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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 246, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 246

उसके पश्चात् हनुमान् रावण के अत पुर के निकट पहुँचा । वह (अत पुर) मकर-तोरणो
(मकर के आकार में बँधा हुआ वदनवार) पुष्प-मालिकाओ, विविध धूपो की सुगधि, रत्न
तथा मोतियों से पूरे गये चौको, चंद्रकांत-शिलाओ से निर्मित चबूतरों, स्वर्ण तथा-मणियो
से बनाये गये कपाटो, प्रशंसा के योग्य मडपो, प्रवाल के बने ऊँचे स्तभो, अनेक अट्टालिकाओ
तथा सौधो की पक्तियो से अलकृत था तथा सशस्त्र राक्षसो के द्वारा सतत रक्षित था।
उस अत पुर के पास पहुँचकर हनुमान् ने अत पुर के पहरेदारो के निकट जाकर देखा,
फिर कई द्वारो को निर्भय गति से पार करता हुआ आगे बढा और सभा-मडपो में सीता
को ढूँढा । वह रनिवास के निकट पहुँचा ही था कि इतने में, समुद्र में ज्वार उत्पन्न करते
हुए, कमल-समूह की काति को मलिन करके उन्हें मुकुलित करते हुए, मदमत्त चक्रवाल
पक्षियो को विरहाग्नि से पीडित करते हुए, मन्मथ के प्रताप को बढाते हुए, मुरझाई हुई
कमलिनियो के समूह को विकसित करते हुए, मुग्धा-जारिणियो के चित्तो में चंचलता उत्पन्न
करते हुए, घने अधकार के प्रताप को नष्ट करते हुए, चंद्रकांत-शिलाओ को गलाते हुए,
चकोर पक्षियो को प्रेम से अघाते हुए, प्रेमी-प्रेमिकाओ का मिलन सपन्न करते हुए, अपनी
संपूर्ण राका से दिशाओ को भी उज्ज्वल बनाते हुए, मन्मथ का ससुर, उत्तम शोभा की
सीमा, कुमुदिनियो का प्रेमी, नक्षत्रो के अधिपति चद्र का उदय आकाश में ऐसे हुआ, मानो
लकापुरी में सीताजी का अन्वेषण करनेवाले हनुमान की सहायता करने के हेतु देवताओ ने
मशाल जला दी हो ।
४ हनुमान् का रावण के अंतःपुर में प्रवेश करना
ऐसे चन्द्र को देखकर हनुमान् मन-ही-मन हर्षित हुआ और-सारे अत पुर में देखते
हुए जाने लगा । एक स्थान पर उसने कातिमान्, विश्वकर्मा से-रचित, अपनी इच्छा से
चलने की शक्ति रखनेवाला, विचित्र कला-कौशल से सपन्न सूर्य-चंद्र के समान प्रकाशमान
मणि-पुष्पक नामक विमान को देखा, जिसे देवलोक के शत्रु (रावण) ने युद्ध में, कुबेर को
पराजित करके छीन लिया था ।
उस विमान में पवन-पुत्र ने उन सुदरियो को देखा, जिन्होने रावण को सुख-के
समुद्र में उतराकर, मद्यपान तथा भोग-विलास के मधुर रसास्वादन के कारण शिथिल हो
सोई पडी थी । उनकी शरीर-रूपी लताएँ अलग हो पढी हुई थी; उनकी स्निग्ध जांघो
का सौंदर्य प्रकट दीख रहा था; उनकी नीवियो की गाँठे ढीली हो गई थी, उनके मुख
मुरझाये हुए थे, उनकी सुगधित साँसें चल रही थी, अधर एक विचित्र सुदरता के साथ
एक ओर झुके हुए थे और उनपर मद हास नृत्य कर रहा था, उनके अर्द्ध-निमीलित
नयन उनकी रति-क्रीड़ा की मुग्ध परवशता प्रकट कर रहे थे, उनके नूपुर निःशब्द होकर
उनके चरणो में लिपटे हुए थे, उनका चंदन-तिलक श्रम-जल से गल रहा था, उनकी
वेणियां खुली हुई थी, पुष्प-मालाएँ टूटी पडी थी, भ्रष्ठ मुक्ताओ की मालाएँ उनके दोनो
कठोर कुच-पर्वतो के बीच दबी हुई थी और उनके चित्त मदिरा-पान से मत्त थे । अपने
कटि-रूपी सैकत, केश-रूपी शैवाल, नाभि-रूपी सरोवर, भ्रू-रूपी तरगो, कुच-रूपी भँवर तथा
नयन-रूपी मीनो से युक्त वे सुंदरियाँ सुख-निद्रा में सोनेवाली नदियो के समान दीख रही थी ।