुत बड़ा पराक्रम मानकर तुम क्यों गर्व
कर रहे हो ? इसे महान् कार्य समझकर क्यों प्रलाप कर रहे हो ? पराई स्त्रियों के साथ
समागम चाहनेवालों का ऐश्वर्य नष्ट हो जाता है और उनकी आयु भी क्षीण होती है ।
यदि तुम जीवित रहना चाहते हो, तो औचित्य तथा धर्म का विचार करके मुझे राम के
पास पहुँचा दो । इसके विपरीत यदि दुर्बुद्धि के वश में पड़कर तुम मुझे ग्रहण करना चाहोगे,
तो कोदण्ड-दीक्षा-गुरु राजा राम के हाथो से मारे जाओगे । यह निश्चित है । तुम अपने
मन में यह मत समझो कि वे वनवास के कारण कृश-गात्र, दुर्बल, अनाथ, राज्यहीन, असहाय
हो गये हैं और वे मनुज-मात्र हैं । क्या उन्होंने दंडकवन में चौदह सहस्र भयंकर राक्षसों
को नहीं मारा ? दण्डधर के उद्दण्ड दण्ड के प्रताप को मात करनेवाले तथा सूर्य-किरणों
के भयंकर गर्व को भी परास्त करनेवाले राम के असंख्य रण-भीषण-बाण जिस दिन तुम्हारी
लंका में व्याप्त होंगे, जिस दिन वे बाण तुम्हारे वक्ष स्थल में गड़ेंगे, उसी दिन तुम अपनी
तथा राम की शक्ति का अनुभव कर सकोगे । मैं अब उसके संबंध में क्यों कहूँ ? जैसे
कुहरा सूर्य का सामना करने पर नष्ट हो जाता है, जैसे भेंड़ा पहाड़ से टक्कर लेने से
नष्ट हो जाता है, जैसे मच्छर मत्त गज का सामना करने से पिस जाता है, जैसे नाला
समुद्र का सामना करके अपना अस्तित्व खो देता है, वैसे ही तुम भी यदि अपनी और
उनकी शक्ति की तुलना किये बिना ही राजा राम के साथ भिड़ जाओगे तो तुम भस्म
हो जाओगे । भला, तुम क्या देखकर इठला रहे हो ? सूर्यवंश के तिलक (राम)
इस प्रकार तुम्हें इस पृथ्वी पर थोडे ही रहने देंगे ?'
इन बातों को सुनकर रावण अत्यंत रोष से जानकी को देखकर बोला—'मैंने
तपस्या से ब्रह्मा को प्रसन्न करके उनसे श्रेष्ठ शक्ति का वर प्राप्त किया है, इन्द्र से लेकर
सभी देवताओं को परास्त किया है, शिवजी के साथ समस्त कैलास पर्वत को उठाया है,
बड़े साहस के साथ सभी ऊर्ध्व लोकों को जीता है, पाताल के निवासियों को परास्त किया है